गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

सशक्त होते अपराधी


मालेगांव के एडी.एम. यशवंत सोनवणे  की ज़िंदा जला कर ह्त्या कर देने के बाद नागपुर में डी.एस.पी. सहित आठ पुलिसकर्मियों पर हमला और अब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में तांबा-चोर गिरोह पर छापा मारने गयी पुलिस टीम पर किये गए घातक  हमले में प्रधान आरक्षक एस.पी. सिंह की मृत्यु से अपराधियों के बुलंद हौसलों का प्रमाण मिलता है.क्या यह अर्थ लगाया जाय कि हमारे देश में एक  सुगठित अपराध तंत्र अपने अस्तित्व में आ चुका है ...किन्तु यदि ऐसा है तो यह सत्ता के वरद हस्त के बिना संभव नहीं है. पूरे देश को सोचना होगा कि अपराध के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने पर अपराधियों द्वारा अधिकारियों पर एक के बाद एक जानलेवा हमला किया जाना कोई साधारण बात नहीं है. यह सत्ता,न्याय, और व्यवस्था को खुले आम चुनौती देना है. अपराधियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने आप को समाज व्यवस्था से ऊपर मान रहे हैं ...न्याय की उन्हें कोई परवाह नहीं है और उनकी शक्ति सत्ता से भी टक्कर ले सकती है . 
इस सामाजिक उत्परिवर्तन को समझना होगा. अपराध बोध का समाप्त होना और अपराध को अपना अधिकार मान लेने से ही ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं ज़ो कि किसी भी देश और समाज के लिए एक गंभीर संकेत है. यह अभी तक प्रच्छन्न रहे उन नाजायज़ सम्बंधों का प्रमाण भी है ज़ो राजनीति और अपराध के बीच विकसित हुए हैं . यदि इन सम्बंधों पर समय रहते लगाम न लगाई गयी तो इस देश का लोकतंत्र ज्य़ादा दिन नहीं चल सकेगा. क्या देश के प्रबुद्ध लोग इस विषय पर कुछ चिंतन-मनन करेंगे ?    

5 टिप्‍पणियां:

  1. .

    कौशलेन्द्र जी ,

    जहाँ तक मेरा अनुभव है । प्रबुद्ध लोगों में संवेदनशीलता ख़तम हो चुकी है । ज्यादातर तो सुख से कमा-खा रहे हैं और " मस्त राम मस्ती में , आग लगे बस्ती में " की तर्ज पर अपने आप में ही व्यस्त हैं।

    अब कुछ लोग ऐसे हैं जो कठिन परिस्थियों के बीच , मेहनत करके किसी प्रशासनिक पद तक पहुँचते। देश की परिस्थियों कों समझते हैं , देश की बदहाल स्थिति पर दुखी होते हैं, चिंता करते हैं, विचार करते हैं, फिर इमानदारी के साथ सिस्टम से लड़ने की कोशिश करते हैं , पर अनुशासनहीन , पाशविक मानसिकता से ग्रस्त , पैसों के लालची , स्वार्थी भेडिये , उन्हें मार देते हैं।

    जंगल राज है। भयानक दरिंदों से लड़ने के लिए एकजुट होना बहुत जरूरी है । लेकिन अफ़सोस , आपसी एकता भी नहीं है लोगों में ।

    .

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  2. सबसे बड़े अपराधी तो वो हैं जो स्वयम् को तटस्थ बताकर विरोध से पल्ला झाड‌ लेते हैं. जो तटस्थ हैं सअमय लिखेगा उनका भी इतिहास!!

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  3. जाने आगे क्या होगा??? परन्तु आज के हालत तो बहुत ही ख़राब हैं... ऐसे में न तो कोई इमानदार बनने की कोशिश करेगा और न ही विरोध जताने का...
    अब तो वही हालत है... "अकेले पेड़ों का का तूफ़ान"
    परन्तु अब तो एकजुट होना ही पड़ेगा वर्ना शायद नज़ारे हमेश झुकी ही रहेंगी...

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  4. दिव्या जी एवं सलिल भाई ! हम उम्मीद से हैं ...आज यदि मिस्र और सूडान करवट ले सकते हैं तो हम क्यों नहीं ? बस हमें इतना ही तय करना है कि किस छोर से शुरू करें .....और कब ?

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  5. कौशलेन्द्र जी, समस्या हर एक के घर में समय के साथ जमा हुए 'कूड़े-कबाड़' को निकालने समान है - हम निर्णय नहीं ले पाते क्या रखें और क्या निकालें क्यूंकि हमें अधिकतर वस्तु के भविष्य में काम आने की सम्भावना और आशा रहती है भले ही वास्तव में उसके पहले हम ही खुद क्यूँ न चले जाएँ! और यदि पृथ्वी की ओर दृष्टिपात करें तो शायद पाएं कि अधिकतर साकार वस्तुएं 'कूड़ा' ही हैं जिसमें से हम कबाड़ी समान उपयोगी वस्तुवें ही चुनते रहते हैं, और उनको यदि हटा दें तो हम अधर में लटक जायेंगे!

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.