मंगलवार, 18 जनवरी 2011

सोलह सिंगार

हम तो बैठे थे ..सोलह सिंगार करके
बेसब्री से इंतज़ार में.
वो आये.....
और ताबड़तोड़ करके क़त्ल हमें 
चल दिए अगले शिकार की तलाश में. 
मर गए हम....रह गयी हमारी कविता 
हमारी  लाश पर भिनभिनाती हुई.
ये शहर भी कितना बेशर्म है 
कितना खेलता रहा है मुझसे,  सारी ज़िंदगी.....
मगर दे नहीं सका एक छोटा सा कफ़न भी.
आज आख़िरी वक़्त में.


1 टिप्पणी:

  1. रह गयी हमारी कविता
    हमारी लाश पर भिनभिनाती हुई.
    ये शहर भी कितना बेशर्म है
    कितना खेलता रहा है मुझसे, सारी ज़िंदगी.....
    hmmmmmm..sach he baba...humse khoob kheltaa he..jahaan dil chahe mud jaataa he mudti sadkon ke sath aur hum apne psnd ke mnzil tak pahunhcne ke liye..mudte ehate hain iske sath.............bahut sateeek.rchnaa

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.