बुधवार, 26 जनवरी 2011

प्रतीक्षा है तो बस उस छब्बीस जनवरी की ....

हर दिन ......
मिथ्या संकल्पों, 
प्रतिज्ञाओं 
और योजनाओं से छला गया 
"अभाव" 
बढ़ता ही गया ......
-सुरसा की तरह . 
बढ़ती रहीं वंचनाएँ   
आँखों में धूल झोंकते हुए .
सदुपदेशों से भी नहीं रुका अधर्म
होता गया .....और भी अनियंत्रित 
अब तो ....
प्रतीक्षा है तो सिर्फ 
उस छब्बीस जनवरी की 
जब कोई उत्तर देगा .....इस प्रश्न का 
कि स्वतन्त्र भारत का "तंत्र"
क्या सचमुच 
कभी था ही नहीं अपना ?
बूढ़े की चाहत है 
कि सुबह ज़ल्दी हो
और गुनगुनी धूप
पसर जाए ओसारे में
क्योंकि रात 
बहुत ठंडी और अंधेरी है 


4 टिप्‍पणियां:

  1. आमीन! स्वतंत्र भारत शब्द भी अटपटा सा लगता है... कौशलेंद्र जी, आप की सम्वेदनाएँ दिल को छूती हैं!!

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  2. आपकी पिछली पोस्ट पर टिप्पणी का ऑप्शन नहीं था.. कुछ विशेष कारण था क्या??

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  3. हिन्दू-मान्यतानुसार, 'भारत' (जम्बुद्वीप?) अथवा 'महाभारत' (sansar?) की कथा आरंभ होती है नादबिन्दू (ॐ) से, अर्धनारीश्वर से, जिसका धरातल पर प्रतिरूप (ब्रह्मा-विष्णु-महेश, सूर्य-पृथ्वी का केंद्र-पृथ्वी रुपी पिंड?) गंगा के किनारे आज भी काशी के घाट माने जाते हैं,,,और ब्रह्मा का एक दिन लगभग साढ़े चार अरब वर्ष का होता है, जिस का एक लघु प्रतिबिम्ब मानव और अन्य प्राणियों को भी देखने को मिलता है (औसतन १२ घंटे का दिन और १२ घंटे की रात),,, और उसके पश्चात आती है उसकी रात, दिन जितनी ही लम्बी, भयावह और ठंडी!!!

    और वर्तमान वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे सौर-मंडल की (और पृथ्वी की उम्र भी) लगभग साढ़े चार अरब वर्ष हो गयी है! (जिसकी बढती छाया सी दिखने लगी है???)...

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  4. जब श्रृष्टि का आरम्भ नहीं हुआ था तो क्या २६ जनवरी अथवा १५ अगस्त आदि होते थे? बेचारा (?) परा ब्रह्मा केक- पेस्ट्री से वंचित रहता होगा क्यूंकि वो तो अजन्मा है उसका जन्मदिन तो आता ही नहीं होगा और अनंत होने के कारण कभी भी कोई उसकी सम्भावना नहीं! क्या उसकी पीड़ा वो मानव (अपने ही प्रतिरूप?) के माध्यम से जताता आया है? और हम इतने स्वार्थी (राक्षस?) हैं कि हम इशारा नहीं समझ पाते? क्यूंकि हम बहिर्मुखी हैं, अंतर्मुखी नहीं? और जिस कारण हम मान्यता देते हैं केवल मानव ही को, और उसकी (अधूरी?) रचना को ही ? जिस कारण हमें तालाश रहती है सदैव कुछ नये की?...अनंत प्रश्न जिनका उत्तर केवल एक ही के पास है?,,,और वो बेचारा मौन है, क्यूंकि वो शून्य से जुड़ा है, बेजुबाँ है!!!!?
    किन्तु इशारे तो करता ही होगा? जिसे देखने को (उसके जैसी?) 'तीसरी आँख' चाहिए (जो अन्दर, अँधेरे में देख पाए)?...

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.