रविवार, 26 दिसंबर 2010

आस्था

वह 
इतराती, इठलाती, बल खाती 
पत्थरों से केलि करती
पहाड़ी नदी थी
ज़ो पावस में और भी शरारती हो उठती थी 
और बदल देती थी अपना मार्ग.
बहती थी ...नये-नये रास्तों से 
करती थी चुहुल...मौन खड़े वृक्षों से.
चलती थी .......निर्भीक यौवना सी.
लुटाती थी सदर्प -
पूंजी अपने सौन्दर्य की ......और बिखेरती थी हास
अपने आसपास.

पहाड़ी नदी नें
इस बार भी बदल दिया अपना मार्ग .....और ......
छूकर खिलखिला पड़ी ......अपने रास्ते में खड़े गौरवशाली बरगद को. 
अपनी आस्थाओं में रचा-बसा वर्षों पुराना बरगद ...
देखता रहा चुपचाप.
नदी   
बहती रही ....पूरी बरसात भर
....बरगद की जड़ों से मिट्टी बहाती हुई,
.....गहरी और पुष्ट जड़ों से परिहास करती हुई,
........बरगद को अपने साथ बहा ले जाने की जिद करती हुई
नदी बहती रही .......पूरी बरसात भर.
बूढा बरगद 
खड़ा रहा चुपचाप .....
उसकी जड़ें गहराई तक धसी हुईं थीं ........आस्था की धरती में.
वह केवल उन्हीं को सहलाता रहा ...बड़े प्यार से
आसमान में सिर उठाये
और सहता रहा  ......अपने चिकने-चमकीले पत्तों पर 
प्रवासियों की बीट.
सहता रहा.....झुकी हुई शाखाओं के टूटने की पीड़ा....
बिना किसी परिवाद के.
किसी नें साथ नहीं दिया उसका .
किन्तु नदी 
न तो ले जा सकी बरगद को अपने साथ
न ठहर सकी उसके पास  
बल्कि छोड़ गयी .....
सूखी और आँखों में चुभने वाली ...तपती रेत 
अपने आसपास.
अंततः ........संस्कृति जीत गयी      
और हार गईं मेरे शहर की
सारी विज्ञापन बालाएं.
बेचारी  .........
पहाड़ी नदी !    

   
  
  

9 टिप्‍पणियां:

  1. कौशलेंद्र जी!
    आपकी कविता पढकर अपने बौनेपन का एहसास हुआ... प्राकृतिक बिम्बों के माध्यम से आपने कितनी खूबसूरती से परम्पराओं को बचाया है... अभी कुछ दिन पूर्व इसी विषय पर बहस हुई थी आपके प्रदेश के एक स्थापित कवि से... वे नदी के साथ थे..मैं बरगद की जर्जर जड़ों के साथ खड़ा था... क्योंकि मैंने देखी हैं बरगद की वो लताएँ जो अपने जैसे अनेकों बरगद पैदा करती हैं... कोलकाता का महान बरगद का पेड़..
    अच्छा लगा आपको अपने साथ खड़ा पाकर!!

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  2. भैया जी ! बिलकुल ठीक कहतानी आप, जड़े के साथ रहे के चाहीं ... पहाड़ी नदियन के दोष देय से खास भला नाहीं होई..... ऊ त नदियन के स्वभाव बा ......प्रकृति के एगो कडू सच्चाई बा ...शीला अ मुन्नी जैसन पहाडी नदियन के ज्यादा वुजूद नई ख़े....आपन जड़ मजबूती से पकरे के काम बा. हम रउरे साथ बानी जा ....

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  3. "संस्कृति जीत गयी
    और हार गईं मेरे शहर की
    सारी विज्ञापन बालाएं.
    बेचारी .........
    पहाड़ी नदी !"
    कौशलेन्द्र जी,पहाड़ी नदी और बरगद के सहारे आपने जो स्थापित करना चाहा उसमें सफल रहे हैं आप. आस्था से ही संस्कृति जैसे बरगद का अस्तित्व बनता है. पहाड़ी नदी का बिम्ब काफी अर्थपूर्ण है बरगद के सन्दर्भ. बहुत-बहुत बधाई.

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  4. बरगद के इर्द-गिर्द सब कुछ होता रहता है, लगता है वह बेखबर सा, लेकिन आपने भी रेखांकित किया कि बाखबर है वह.

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  5. संस्कृति जीत गयी ...

    जिंदगी , समय , और परिवेश
    के सत्य को
    सहजता और सरलता से
    खूबसूरत और अनुपम शब्दों में
    काव्य-आकार दे पाना
    आपकी रचना-कुशलता को परिभाषित करता है
    अभिवादन स्वीकारें .

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  6. .बरगद की जड़ों से मिट्टी बहाती हुई,
    .....गहरी और पुष्ट जड़ों से परिहास करती हुई,
    ........बरगद को अपने साथ बहा ले जाने की जिद करती हुई
    नदी बहती रही .......पूरी बरसात भर.
    बूढा बरगद
    खड़ा रहा चुपचाप .....

    अगर आप विज्ञापन बालाओं की बात कर रहे हैं ....तो अक्सर मैंने ऐसे बूढ़े पेड़ों को नदी के साथ बहते देखा है .....
    बरगद का तो पता नहीं .....
    शायद ज्यादा संयमी होते हों .....
    पर रचना ने दिल छू लिया .....
    काफी गहरी और पुष्ट जड़े हैं बरगद की .....
    बधाई .....!!

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  7. आप सभी का सादर अभिनन्दन ! अपना अमूल्य समय देने के लिए हार्दिक आभार. हीर जी ! छोटे-मोटे पेड़ बह जाते हैं ...फिर सदा के लिए ढह भी जाते हैं ..उनकी सांस्कृतिक जड़ें इतनी गहरी नहीं होतीं ...भाई राजीव जी ! हमारा संदेश आप तक अपनी पूर्णता के साथ पहुंचा ....लिखना सार्थक हुआ ....हम सभी इस समय आस्था के घोर संकट से गुजर रहे हैं ...हमें बड़े धैर्य से अपनी जड़ों को पकड़े रहने की आवश्यकता है.

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.