शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

कोई क्या जाने ....

ये उदासी ......
ये  बेरुखी ........
ये तनहाई  ..........
ये खामोशी ............
और 
वो सब .......
ज़ो सवाल बन गए हैं,
पैदाइश हैं उन समझौतों की 
ज़ो मेरे घावों नें 
समय- समय पर किये हैं .

कोई क्या जाने ! 
कितनी  बेदर्दी से दफ़न होती रही है 
हर समझौते के साथ 
मेरी सरलता ...... मेरी सहजता ......
और ....
जिनकी कब्रों पर उग आये हैं 
न जाने कितने मुखौटे
जिनके बोझ से तड़पती है 
मेरी संवेदना..... मेरी आत्मा.....

कोई क्या जाने !
बे-अदबी का मुखौटा पहनते वक़्त 
मेरा रोम-रोम 
अदब और दर्द से सराबोर हो 
माँग रहा होता है ........माफियाँ .

कोई क्या जाने !
मेरी बेरुखी और लापरवाही के भीतर 
कितनी छिपी   है 
तड़प  और फिकर  
और मेरे गुस्से  के भीतर 
कितनी तेज़  बह  रही है 
अक्षय प्रेम  की सरिता.

कोई क्या जाने !
कब्र  का पत्थर  हटा  कर  
नेक झांको तो सही 
वहां 
वह सब कुछ है 
जिसकी 
तुम्हें मुद्ददत  से तलाश है . 
नेक झांको तो सही.........

2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय श्री कौशलेन्द्र जी,
    नमस्कार।

    आपने मेरे ब्लॉग पर आकर, अपना बहुमूल्य समय, समर्थन एवं स्नेह प्रदान किया। इसके लिये मैं और भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के 4543 आजीवन कार्यकर्ता आपके आभारी हैं। आपका ब्लॉग देखने पर ज्ञात होता है कि आप ब्लॉग के माध्यम से सोये हुए लोगों को झकझोर रहे हैं। बास परिवार की ओर से आपको एवं आपके परिवार को सुख, शान्ति एवं प्रगति की शुभकामनाएँ।
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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  2. बहुत भावपूर्ण व गहरी रचना है। बधाई स्वीकारे कौशलेन्द्र जी,

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.