मंगलवार, 16 नवंबर 2010

......उत्तरमधुशाला, कल से आगे ....

और आज......उत्तरमधुशाला की अगले पाँच रुबाइयां .......समर्पित हैं पूरे देश को 


अपने-अपने दुःख के पर्वत 
अपने-अपने पीड़ा सागर /
अपनी-अपनी सबकी हाला
अपनी-अपनी मधुशाला // १६

अपने आँसू तो अपने हैं
भरले औरों से प्याला /
ऐसा नशा चढ़ेगा जिस दिन 
हर ओर दिखेगी मधुशाला // १७

आँसू हैं अनमोल जगत में 
फिर भी खाली तेरा प्याला !
सौदागर के फेर में आके 
नादान ये क्या तूने कर डाला // १८

दुनिया में बाज़ार सजे हैं 
हाथ अमीरों के है प्याला /
सब कुछ अपना बेच न देना 
होश न खोना साकी बाला // १९

कभी किसी कचरे में मिलती
साँसें गिनती नन्हीं बाला /
"देवी" नाम रखा जग नें, पर 
बना दिया साकीबाला // 20

आज यहीं तक ,  ....कल फिर चलेंगे मधुशाला...........आप आयेंगे न ! आइयेगा....     ज़रूर..... 



2 टिप्‍पणियां:

  1. .

    दुनिया में बाज़ार सजे हैं
    हाथ अमीरों के है प्याला /
    सब कुछ अपना बेच न देना
    होश न खोना साकी बाला ....

    behatreen prastuti.

    .

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  2. ज़ील जी !

    (क्या मैं इसका हिन्दी अनुवाद करके "जोश" लिख सकता हूँ ? यूँ भी आप लौह महिला तो हैं ही )

    हाँ ! तो निवेदन यह है कि कृपया प्रतिक्रया वाले वर्ग में जाकर किसी में एक सही का निशान लगाने की भी कृपा कर दिया करें ......बिंदास ...किसी पर भी / हमें ईमानदार प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है .....आशा है इतना मान रखेंगी / लेखन में उत्तरोत्तर परिमार्जन के लिए आपका इतना संकेत ही समीक्षा के लिए सहयोगी होगा / धन्यवाद /

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.