मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

सच्ची, हम सीरियस बिलकुल नहीं हैं... सिर्फ मज़ाक भर कर रहे हैं....



१-  एक छोटा सा लोकतांत्रिक मज़ाक 

बड़ी आनाकानी के बाद 
निकाली थी उन्होंने एक डिबिया  
बोले- 
इतनी ही जिद है .........तो आओ, 
लगा दूँ  मलहम...
खोलो, कहाँ है घाव...
फिर .....आहिस्ते से 
डिबिया खोल,  
ढक्कन छोड़ 
फेक दिया सबकुछ दरिया में ...
बोले-
ये रहा तुम्हारा लोकपाल बिल.

२- दलाध्यक्ष ...गोया प्रधानमंत्री ...गोया राष्ट्राध्यक्ष 

एक छोटा सा सवाल है, 
अब से पहले 
कभी देखा है 
किसी दलाध्यक्ष को 
किसी प्रधानमंत्री 
या राष्ट्राध्यक्ष की छाती पर 
इस कदर मूंग दलते ?
नहीं .....?
तो देख लो...जी भर के देख लो 
और याद रखना 
इतिहास का 
ये दुर्गंधित ....काला पन्ना.

३-  प्रधान मंत्री 

गुस्सा मत करो उस पर.... 
न बेशर्म कहो ....
क्या करे बेचारा !
नाबालिग है अभी 
धीरे-धीरे सीख लेगा चलना 
बिना उंगली थामे भी. 
तुम तो बस 
वोट देते रहो उसे.

४- ये देश खाली करो... कि वो आ रहे हैं ...

पूरब से इन्हें बुला लो 
पश्चिम से उन्हें बुला लो 
उत्तर में ड्रेगन है 
दक्षिण में समंदर है 
चलो, हम समंदर में डूब जाएँ.

५- क्योंकि उनका हक़ है

इनको आरक्षण  
उनको आरक्षण  
सबको आरक्षण 
सिवा हमारे .....
क्योंकि उनका हक़ है 
और हमारा कभी था ही नहीं
ये हक......
कौन सी दूकान में मिलेगा ?.

६- जजियाकर भी देंगे 

मेज़बान शरण माँगते हैं
मेहमान घर में बसते हैं 
नागरिकता भी उन्हें ही दे दो
अपना काम तो हम  
द्वितीय नागरिकता से भी चला लेंगे 
जजियाकर भी देंगे. 
क्योंकि हम 
न तो अल्प संख्यक हैं....
न आरक्षित ...
न घुसपैठिये ....
न आतंकवादी ..... 
बस, 
केवल टुटपुंजिये  भारतीय ही तो हैं.
आपका कर ही क्या लेंगे ? 

7-   पत्रकार
वे 
भ्रष्ट थे,
नौकरी से हाथ धो बैठे. 
सुना है ............
आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ 
लड़ाई लड़ते हैं  
बहती गंगा में 
जम के हाथ धोते हैं.

८- चौथा स्तम्भ 

लोग 
उन्हें कलम के सिपाही कहते हैं.
वे 
बड़े-बड़े दफ्तरों में जाते हैं
शाम को झूमते हुए 
छपे हुए गांधी के साथ वापस आते हैं. 

९- पुरस्कार/सम्मान    

दे दो 
उस मक्कार.... चालबाज़..... निकम्मे को,   
वह इसी के लायक है नालायक ...
दुष्ट कहीं का....
और भी जो कुछ हो सकता हो वह भी कहीं का .... 
................................................................................
हम क्या इतने गए गुजरे हैं 
कि सभा में बुलाकर 
किये जाएँ बेआबरू 
और ज़िंदगी भर कहे जाएँ-
"जुगाड़ू साला" 



कुछ क्षणिकाएं ..आखिर मनायेगा कौन ?


१-
लो, 
तुम्हारी हठ का
मान रखा मैंने 
और ख़त्म कर दिए रिश्ते 
......................
पर कोई मरघट नहीं मिला ऐसा 
जहाँ दफ़न कर सकूँ इन्हें. 

२-
बड़ी गहरी मोहब्बत है 
सूरज से चाँद को. 
देश निकाला दे दिया 
पर 
ताक-झाँक से बाज नहीं आता
अभी भी भटकता है 
रात-रात भर.

३-
ये ज़िद है उनकी 
कि अब न मिलेंगे कभी. 
उनसे कहो 
इतनी ही दुश्मनी है 
तो निकाल कर फेक दें मुझे 
अपनी यादों के संदूक से. 

४-
हमें तड़पाने में 
मज़ा आता है तुम्हें
तो खुश हैं हम. 
वैसे नहीं 
तो ऐसे ही सही 
तुम्हें मज़ा तो आया.

५-
उन्हें तो 
दुश्मनी भी निभाना नहीं आता ढंग से.
सुना है 
छुप-छुप के रोने की 
आदत हो गयी है उन्हें 
दुश्मन की याद में.

६-
रात 
सितारों के पहरे में था चाँद. 
सुबह 
पूरी धरती भीगी पड़ी थी. 
क्या पता 
कौन रोया था इस कदर.

७-
हम हँसे .....तो वो हँसे
हम रोये  .....तो वो रोये 
हम रूठे  .......तो वो भी रूठे 
कमाल है ........
....ये मोहब्बत तो न हुयी,  
आखिर मनायेगा कौन ?






रविवार, 25 दिसंबर 2011

रिश्ते ...


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1- 
सड़क किनारे
बूढ़े वक़्त ने
अपनी दूकान सजा ली है.
युवा वक़्त ने 
खरीदे हैं कुछ नाज़ुक से रिश्ते
वह खेलेगा इनसे,
फिर सिरा देगा 
किसी 
तालाब में.


२-
रिश्ते 
कभी गर्म हुआ करते थे 
बूढ़ी हथेलियों की गर्माहट से 
अब 
गर्म रिश्ते भी गर्म नहीं लगते 
जवान हथेलियों के स्पर्श से.


३-
ठंडी राख से लगते हैं 
रिश्ते, 
इनमें गर्माहट क्यों नहीं है ?
जबकि सुनते हैं, 
दुनिया परेशान है 
ग्लोबल वार्मिंग से.


४-
पत्थर सी ठोस बर्फ को 
बहते देखा है कभी ?
कभी खोल सको 
अपनी धमनियाँ 
तो देख सकोगे 
बर्फ को बहते हुए.


५-
सुनते हैं ....
रिश्तों की गर्माहट 
अब देह में आ गयी है.
और देह में 
पलीता लगाना पड़ता है  
चलने के लिए.


६-
वो मुस्कराते हैं 
तो फूल नहीं झड़ते
वो रोते हैं 
तो आंसू नहीं गिरते.
एक दिन छू के देखा 
तो वो पत्थर के सनम निकले.


७-
यूँ मुस्कुरा के 
धोखे में क्यों रखा हमें. 
यूँ गुनगुना के 
धोखे में क्यों रखा हमें.
जबकि पता था तुम्हें 
किराए पे लाये हो इन्हें,
लौट जायेंगे सब 
वक़्त पूरा होते ही.


८-
वो तो चल दिए 
छू के हमें 
पत्थर जान के. 
हम तो बुत ही भले थे 
अब क्या करें 
कहाँ जाएँ 
अहिल्या बनके ?  


९-
हे भगवान !
तू इस दुनिया को 
रेल का डब्बा क्यों नहीं बना देता,
सफ़र के शुरू से आख़िरी तक 
कोई रिश्ता दर्द नहीं देता. 




  
 







गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

आदम हउआ की औलादों का हउआ....... ख़त्म होने वाली है दुनिया

   
      विक्रम संवत दो हज़ार अड़सठ के पूस माह के कृष्ण पक्ष द्वादशी का ब्राह्म मुहूर्त. कोहरे में डूबी धरती. ठिठुरते पेड़-पौधे. सीपल्स (...... की हिन्दी नहीं मालुम ...'अन्खुड़ियों' से काम चल जाये तो चला लीजिये ) के हरे कम्बल में लिपटी कलियाँ. ठण्ड में नीले पड़े होठों वाले फूलों की पंखुड़ियां. मोटी रजाइयों में दुबके बच्चों को अपने सीने से लगाए मम्मियाँ. ऑफिस लेट हो जाने की चिंता के बाद भी रजाई में सर ढके पापा लोग.  बाहर निकलने में आनाकानी करता सूरज.....और पाले की परवाह किये बिना ......या यूँ कहिये कि उनको चुनौती सी देते हुए  पूरब वाले बाग़ में खिरनी के पेड़ की ऊंची-ऊंची डालियों पर ब्राह्म मुहूर्त में कलरव के साथ अपनी दिनचर्या प्रारम्भ होने की सूचना देते परिंदे.
       मैं उनकी कलरव का अभ्यस्त हूँ. वही, रोज की तरह विगत स्मृतियों की चर्चा .....कल के अनुभव....इंसान की करतूतों पर टिप्पणियाँ और आज कौन समूह किस दिशा में दाना-पानी  की तलाश में जाएगा इस पर बुजुर्गों का दिशा निर्देश .....यही सब ...पर आज परिंदों ने जिस तरह हमारे ज्ञान, धरती के प्रति हमारी चिंता-व्याकुलता और उसकी सुरक्षा योजना को लेकर हमारी पूरे एक वर्ष की मेहनत और धुआँधार प्रचार का परिहास उड़ाया उससे मैं बहुत व्यथित हुआ हूँ. उन्हें हमारा परिहास उड़ाने की जगह सोकर उठने के बाद अपने दाना-पानी की तलाश में कहीं उड़ जाना चाहिए था. पर नहीं, उन्होंने हमारा परिहास उड़ाया. 
      शुरुआत उस नन्हें चंचल परिंदे चूंचूं ने की थी, " बापू ! दुनिया के खात्मे को लेकर आपने कोई योजना नहीं बतायी. आदमी को देखिये, कितने चिंतित हैं ...अगले वर्ष ठीक आज के ही दिन दुनिया ख़त्म होने वाली है. कोई खगोलीय पिंड आकर धरती से टकराने वाला है. वे लोग चिंतित हैं ....चिंतित हैं ...बहुत चिंतित हैं .....धरती को कैसे बचाया जाय इसकी योजनायें बना रहे हैं. कुछ लोगों ने तो साल भर पहले से ही लोगों को आगाह करना शुरू कर दिया था .....अगले वर्ष इक्कीस तारीख के बाद बाइस दिसंबर सन दो हज़ार बारह की सुबह दुनिया ख़त्म हो जायेगी. महंगी-महंगी किताबें लिख मारी हैं लोगों ने .....नेट पर विज्ञापन आ रहे हैं ....सावधान ! सारे भविष्यवक्ताओं, वैज्ञानिकों, चिंतकों, साधुओं, कवियों, खगोलविदों और ऐरे-गैरे नत्थूखैरों की भविष्यवाणी सत्य होने में मात्र एक वर्ष शेष रह गया है....अधिक जानने के लिए खरीदें हमारी पुस्तक ......मात्र ....डॉलर में. शीघ्र करिए ...सीमित स्टॉक.....सिर्फ आपके लिए "
      भुनभुन चिड़िया ने भी चूंचूं के सुर में सुर मिलाया ..."हाँ ठीक ही तो .....दादू तो एकदम बेफिक्र हैं  ...इन्हें दुनिया ख़त्म होने की कोई चिंता ही नहीं है. रोज सुबह उठो ...गपियाओ और उड़ चलो दाना-पानी के लिए ...बस. पता नहीं ये इंसानों की तरह चिंतित होना कब सीखेंगे. दो हज़ार ग्यारह ख़त्म होने वाला है और ये अभी तक ज़रा भी चिंतित नहीं हैं ...एक साल रह गया है दुनिया ख़त्म होने में ...."   
      खीखी चिड़ा ने ख्हिस से हंस दिया.....उसकी यह पुरानी आदत है ...बच्चों का मज़ाक उड़ाना. सो वह बोला - " कब से कह रहा हूँ दादा से कि इन बच्चों को इंसानी शहरों की तरफ मत भेजा करो. स्कूली बच्चों के मध्याह्न भोजन-उच्छिष्ट के लोभ ने इन्हें संस्कार भ्रष्ट कर दिया है. इंसानी बच्चों की सोहबत में न जाने कैसी ऊट-पटांग बातें सीख रहे हैं. अब दादा ही संभालें इन्हें मैं तो चला धान वाली टपरिया."
     कूँ चिड़िया बड़ी सयानी थी, उसने खीखी की बात का समर्थन किया, बोली- "बच्चो ! दुनिया ख़त्म होने की पहली सूचना विधाता हम परिंदों को ही देता है ...हमें तो अभी तक ऐसी कोई सूचना मिली नहीं है ..इसलिए तुम लोग निश्चिन्त रहो.....और फिर यदि कभी ऐसा हुआ भी तो विधाता की शान में कोई क्या हिमाकत कर सकेगा ...कोई है इतना ताकतवर जो धरती को बचा सके ? इन इंसानों से छोटे-मोटे सूनामी तो रोके नहीं जाते ...उसकी छोड़ो ...इंसानी व्यवस्था इंसानी अव्यवस्था तक को तो संभाल नहीं पाती धरती को बचायेंगे क्या ख़ाक? ये इंसान धरती की सबसे अवसरवादी प्रजाति है जो मौत में से भी व्यापार के सूत्र निकाल लेती है ....आदम हउआ की औलादें हैं ये ......बात-बात पर हउआ खड़ा करके पैसे कमाना इनकी फितरत है .....सो ये किताबें लिखकर बेच रहे हैं ..और बेवकूफों को और भी बेवकूफ़ बना रहे हैं . धरती से कोई पिंड टकराने वाला होगा भी तो क्या उसे रोक लेंगे ये मुए .....?"
    नीनू चिड़ा इंसानों से बहुत चिढा रहता था, उसे मौक़ा मिल गया...."ये आदम हउआ की हरामजाद औलादें ........."
    गिग्गी चिड़ा ने नीनू को बीच में ही डाँटा, बोला - "पहले तमीज सीखो, इंसानों की तरह ये अपशब्द बोलना कब से सीख लिया तुमने .....हमारे संस्कारों की इस तरह उपेक्षा करते शर्म नहीं आयी तुम्हें. हम परिंदे हैं ..हमारी उच्च संस्कृति है ...इसीलिए पूरी धरती पर हमारा साम्राज्य है ...हमें कहीं वीसा नहीं लेना पड़ता ...कोई पासपोर्ट नहीं दिखाना पड़ता ...ईश्वर ने हमारी सर्वोत्कृष्ट संस्कृति के कारण ही हमें ये अखंड वरदान प्रदान किये हैं. खबरदार जो अब कभी किसी को भी गाली दी."      
     माहौल अनायास ही गंभीर हो गया. चूंचूं और भुनभुन को लगा कहीं अब उनकी भी खबर न ली जाय....सो उन्होंने बात बदलते हुए पूछा, " आज हम जंगल की नदी वाले कछार की तरफ जाएँ क्या...उधर इंसानी बच्चे नहीं आते? "

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

हमारी किस्मत अच्छी है जो आप हमसे खफा हैं.....

    रोजमर्रा की ज़िंदगी में एकरसता से निपटने का एक बहुत ही पुराना नुस्खा है...और वह है अपनों को खफा करना ..और जब वे खफा हो जाएँ तो उन्हें मनाना. यह नुस्खा पुराना ज़रूर है पर है बहुत ही कारगर. जो यह नुस्खा अपनाना चाहते हैं उनके लिए बिना फीस के हाज़िर है. नुस्खे का एक नमूना पेश है -

आप सच्ची में ....सीरियसली ....मुझसे नाराज़ हैं ?
अगर ऐसा है तो हम खुश किस्मत हैं .......नाराजों को मनाने का एक अलग ही सुख है ....हर किसी को नहीं मिलता. हमारी किस्मत अच्छी है जो आप हमसे खफा हैं.....
चलिए आपको मनाने का पहला दौर शुरू करते हैं .....

लाईट ...कैमरा ....एक्शन .....

दौर-ए-सीन, एक :-  हम ज़िल्ले इलाही बोल रहे हैं. हमें पता है कि आप हमसे बेहद ख़फ़ा हैं. आपकी नाराज़गी की वज़ह भी बिलकुल जायज है ...हम क़ुबूल करते हैं कि हमसे गुस्ताख़ी हुयी है. हम आपको यकीन दिलाते हैं कि हम दोबारा ऐसी ग़लती हरगिज़ नहीं करेंगे. अगर हमसे दोबारा ऐसी ग़लती हुयी तो आपको ये अख्तियार है कि आप हमें दो घण्टे के लिए घोड़ों के तबेले में बिना चारे के बंद कर दें. हम आपसे मुआफी की दरख्वास्त करते हैं. उम्मीद है कि हमारी दरख्वास्त क़ुबूल की जायेगी. 
कट..कट...कट.. 

लाईट ...कैमरा ....एक्शन .....
दौर-ए-सीन, दो :- 
आपके कदमों में हमारा आदाब क़ुबूल फ़रमायें ! देखिये हम आपके लिए क्या लाये हैं ....सफ़ेद फूलों का गुलदस्ता. ये सफेदी हमारी शर्मिन्दगी और अमन का पैगाम लेकर आयी है ......अब गुस्से को थूक दीजिये और मान जाइए. लीजिये, गुस्सा थूकने के लिए ये हीरों जड़ा पीकदान भी हम खुद ही साथ लाये हैं....थूकिये ...और थूकिये ....जी भर के थूकिये ......
कट...कट...कट...  

लाईट ...कैमरा ....एक्शन .....
दौर-ए-सीन, तीन :-  
ओह ! हमारी दरख्वास्त अभी तक क़ुबूल नहीं हुयी है. क्या हम इसका मतलब ये निकालें कि आपका गुस्सा सातवें .....या फिर इससे भी ऊंचे वाले  किसी आसमान पर है ? ठीक है ...हम आके गुस्से को उतारने के लिए आतिश बुझाने वाली किसी कंपनी से बात करेंगे ....मगर .....
.....मगर हम यह भी जानना चाहते हैं कि आपका ये गुस्सा वहाँ आसमान पर कर क्या रहा है ? आखिर हम ज़िल्ले इलाही हैं ...हमें सब कुछ जानने का पूरा हक़ है. 
कट..कट..कट....

लाईट ...कैमरा ....एक्शन .....
दौर-ए-सीन, चार :- 
उफ़ ! कहाँ मर गए ये सब फायर ब्रिगेड वाले ! कोई भी नहीं मिला क्या ......
मुश्किल में कोई साथ नहीं देता. या परवर दिगार रहम कर....या मेरे मौला .....मेरा ये छोटा सा काम कर दे ...मैं दुनिया की सारी दरगाहों पर चादर ..तकिया...रजाई ..सब चढाऊंगा. 
बीरबल !...अरे ओ बीरबल ! नई खे सुनत का रे बीरबलवा ...
जाओ ...पता करो दुनिया में कितने पीर हैं ..कितनी मज़ारें हैं...कितनी दरगाहें हैं. और इनमें से कितनों को अपनी ज़िंदगी में भागलपुरी चादरें नसीब नहीं हुयी थीं .....सब को बिस्तर मुहैया कराने के इंतज़ाम करो .....हम रूठे हुओं को मनाने की ज़बरदस्त मुहिम छेड़ने वाले हैं....  
कट..कट..कट....

लाईट ...कैमरा ....एक्शन .....
दौर-ए-सीन, पांच :-  
लो,.... यहाँ तो कोई एक अदद दरिया तक नहीं है ....समंदर की तो बात ही छोड़िये ...चारो तरफ़ रेत ही रेत ....गाने वाला सीन है ...क्या करें ? मगर करना तो है ही ....चलो, बीरबल यहीं शूट कर लेते हैं ....

अभी ना मानो रूठकर  ...मुहिम अभी शुरू हुयी....शुरू हुयी ...शुरू हुयी ...
पहली बार रूठी हो ......टंकी पे जाके बैठी हो ... बैठी रहो.... बैठी रहो .......रूठी रहो ....रूठी रहो .....
तुम्हें मनाने का मज़ा ...पहले कभी मिला नहीं ...मिला नहीं ...मिला नहीं ....  नहीं  नहीं  कभी नहीं ...
देखो यहाँ पे रेत है .....फूलों का रंग सफ़ेद है ....फिर न कहना ये कभी .....पैगाम हमें मिला नहीं ...मिला नहीं मिला नहीं ....
जब तक कहें न हम तुम्हें.....मिलके न आयें हम उन्हें ....तुम यहीं सोती रहो ...सोती रहो ..सोती रहो...सोती रहो ...सोती रहो .....
कट..कट..कट....

चलिए मानसिंह जी ! आज यहीं तक. गाने का बाकी हिस्सा कल शूट करेंगे, कोई समंदर तलाश लीजिएगा .......आज तो पैक अप किया जाय ....


रविवार, 18 दिसंबर 2011

शीर्षकहीन 2- गतांक से आगे...

   
   अभी तक आप पढ़ चुके हैं कि पिच्चेकट्टा पर्वत से नीचे उतरते समय सिद्धांत के चेहरे पर विदुषी के चुम्बनों की वारिश होने लगी ...जिसके साक्षी बने लल्ली और सुबोध. अब आगे पढ़िए ...


    दोनों ध्रुवों को ऐसी अप्रत्याशित स्थिति में देख कर जहाँ सुबोध हतप्रभ खडा रह गया वहीं लल्ली लज्जा से मुंह नीचे कर वापस जाने लगी. यूँ बस्तर की घोटुल परम्परा में पल्लवित-पुष्पित लल्ली के लिए यह आचरण लेश भी अशोभनीय या अकरणीय नहीं था ...पर सात वर्ष उत्तर-प्रदेश में रहने का ही यह प्रभाव था कि उसे इस घटना ने लज्जावेष्टित कर दिया था. निरंतर संपर्क में रहने के कारण किसी समूह के आचार-विचार और परम्पराओं से कोई व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. घोटुल में रहकर सामाजिक आचार-विचार, कला, कृषि आदि की ज्ञान परम्पराओं के साथ-साथ यौनाचार की भी विधिवत शिक्षा प्राप्त लल्ली बिठूर प्रवास के सात वर्षों में ही "सहज" को "असहज" मानने का संस्कार लेकर बस्तर वापस आयी थी......लजाती कैसे न !
    विदुषी की मनः स्थिति भी समझी जा सकती है...अपने उच्छ्रंखल आचरण के आवेश की समाप्ति पर स्त्री आत्मनिन्दित न हो ऐसा कम ही देखा जाता है. सो उसने भी लजा कर पल्लू से चेहरा ढंकने का प्रयास किया गोया पसीना पोछ रही हो. 
     सिद्धांत के पास कहने के लिए कुछ नहीं था. ऐसी विषम स्थिति में किसी पुरुष का आचरण किस प्रकार का होना चाहिए...यह उसने किसी पुस्तक में पढ़ा ही नहीं था. पुस्तकों को ही जीवन का अंतिम सत्य मानने वाले सिद्धांत के आदर्शों की ह्त्या हो चुकी थी.  उसे लगा कि बड़े यत्न से रक्षित उसके ब्रह्मचर्य की आज धज्जियां उड़ गयीं हैं और अब गर्व करने लायक कुछ भी नहीं बचा है उसके पास.  किंकर्तव्यविमूढ़ हो सिद्धांत वहीं बैठ गया.
     कुछ पलों की निः शब्दता के बाद सुबोध ने स्थिति को संभालने का प्रयास किया- "अरे सिद्धांत ! आज इतनी दूर निकल आये घूमने .....गायत्रीमंदिर वाले पुजारी जी पूछ रहे थे आपको  .........................."
     सिद्धांत वैसा ही बैठा रहा ...उसी मुद्रा में. सुबोध को लगा कि उसके पास भी शब्दों का अकाल पड़ गया है आज. आगे और क्या कहे ...कुछ समझ नहीं आया . 
      तभी सब को आश्चर्यचकित करती हुयी विदुषी ने बड़ी मृदुता और सहज भाव से सिद्धांत का हाथ पकड़ा जैसे कि कुछ हुआ ही न हो और बोली- "चलिए, घर नहीं चलना क्या ?"
      हाथ छुड़ाकर सिद्धांत फफक पडा .......
     विदुषी ने बड़े स्नेह से उसके शिर पर हाथ रख दिया .......कुछ देर चुप रही फिर संयत होकर कहा- "मुझे गलत मत समझो सिद्धांत, मन का द्वंद्व जब टूटता है तो गहरी जमी धारणा के खंडित होने से अहम् को चोट लगती ही है. आप स्वयं को पहचानें ...बस, मेरा यही प्रयास था. कठोर से कठोर व्यक्ति के अन्दर भी एक सहज निर्मल सरिता का स्रोत होता है ...उसे बहने देना चाहिए. बाँध बनेगा तो पानी का दबाव अपने आसपास तोड़फोड़ करेगा ही. सहज वृत्तियों की स्वाभाविकता का दमन कभी शुभ परिणाम नहीं दे सकता. नदी के किनारे की असंयत धारा में हिलकोरें लेते तिनकों के भटकाव से अच्छा है नदी की मध्यधारा में बह कर सागर तक पहुँचना.........................."
     सिद्धांत को संयत होने में समय लगा. आत्मग्लानि के बोध से हुयी अश्रुवर्षा ने पीड़ा के घने कुहासे को छाँटने में सहयोग किया. जब सिद्धांत का मन कुछ हलका हुआ तो सुबोध ने हाथ पकड़ कर उसे उठाया. तभी लल्ली बोली- " सिद्धांत ! अभी तक शिर मुड़ाने का मोह नहीं छोड़ पाए आप ? एक बार बाल बड़े कर के भी तो दिखाइये ....देखूं तो कैसे लगते हैं आप ?"  
     किंचित कृत्रिम स्मित से लल्ली की ओर देख सिद्धांत आज्ञाकारी बालक सा उठ खड़ा हुआ. तब तक कुछ मछुआरे उधर से निकले, पूछा- " मछरी लेबे का साब ? अब्बी च निकारे हों तरिया ले "
     उत्तर लल्ली ने दिया-"ए साहब मन मछरी नी खायं ".


    इस घटना के कई दिन बाद भी सिद्धांत सहज नहीं हो सका. शालाध्यापन के बाद शेष समय वह अपनी खोली में बैठा गायत्री मन्त्र के जप में लगा रहता. पर मन एकाग्र होने के स्थान पर और भी भटकने लगा.  बचपन में  "ब्रह्मचर्य की रक्षा" पुस्तक में पढ़ा वाक्य 'बिंदु पात मृत्यु का आमंत्रण है अतः हर स्थिति में वीर्य की रक्षा करना चाहिए' उसकी प्रेरणा का स्रोत रहा था. किन्तु विदुषी का तर्क भी तो उपेक्षणीय नहीं "...असंयत धारा में हिलकोरें लेते तिनकों के भटकाव से अच्छा है नदी की मध्यधारा में बह कर सागर तक पहुँचना."
....किन्तु जीवन में नदी की मध्य धारा ..यह क्या है? सिद्धांत के मन में प्रश्न उठा. किससे पूछूं....सुबोध से पूछूं .....नहीं, विदुषी से ही पूछूँ क्या. 
    विदुषी .....
    विदुषी का ध्यान आते ही पिच्चेकट्टा के सागौन वन का वह एकांत दृश्य जीवंत हो उठा. चुम्बनवर्षा के दाह की अनुभूति अभी तक ज्यों की त्यों थी. सिद्धांत के पूरे शरीर में विद्युत् धारा सी दौड़ने लगी.....ओह .....पाप भी कितना सम्मोहक होता है. व्यतीत पल पुनः जीवंत होकर दहक उठे.......
   ओह ! विदुषी..... ! तुम नहीं जानतीं तुमने एक ब्राह्मण को पथ भ्रष्ट करने का पाप किया है. हे वेदमाता गायत्री ! रक्षा करो मेरी........
    ॐ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धी महि ........मन्त्र जप का स्वर ऊंचा हो जाता....पर सागौन  वन में लगी चुम्बन वर्षा का दाह कम होने का नाम ही नहीं लेता.
     ओह विदुषी .......
     नहीं ...अपराध मेरा ही था, ऋषियों के निर्देश के बाद भी ...उपनयन संस्कार के समय दी गयी गुरु शिक्षा के बाद भी .....एकांत में स्त्री का साथ करने का अपराधी तो मैं ही हूँ. विदुषी को दोष क्यों दूं.   
    तभी उसके मन में विचारों की श्रंखला आगे बढ़ी.......कोई पुण्य भी कभी इतना सम्मोहक लगा हो .....ऐसा उसे स्मरण नहीं. यह पाप ही इतना सम्मोहक क्यों होता है, पुण्य क्यों नहीं ? 
   सचमुच,  इस पर तो कभी विचार ही नहीं किया उसने. किन्तु इससे पहले कोई पाप इतना सम्मोहक लगा भी तो नहीं ....


   "चट्टोपाध्याय जी ! घर में हैं क्या ?"
    स्त्री स्वर से विचार श्रृंखला भंग हुयी. कौन है  ....
    तब तक पुरुष स्वर भी सुनायी दिया- " कहाँ रहते हैं महाशय ...कितने दिन हो गए, दर्शन ही दुर्लभ हैं आपके." 
    अब सिद्धांत के जी में जी आया. यह तो सुबोध है ...और स्त्री स्वर ?....लल्ली होगी..
    आश्वस्त हो उठकर बाहर आया. सागौनवन में लगी चुम्बन वर्षा के दाह की स्मृति से कुछ समय के लिए मुक्ति मिली. कुछ औपचारिक वार्ता के बाद लल्ली ने ही पूछा- "आजकल बाहर नहीं निकलते हैं क्या ? सब्जी-भाजी लेने भी आते नहीं देखती हूँ ...."
   सिद्धांत ने नेत्र बंद कर लिए, जैसे चिंतन की मुद्रा में हो, फिर धीरे से कहा- " साधना करना चाहता हूँ पर एकाग्रता भंग हो गयी है. उस दिन पिच्चेकट्टा ......."
    बात को बीच में ही काटकर सुबोध बोला- "तुम राई का पर्वत बना रहे हो सिद्धांत. उस दिन पिच्चेकट्टा में जो भी हुआ उसी से इतने व्यथित हो न ! किन्तु बाहर जो भी हुआ उससे तो कई गुना अधिक तुम्हारे अन्दर हुआ है ...और वह अभी तक स्थिर है ....जम गया है बर्फ की तरह. पिघलने दो उसे. जिन आदर्शों की स्वप्निल दुनिया में रहते हो तुम उसका अस्तित्व इतना नहीं है कि उसके सहारे जीवन जिया सके."
     थके से स्वर में सिद्धांत ने धीरे से कहा- " तो क्या पुस्तकों में जो भी लिखा है वह सब झूठ है. ....माया का परित्याग .....मोक्ष की साधना  ....समाधि ....झूठ है यह सब ? "
       सुबोध ने कहा- "मैं किसी को झूठ नहीं कहता ...किन्तु यह जो इतने निषेधों से जीवन को बाँध रखा है वह भी तो सत्य नहीं कहा जा सकता"
     लल्ली ने परिहास किया, "इन्हें घोटुल में भेजना चाहिए था"
     सिद्धांत ने मुंह बनाया. कहा कुछ नहीं. सुबोध ही बोला- "पाप और पुण्य हमारे मन की धारणाएं हैं. यदि हम जान-बूझ कर ....अपने स्वार्थ के लिए किसी का अहित नहीं करते हैं ...या समाज की किसी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते हैं तो हमारा कोई कृत्य पाप कैसे हो सकता है ? स्त्री-पुरुष के सहज संबंधों को पाप कहना कहाँ तक उचित है ?"
       सिद्धांत ने बीच में ही प्रतिवाद किया, कहा- "आप कहना चाहते हैं कि उस दिन विदुषी का आचरण मर्यादित था ?" 
      सुबोध ने बचाव किया -" यह इस बात पर निर्भर करता है कि किसी भी आचरण के पीछे कर्ता का उद्देश्य क्या है. मनुष्य का आचरण बड़ा ही व्यापक है...कई बातें समाहित होती हैं उसमें. यौन पवित्रता के साथ ही समाज और राष्ट्र के प्रति भी पवित्रता हो तभी किसी का आचरण स्तुत्य हो पाता है. मेरी दृष्टि में तो समाज और राष्ट्र के प्रति पवित्र आचरण ही सर्वोपरि है. ..........राष्ट्र की अपेक्षा केवल यौन संबंधों की पवित्रता को ही प्रमुखता देना कूप मंडूकता ही है . नहीं सिद्धांत!  ...अतिवाद है यह .....और किसी भी अतिवाद का कोई वास्तविक लक्ष्य नहीं हुआ करता......
    बस्तर के आदिवासियों को देखो, स्त्री-पुरुष के संबंधों को जितनी सहजता और निश्छलता के साथ इन्होने   स्वीकार किया है वह अपने आप में अद्भुत है ...और अनुकरणीय भी. सहजता ....तरलता .....किन्तु मर्यादा भी. क्या यह किसी सभ्य आचरण का प्रतीक नहीं ? ढेरों आदर्शों के बाद भी हमारा सभ्य समाज वैश्यावृत्ति, बलात्कारों और छिछोरेपन के घृणित शाप से मुक्त नहीं है....क्या यह ढोंग नहीं है हमारे समाज का ? मैं जानता  हूँ, अभी तुम इसे कम्युनिस्ट विचारधारा का अभिशाप कहने लगोगे किन्तु......" 
     तभी परछी के बाहर किसी की पदचाप ने वार्ता में एक विराम की घोषणा की. सुबोध ने बाहर झांक कर देखा तो प्रसन्न हो कर बोला, "आइये विदुषी जी ! आपकी  ही कमी थी....."
    यह जानकार कि विदुषी का आगमन हुआ है, सिद्धांत के चेहरे पर एक अवर्णनीय व्यथा का भाव तिर गया. परछी के द्वार पर आकर विदुषी ने अन्दर प्रवेश करने की कृत्रिम औपचारिकता निभायी. सिद्धांत का कोई उत्तर न पाकर भी वह अन्दर आ गयी. लल्ली ने ही उठकर उसका स्वागत किया और अपने पास बैठा लिया. सब लोग चुप रहे ...जैसे कि वे सब सिद्धांत को सहज होने का अवसर दे रहे हों.
    इस बार की चुप्पी विदुषी ने ही तोड़ी...एक अप्रत्याशित घोषणा के साथ, बोली - "मैं भानुप्रतापपुर छोड़कर   जा रही हूँ. जाने से पहले आप सब से क्षमा माँगने आयी हूँ. सिद्धांत अभी तक सहज नहीं हो सके हैं ......मैं इन्हें  इनके स्वप्नलोक से यथार्थ लोक में लाने में असफल  रही .....इन्हें पीड़ा हुयी ...इसका दुःख है मुझे ."
     वातावरण में अनायास ही एक उत्सुकता के जन्म लेने से कुछ ऊर्जा का संचार हुआ. लल्ली ने पूछा- " कहाँ जा रही हैं ....क्यों जा रही हैं ...कब जा रही हैं?"
उत्तर चौंकाने वाले थे. सभी लोग जैसे आकाश से धरती पर आ गए हों. विदुषी ने रहस्योद्घाटन किया- "बीजापुर ...................चर्च में सेवा करूंगी ........................आज ही जा रही हूँ"
      एक संक्षिप्त रहस्योद्घाटन के बाद वातावरण पुनः बोझिल हो उठा. सुबोध के मुंह से निकला - "चर्च में सेवा ..? क्या कह रही हो विदुषी ? कहीं तुमने भी तो ....."
     एक नीरस मुस्कान के साथ विदुषी ने कहा- " हाँ ! आपने ठीक समझा ...मैं चर्च जा कर क्रिश्चियन बन गयी हूँ .....बहुत लोग हैं जिन्हें हमारी सेवा की आवश्यकता है "
     एक गहन पीड़ा के साथ सिद्धांत ने अपना मौन तोड़ा - " तो तुमने भी हिन्दुओं का सनातनधर्म त्याग ही दिया ?"
     विदुषी बोली- "मैंने त्यागने की नहीं अपनाए जाने की बात कही है ...मैंने क्रिश्चियन धर्म अपना लिया है."
     सिद्धांत ने प्रतिवाद किया- " एक को छोड़ा तभी तो दूसरे को अपनाया. दुखी जनों की सेवा के लिए क्रिश्चियन धर्म अपनाना आवश्यक था क्या ...उसके बिना सेवा कार्य नहीं हो सकता ? सनातनधर्मी हिन्दू बने रहकर सेवा कार्य में कोई बाधा थी क्या ? ....या कि उनके लिए वर्ज्य है यह ?"
      विदुषी चुप रही. उसके चेहरे पर शान्ति का शांत सागर था ....द्विविधा से मुक्ति के बाद की सी शान्ति ...... 
      वह चुपचाप उठी और बाहर की ओर जाने लगी......अपने सभी सीमित परिचितों को बेचैन करके .......असीमित अपरिचितों की दुनिया की ओर ...उनकी बेचैनी दूर करने के एक स्वप्न मृग के साथ.


    
     सिद्धांत चिल्लाया - "देशद्रोह है यह .....इस देश की धरती .....अपने पूर्वजों और इस समाज के प्रति इससे  बड़ी और कोई अकृतज्ञता नहीं हो सकती  ....."
      विदुषी ने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा- " भारत के सभी सनातनधर्मी हिन्दू देशभक्त हैं .......जान कर प्रसन्नता हुयी सिद्धांत चट्टोपाध्याय जी ! "
      शब्दशक्ति के प्रयोग में कुशल विदुषी के इस घातक प्रहार से सभी लोग तिलमिला कर रह गए. अभिधा में शक्तिपात करती तो निश्चित ही प्रहार इतना गंभीर न हुआ होता. 
     अनायास ही सिद्धांत ने उठकर विदुषी का हाथ पकड़ लिया, बोला- "नहीं विदुषी, मैं तुम्हें इस तरह देशद्रोही नहीं बनने दूंगा."
     सुबोध और लल्ली भी सामने आ गए पर विदुषी को कोई रोक न सका. उसने एक ही झटके से सिद्धांत के हाथ से अपना हाथ छुडाया और तीव्र गति से बाहर निकल गयी.            
    


      इस बार का खग्रास सभी के लिए कुछ अधिक ही अशुभ रहा. इसके बाद की कहानी में किसी को रूचि नहीं होगी....किन्तु उपसंहार आवश्यक है इसलिए बता देता हूँ. 
     विदुषी को बीजापुर के लिए प्रस्थान किये अभी मात्र तीन ही दिन हुए थे कि पूरे भानुप्रतापपुर में शोक छा गया. उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद से आकर बस्तर में बसे शुक्ल परिवार की वर्षों पहले उग्रवादी हिंसा में हुयी मृत्यु के बाद एक मात्र जीवित बची विदुषी भी बीजापुर जाते ही हिंसा की भेट चढ़ चुकी थी. सुबोध उसके पार्थिव शरीर को लाने बीजापुर गया था. वापस आकर उसने जो भी बताया वह और भी हृदय विदारक था. 
    विदुषी के मृत्यु परीक्षण की रिपोर्ट में यौनहिंसा प्रमाणित हुयी थी. विदुषी के मृत्यु वाले दिन ही चर्च का पादरी कहीं अंतर्ध्यान हो गया था. 
  भानुप्रतापपुर के लोगों ने हिन्दू विधि-विधान से विदुषी के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया. उस दिन  पूरा नगर खंडी नदी के घाट पर उमड़ आया था ...पर सिद्धांत उस भीड़ में कहीं नहीं था.


    विदुषी के अंतिम संस्कार से लौट कर आते ही सुबोध को सूचना मिली कि लल्ली को कुछ हो गया है .....वह अचेत पड़ी है. सुबोध भागा-भागा लल्ली के घर की ओर गया. अब लल्ली को क्या हुआ ! 
    सुबोध के मन में लल्ली के जीवन की सारी घटनायें एक-एक कर घूम गयीं. कैसे एक युवक ने विवाह का प्रलोभन दे कर वर्षों लल्ली का उपभोग किया और फिर एक दिन अनायास ही अपने समाज की लड़की को ब्याह लाया. अबोध लल्ली के हाथ पर गर्भपात के लिए चिकित्सक की फीस के पैसे रखकर जब सुरेश चंदेल जाने लगा था तो लल्ली ने भी वे पैसे वहीं धरती पर रख कर और सुरेश को दूर से ही पयलगी कर अपने मायके का रुख किया......बिना किसी को कोई दोष दिए . उसके बाद अचानक ही प्रौढ़ हो गयी लल्ली ने समाज सेवा का जो व्रत लिया तो अपना सम्पूर्ण जीवन ही वंचितों को समर्पित कर दिया. 
     सुबोध ने वहाँ जाकर देखा तो लल्ली को महिलाओं की भीड़ से घिरा पाया. अब तक उसे चेत हो आया था. सुबोध को देखते ही लल्ली फूट पड़ी. जैसे-तैसे करके इतना ही कह सकी कि सिद्धांत विक्षिप्त हो गया है ....वह निर्वस्त्र हो कर घूम रहा है. 


                    समाप्त .


      हर कहानी सुखान्त नहीं होती ....बल्कि यूँ कहें कि कुछ ही कहानियाँ होती हैं जो सुखान्त हो पाती हैं. आखिर हमें अपने चारो ओर घटने वाली घटनाओं के प्रति कुछ तो संवेदनशील होना ही चाहिए. वैचारिक अतिवाद, असहिष्णुता, धर्मांतरण और यौनशोषण की नित्य होती घटनाओं की असंख्य कहानियों का कोई एक शीर्षक कैसे हो सकता है ?       
   







             
     

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

शीर्षकहीन


  
   पने लौह अयस्क के लिए विख्यात दल्लीराजहरा नगर से दक्षिण-पूर्व दिशा में भानुप्रतापपुर राजमार्ग पर मुल्ला से उत्तर की ओर धूल भरी पगडंडी पर पिच्चेकट्टा जलाशय  की ओर पैदल ही आगे बढ़ते हुए लल्ली ने सुबोध को छेड़ा. वह सात वर्ष तक बिठूर में समाजसेवा करके अभी-अभी अपने गाँव 'डूबा' वापस आयी थी. इतने दिनों में वह उत्तर-प्रदेश की शिराओं-धमनियों और उनमें बहने वाले रक्त से भली-भाँति परिचित हो चुकी थी.
     वहाँ की पाठशालाओं की दुर्दशा, शिक्षा की दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती दुकानों, गिरते शैक्षणिक स्तर, परिवारों में आपसी कलह ...मुकदमेबाजी ......गंगा में बहाई जाती नालों की गन्दगी आदि के किस्से सुनाने के बाद बोली- " आपतो अपने यू.पी.- बिहार की तारीफ़ करते नहीं अघाते थे ....देख लिया आपका यू.पी. भी"
लल्ली झूठ नहीं कह रही थी. वास्तव में उत्तर-प्रदेश अब पहले जैसा नहीं रह गया था. सुबोध के पास कोई उत्तर नहीं था इसका. परिहास में बोला- "मैं बिहार का हूँ, यूपी का नहीं...."
        वे जलाशय तक पहुँच गए थे. बाँध पर खड़े होकर लल्ली ने विशाल काले पत्थरों वाले पर्वत की ओर कुछ देखा और चकित होकर बोली- "अरे सिद्धांत ! और यह साथ में कौन है उनके ?"
       विषयांतर होते देख सुबोध को चैन आया, चिंहुक कर बोला- "कहाँ?"
       लल्ली ने अपनी बचपन में आधी पोर कटी तर्जनी अंगुली उठाकर पर्वत की ओर संकेत कर दिखाया - "ओ दे" ( वह देखिये )
    बहुत ऊपर, जहाँ से ऊंचे-ऊंचे सागौन के वृक्षों का साम्राज्य समाप्त होकर मात्र काले पत्थरों का कठोर साम्राज्य प्रारम्भ होता है.....उसी पर्वत की चोटी से नीचे उतरते घुटी चाँद वाले सिद्धांत के साथ दीर्घकेशी विदुषी को देख सुबोध चकित रह गया. उसके मुंह से निकला- "अरे! ये तो दोनों ध्रुव हैं किन्तु एक साथ ...और यहाँ ?...कोई सोच भी नहीं सकता." 
     विक्रम संवत दो हज़ार अड़सठ की माघ पूर्णमासी के दिन जलाशय के ऊंचे बाँध पर खड़े-खड़े उन दोनों ने एक असंभव सी घटना देखी .....दो अविवाहित ध्रुवों को पिच्चेकट्टा पहाड़ की चोटी से एक साथ नीचे उतरते देखा. यह किसी आश्चर्य से कम न था. 
     उन दोनों की मन बुद्धि सहित समस्त इन्द्रियों का प्रवाह उत्तर-दक्षिण ध्रुव की जोड़ी के नाम से विख्यात सिद्धांत और विदुषी के एक साथ नितांत सूने पर्वत की चोटी से नीचे उतरने की घटना के कारणों और उसकी विवेचना की ओर हो गया.          


       काले पत्थरों का साम्राज्य समाप्त हो चुका था, सागौन वृक्षों के गहन वन की छाया में पहुंचते ही विदुषी एक स्थान पर बैठ गयी. वह थक गयी थी, बोतल से पानी निकालकर पीने के बाद बोली- "शहतूत की हरी-हरी टहनियों से लटकते कोसा के ककूनों को देखा है कभी ?....कोसा के धागे कितने बुने से लिपटे रहते हैं आपस में. पहले मैं भी इन धागों को उलझा हुआ समझती थी ...पर सचमुच ऐसा है नहीं....बाहर से जो जैसा दिखाई देता है आवश्यक नहीं कि अन्दर से भी वह वैसा ही हो."
      सिद्धांत ने कुछ आहत होते हुए पूछा, "क्या यह कटाक्ष है तुम्हारा ?"
      "मैंने अपनी बात कही है, कटाक्ष है या नहीं यह आप जानिये. यदि न भी जानें तो क्या अंतर पड़ने वाला है .."
     सिद्धांत बोला- "देख रहा हूँ, आजकल बातें बहुत घुमा फिरा कर कहने लगी हो. मैं तो यूं भी आना ही नहीं चाहता था तुम्हारे साथ ....."
      कठोर हो कर विदुषी ने आँखें तरेरीं- "आना ही नहीं चाहते थे? प्रस्ताव किसका था यहाँ आने के लिए ? ......मैं इसीलिए कहती हूँ, सिद्धांत चट्टोपाध्याय जी ! आप बहुत उलझे हुए मानुष हैं. आपका मन चाहता क्या है ...प्रायः यही नहीं पता होता है आपको"
     "पर अभी तो तुमने कहा था कि ककून के धागे उलझे से दिखते हैं पर होते नहीं.."
     "हाँ ! कहा था....पर बिना तोड़े हुए धागा निकालने के लिए उसका एक स्वतन्त्र छोर खोजना पड़ता है ...और आपसे वही नहीं हो पा रहा है"
    सामने आयी केशराशि को पीछे कर वह खड़ी हो गयी, बोली- "चलिए, अन्यथा गाँव तक पहुंचते-पहुंचते अन्धेरा हो जाएगा और फिर मेरे साथ आपको किसी ने देख लिया  तो ......."
     एक शरारती मुस्कान के साथ उसने हाथ पकड़ लिया सिद्धांत का, बोली- "मेरे छूने से कहीं अपवित्र तो नहीं हो जायेंगे आप ? "
     सिद्धांत बोला- "कौन जाने ...हो भी जाऊं ?"
    विदुषी ने झटके से हाथ उसका छोड़ दिया-" यानी आप सशंकित हैं .....यह शंका क्यों ? कभी विचार किया है आपने ? ...."
    कुछ रुककर विदुषी फिर बोली- "सिद्धांत ! किताबों की दुनिया से बाहर निकलकर देखो, वहाँ वह सब कुछ है जो किताबों में कहीं नहीं है ...और वही जीवन का सत्य है. आपके सिद्धांत जीवन के सत्य नहीं हैं ...छलावा है. यदि तुम्हारे अन्दर दृढ़ता होती तो शंका नहीं होती. यह जो शंका है आपके मन में यही तो दुर्बलता है आपके थोथे चरित्र की ?"
      विदुषी की बात से तिलमिलाए सिद्धांत ने बिना कुछ कहे आगे बढ़ना प्रारम्भ किया. वह सोचने लगा, उफ़ मैं आया ही क्यों इस घमंडी लड़की के साथ ? भूल तो मेरी ही थी.
    सिद्धांत को अब चिंता होने लगी, कहीं गाँव तक पहुँचने में देर हो गयी तो.... क्या सोचेंगे लोग ..यही कि सिद्धांत भी बातें तो बड़ी-बड़ी करता है और घूमता है विदुषी के साथ ....वह भी पिच्चे कट्टा .
      ग्लानि में डूबे सिद्धांत ने तेज-तेज कदम बढ़ाने शुरू किये. पीछे-पीछे विदुषी भी चल पड़ी. वन समाप्त होने को था  तभी विदुषी ने पुकारा - "रुको सिद्धांत ...मैं पीछे रह गयी हूँ."
    सिद्धांत को खीझ होने लगी, उसके ऊपर ज़ल्दीसे ज़ल्दी घर पहुँचने की धुन सवार थी. न चाहकर भी उसे रुकना पडा. तभी एक अप्रत्याशित घटना ने सिद्धांत को विचारशून्य कर दिया. 
    हुआ यह कि पास आते ही विदुषी ने आगे बढ़कर सिद्धांत के कुंवारे चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी. सब कुछ इतना अप्रत्याशित था कि सिद्धांत को संभलने का अवसर ही नहीं मिल सका. जैसे-तैसे उसने विदुषी से अपने को छुडाया ...और ज्यों ही आगे बढ़ने को हुआ तो उसने अपने सामने सुबोध और लल्ली को खड़े पाया. 
सिद्धांत को काटो तो खून नहीं.  उसे लगा धरती फट जाय और वह उसमें समा जाय. 


 क्रमशः ........      
  


  

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

Moon - Solo Dance by Yang LiPing



 
सृष्टि को आकार लेते  देखा है  कभी ? 
 नहीं! 
तो देखिये .......कुछ इस तरह  ......

रविवार, 11 दिसंबर 2011

"ताई ची तू" -छाया और प्रकाश का परिवर्तनकारी चक्र ......चीनी दर्शन का प्रतीक

        संतों के प्रवचनों में माया के ठगिनी होने के आरोपों के साथ उसके परित्याग करने का सन्देश हम सब न जाने कितनी बार सुन चुके हैं. पर इस ठगिनी का परित्याग हो कैसे, यह कोई नहीं बताता. जनसाधारण के लिए " परित्याग कर दो " कह देने से काम नहीं चलता. एक प्रश्न और भी है, माया का परित्याग क्यों ? संतों के प्रवचन एक साधारण व्यक्ति के मन में माया के परित्याग की कोई स्पष्ट रूपरेखा बना सकने में सफल नहीं हो सके हैं.
    किसी किसान के लिए बड़ा दुष्कर है अपनी कृषिउपज के अपर्याप्त मूल्य प्राप्त होने या प्राकृतिक प्रकोप से हुयी क्षति को माया मानकर अप्रभावित बने रहना. किसी चिकित्सक के लिए भी दुष्कर है शरीर में हो रही किसी वैकृतिक प्रक्रिया को माया मान कर उसका परित्याग कर देना. परिवर्तन ही तो कारण है भौतिक जगत का और इस सार युक्त संसार का....जिसे हम "संसार निस्सार है" कहकर उपेक्षित करते रहे हैं. चार पुरुषार्थों के लिए कर्म योग सिखाने वाला भारतीय दर्शन अनायास माया के परित्याग की बात कैसे कर सकता है ? कहीं हम ही तो माया के स्वरूप को समझने में त्रुटि नहीं कर रहे ?
जो स्थिर नहीं है ....सतत परिवर्तनशील है ..गतिशील है ....वह जगत है, क्षरणयुक्त है, नाशवान है, भौतिक है पर संसार की अपेक्षा से उपेक्षणीय नहीं है ...इसलिए असत्य नहीं है ...सारवान है यह संसार. फिर इस सारवान संसार का परित्याग कैसे हो ? ...क्यों हो ? भौतिक और पराभौतिक विज्ञान के सम्मिलित दृष्टिकोण से देखें तो परिवर्तन ही माया समझ में आती है. इस परिवर्तन का परित्याग कैसे हो ? 
परिवर्तन ही ब्रह्माण्ड के व्यक्त स्वरूप की अनिवार्य शर्त है. इसकी उपेक्षा जीवन की उपेक्षा है ...उस जीवन की जो चार पुरुषार्थों का साधन है ......और मोक्ष का भी. चीनी दर्शन में व्यक्त जगत के सभी विपरीत पक्षों को एक-दूसरे का पूरक माने जाने के कारण भौतिक एवं आध्यात्मिक पक्षों का समान समावेश किया गया है. बौद्ध दर्शन भी परिवर्तन और रूपांतरण को प्रकृति का अनिवार्य तत्व मानता है. सुख और दुःख परस्पर सापेक्ष हैं ...पाप और पुण्य भी.....और ये स्थितियाँ भी परिवर्तनशील हैं. तब पलायन से काम नहीं चलने वाला ....इनसे होकर आगे बढ़ना होगा. ...इन्हें स्वीकार करना होगा....सभी विपरीत ध्रुवों के मध्य एक गत्यात्मक संतुलन बनाना होगा....यही है छाया और प्रकाश का परिवर्तन कारी चक्र जिसे चीनी दर्शन के प्रतीक रूप में ताई ची तू के नाम से जाना जाता है. अभी हम अन्धकार की ...तम की बात नहीं कर रहे हैं ...छाया की बात कर रहे हैं ...छाया, जो प्रकाश का दूसरा ध्रुव है .... और प्रकाश को किसी के द्वारा अवरोधित करने  का परिणाम है. यह अवरोध ही विस्तार है दोनों ध्रुवों का. हम इस विस्तार के किसी बिंदु पर खड़े हैं. हमारा सारा संघर्ष इन्हीं अवरोधों को लेकर  है. एक समाप्त होता है तो दूसरा आ जाता है ....दूसरा समाप्त होता है तो तीसरा .....क्रम सतत चलता रहता है....पलायन की कहीं कोई गुंजाइश नहीं. प्रकाश और छाया के मध्य के विस्तार में परिवर्तनों और रूपांतरणों की माया है जो इस ब्रह्माण्ड का स्वभाव है. एनर्जी और मैटर का पारस्परिक रूपांतरण गत्यात्मक है ....YIN  और YANG  दो विपरीत स्थितियाँ है ...और बीज रूप से एक दूसरे के अन्दर समाई हुयी हैं किन्तु उनके मध्य एक निश्चित संतुलन है. यह संतुलन ही जापानियों के ZEN  दर्शन का सार है. जापानी लोग निष्क्रिय जीवन की अपेक्षा सक्रिय एवं फलप्रद जीवन की साधना करते हैं. ZEN  साधना भारतीयों का संन्यास नहीं अपितु जीवन के स्वभाव को सहजता से प्राप्त होने देने की प्रक्रिया है.
अभी छाया और प्रकाश की चर्चा की. अब तम को लें, सत्व और तम दो ध्रुव हैं जिनका विस्तार है रज. सृष्टि के आरम्भ के पूर्व जब सतो गुण नहीं था ......प्रकाश नहीं था .....ऊर्जा का कोई स्पष्ट स्वरूप नहीं था ....अव्यक्त के व्यक्त होने से पूर्व ......न कर्ता था न कर्म ...तब तीनो आदि गुण अव्यक्तावस्था में थे...यह प्रकाश और अन्धकार से परे की कोई स्थिति थी. मैटर जब अस्तित्व में आया तभी प्रकाश भी अस्तित्व में आया. मैटर की माया से विरक्ति इतनी सहज नहीं है. स्वाभाविक परिवर्तन को स्वीकारना और उसे होने देना भी सहज नहीं है. जब हम स्वाभाविकता को स्वीकार कर लेंगे तो माया के आकर्षण का मोह स्वतः ही समाप्त हो जाएगा. गीता का कर्म योग भी परिणाम से निर्लिप्त रहते हुए कर्म किये जाने का है ....स्वाभाविक कर्म....जिसे होना ही है. जीवन से मृत्यु तक के विस्तार का हर परिवर्तन स्वाभाविक ही तो है.                     

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

"नयी रोशनी" सूरज के इतने ख़िलाफ़ क्यों है ......?




मनोज भैया !...सलिल भैया !
एगो सच्चा खीसा सुनावतानी ....
.......................
वर्षों बाद 
बड़ी हुलस के साथ 
मैं गाँव गया था,  
सोचा था ....
नीम को निहारूंगा 
डालकर उसके नीचे खटिया. 
बैठूंगा थोड़ी देर  
बूढ़े बरगद के नीचे, 
करूंगा बातें 
उसकी लाल-लाल कोंपलों से. 
पूछूंगा हाल 
उसकी लटकती जड़ों से.
खेत में जा सहलाऊंगा 
मूंगफली की पत्तियाँ 
कुरेद कर देखूंगा उसके सुतरे -
मूंगफली कितनी बड़ी है अभी 
फिर दबा दूंगा माटी में बड़े प्यार से.
पूछूँगा गन्ने से 
अब मैं बड़ा हो गया हूँ 
उंगली तो नहीं चीर दोगे मेरी ?
वह हँस कर झूम उठेगा ..
कहेगा -
मेरी पत्तियों को छेड़ोगे 
तो सजा आज भी मिलेगी.
मैं कहूंगा -
रे घमंडी ! 
आज तक नहीं बदला तू
वह भरे गले से कहेगा ,
आँखों में भरकर आंसू - 
तू भी कहाँ बदला रे !
तभी आवाज़ देगी मुझे 
खेत में झूमती हरी-हरी मटर
मैं कहूंगा -
फलियाँ आज भी कितनी नवेली सी हैं ...
वह लजा कर कहेगी-
अब वह बात कहाँ ! 
खाद ने चूस लिया सारा रस 
अब तो बस ....
......................
कल्पना के पंख 
टूट गए एक ही झटके में. 
मैं गाँव में ही 
गाँव को खोजता रहा 
बूढा बरगद 
कहीं खोजने से भी नहीं मिला.
गन्ने का स्थान मिर्च ने ले लिया था.
मटर के खेत की जगह 
कोल्ड स्टोरेज खड़ा था
और......
नीम का पेड़ 
अब मात्र हमारी कल्पना में रह गया था .....
छुटकू ने कटवा दिया है उसे......
रोज-रोज पत्तियाँ गिराता नीम 
उसकी नयी नवेली बहू को 
बिलकुल भी पसंद नहीं है. 
"नयी रोशनी" 
सूरज के इतने ख़िलाफ़ क्यों है ......?
अँधेरे का रहस्य गहराता जा रहा है 
वैज्ञानिक कहते हैं .....
कि कृष्ण विवर में बहुत शक्ति होती है .....
प्रकाश को भी निगल लेती है.....
सचमुच मुझे डर लगने लगा है....   
मैं वापस आ गया हूँ 
अब कभी गाँव नहीं जाऊंगा. 
वहाँ 
एक विकलांग शहर उग रहा है.