शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

लीजिये .......एक बार फिर हाज़िर हूँ आपके सामने .......लेकर उत्तरमधुशाला.....

साकी इस बार पिलाई कैसी !     
मैं तो था इस जग से रूठा /
सारी दुनिया हो गयी मेरी 
ऐसी तूने ढाली हाला //

खोज रहा हूँ , न्याय कहाँ है ?
लेकर अपना खाली प्याला /
जिसने उसका मोल चुकाया 
हो गयी उसकी मधुशाला //

लोग उजाले से डरते हैं 
पीते हैं 'तम' की हाला /
हर कोई झूठे नशे में डूबा
सूनी रहती मधुशाला //

नयनों से ले मेरा काजल
उसने फिर श्रृंगार किया /
पीकर तारीफों की हाला 
तोड़ दिया मेरा ही प्याला //

ईमान दिया , ईनाम लिया  
कर मुह काला पहनी माला /
"नशा" शर्म से डूब मरा है
पानी -पानी हो गयी "हाला" //




2 टिप्‍पणियां:

  1. ईमान दिया , ईनाम लिया
    कर मुह काला पहनी माला
    "नशा" शर्म से डूब मरा है
    पानी -पानी हो गयी "हाला

    बहुत सुन्दर बिंदास रचना .... वाह

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  2. भाई मिश्र जी !
    सादर नमस्कार .
    यूँ ही उत्साहवर्धन करते रहिएगा .......हमारा प्रयास रहेगा कि हम आपको मनोरंजन के साथ-साथ सन्देश भी देते रहें ......मैंने देखा है ...लोग रास्ट्रपति पुरस्कार तक खरीद लेते हैं .....कुपात्रों को शीर्ष पुरस्कार ?......हमारी व्यवस्था कैसी हो गयी है ?

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.