सोमवार, 29 नवंबर 2010

अंधेरों नें कहीं ज़श्न फिर .........

मुस्कुराके चाँद नें
पूछा है बार-बार
कहीं ख़्वाब में वो फिर से
आया तो नहीं .


सूरज से रोज़ लड़ रही
सागर की हर लहर
किसी पोखरे को फिर कहीं
सुखाया तो नहीं .


गुमसुम हुयी हवा है
जंगल की आज फिर
कहीं आदमी नें शेर फिर  
खाया तो नहीं.


बदलियों से घिर गया
चाँद आज फिर
अंधेरों नें कहीं ज़श्न फिर
मनाया तो नहीं.


न जाने क्यों
मन मेरा
आज फिर उदास है
कहीं फिर किसी नें आपका
दिल दुखाया तो नहीं.

5 टिप्‍पणियां:

  1. ओह-हो बडी ही शानदार और मनभावन प्रस्तुति है सुन्दर बिम्ब प्रयोग के साथ्।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वन्दना जी शुक्रिया !
    कृपया, the ancient science of life पर भी क्लिक करें.....कदाचित आपको अच्छा लगे.

    उत्तर देंहटाएं
  3. न जाने क्यों
    मन मेरा
    आज फिर उदास है
    कहीं फिर किसी नें आपका
    दिल दुखाया तो नहीं.
    Bahut bhavpoorn aur man ko chhoone wali panktiyan hain.... prabhavi abhivykti...

    उत्तर देंहटाएं
  4. गुमसुम हुयी हवा है
    जंगल की आज फिर
    कहीं आदमी नें शेर फिर
    खाया तो नहीं.
    अच्छी प्रस्तुति !

    उत्तर देंहटाएं
  5. .

    सूरज से रोज़ लड़ रही
    सागर की हर लहर
    किसी पोखरे को फिर कहीं
    सुखाया तो नहीं ...

    इस बेहतरीन और भावुक कर देने वाली रचना के लिए आभार।

    .

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.