मंगलवार, 8 मार्च 2011

क्या करूँ ?


दर्द के दरिया में मेरा, आशियाना है बना 
जाल ले आये मछेरे, इस हुस्न का अब क्या करूँ ?

हो गयीं दुश्मन रिवाजें, फिर ज़माने की मेरी 
आयतें ख़ुदगर्ज़ हैं, इनको पढ़ कर क्या करूँ ?

इन रिवाज़ों से तलाकें, ले के जी पाया है कौन 
पढ़ लिया कलमा तेरा, अब और पढ़ कर क्या करूँ ?  

इश्क तो हरदम कंवारा, क्या तिज़ारत का असर !       
एक लम्हां जी लिया, इस उम्र का अब क्या करूँ ?


काज़ल चुरा कर आँख से, वो पढ़ गए मेरी ग़ज़ल 
उठ चला लो मैं यहाँ से,ठहर कर अब क्या करूँ ?




4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह डॉक्टर साहब........बेहद ही खूबसूरत गज़ल .......सीधे दिल से निकल कर कागज पर बिखर गई लगती है.........


    इश्क तो हरदम कंवारा, क्या तिज़ारत का असर !
    एक लम्हां जी लिया, इस उम्र का अब क्या करूँ ?


    काज़ल चुरा कर आँख से, वो पढ़ गए मेरी ग़ज़ल
    उठ चला लो मैं यहाँ से,ठहर कर अब क्या करूँ


    आप गज़ल अच्छी लिखते हैं कौशलेन्द्र जी!

    चलते-चलते..........महिला दिवस की शुभकामनाएँ..........

    उत्तर देंहटाएं
  2. काज़ल चुरा कर आँख से, वो पढ़ गए मेरी ग़ज़ल
    उठ चला लो मैं यहाँ से,ठहर कर अब क्या करूँ
    Baba ...kyaa baat he...........waah waah..kehna eko dil ho aayaaa.......ik dam.jaise ke hmaare punjab kehate hain...ki ik dam mast .Gazal bni he...p..p,,,,
    \sach me baba...bdi pyaari gazal hui he
    chunidaa sher to khoob he
    :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. डॉक्टर साहब! आज तो सुर बदले बदले से हैं... मौसम का असर है या डॉक्टर मरीज़ हो चला है!! :)

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.