शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

पूत के पाँव ....

कई क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ अपने जन्म से ही विवादास्पद रहा है  ...उनमें से दो प्रमुख हैं शिक्षा और चिकित्सा. परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग, अभिवावकों की ओर से प्रोत्साहन , भ्रष्टाचार में उच्चाधिकारियों की संलिप्तता, ...और इससे भी बड़ी बात यह कि लज्जास्पद घटनाओं की सतत पुनरावृत्तियाँ.
पिछले एक माह के अन्दर दो बार पी.एम्.टी की परीक्षा का आयोजन और निरस्तीकरण ...पुनः तीसरी बार परीक्षा की तैयारी .....मैं समझता हूँ कि इतनी लज्जास्पद स्थिति कदाचित ही किसी प्रांत में देखने को मिली हो अब तक. छत्तीसगढ़ व्यावसायिक परीक्षा मंडल और लोक सेवा आयोग ने अपकीर्ति के जो शिखर तय किये हैं पूरे देश में वैसी मिसाल असंभव है. इतने वषों में  इस भ्रष्टाचार का एक कोढ़ जो उभर कर आया है वह है अभिभावकों की संलिप्तता. मुन्नाभाई की तर्ज़ पर यहाँ मुन्नीबाई का होना और भी कष्टदायक है. मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में अनुचित साधनों के लिए तेरह लाख रुपये तक की भारी राशि चुकाने वाले अभिभावक इस समाज के लिए कलंक हैं. नकलची छात्रों और नक़ल गैंग के कर्ताधर्ताओं के साथ ही अभिभावकों को भी दण्डित किये जाने की आवश्यकता है.   
      दैनिक भास्कर की मानें तो छत्तीसगढ़ राज्य के मेडिकल कॉलेजेस  में प्रवेश पाते ही पी.एम.टी. में टॉप करने वाले छात्र फेल हो जाते हैं. रायपुर मेडिकल कॉलेज में  ऐसे कई पी. एम. टी. टॉपर छात्र हैं जो 10-15 साल में भी एम.बी.बी.एस. की पढाई पूरी नहीं कर सके हैं. एक टॉपर जिसने सन 2005 में एडमीशन लिया था आज सन २०११ में भी सेकेंडियर का ही छात्र है. 
तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में इतने व्यापक भ्रष्टाचार को किसका संरक्षण मिला हुआ है यह एक अनुत्तरित प्रश्न है. किन्तु इतना तय है कि इस भ्रष्टाचार ने शिक्षा की पवित्रता को दूषित कर दिया है. एम.बी.बी.एस. की प्रतिष्ठापूर्ण शिक्षा प्रश्नों के घेरे में आ चुकी है. ऐसे छात्र डॉक्टर बनने के बाद जनसेवा करेंगे ऐसा  सोचना मूर्खता ही है. तो प्रश्न यह है कि आम जनता के स्वास्थ्य का उत्तरदायित्व क्या ऐसे ही डॉक्टर्स  के भरोसे रहने वाला है ?  प्रवेश परीक्षा में अनुचित साधन के बल पर कई योग्य छात्रों को पटखनी दे कर डाक्टर बनने वाले ये बेईमान समाज के लिए कलंक हैं. अधिकारी और अभिभावक अपने गुरुतर अपराध के लिए क़ानून के शिकंजे से भले ही बच जाएँ पर वास्तव में समाज के गुनाहगार तो  ये बने ही रहेंगे. एक ओर बाबा रामदेव भ्रष्टाचारमुक्त भारत का स्वप्न देख रहे हैं तो दूसरी ओर देश की नयी पीढी भ्रष्टाचार के नित नए मार्गानुसंधान में लिप्त है.इस दोहरे वातावरण में समाज को अपनी दिशा तय करनी ही होगी.      

3 टिप्‍पणियां:

  1. कौशलेन्द्र जी!
    हमारे समय में सभी प्रमुख प्रतियोगिता की परीक्षाओं के केन्द्र बिहार से हटा लिए गए थे. जों प्रतिभाशाली छात्र या प्रत्याशी थे वे बेचारे पैसे खर्च करके उ.प्र. या कलकत्ता जाते थे. इन प्रतिबंधों के उपरांत भी बिहार से या बिहार के प्रत्याशियों का प्रतिशत स्थिर रहा... और तो और मुझे भी अपने प्रवास के दौरान कई बार यह उलाहना सुनाने को मिला कि लोग चोरी से डिग्रियां हासिल करके चले आते हैं!!

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  2. कौशलेन्द्र जी, वैसे यदि देखा जाए तो हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने बहुत पहले जाल-चक्र के 'सत्य' को जान कह दिया था, और हाल में ही महेंद्र कपूर हे शब्दों में भी दोहराया गया, "श्री राम चन्द्र कह गए सिया से कि ऐसा इक दिन आएगा, हंस चुनेगा दाना दुनका/ कव्वा मोती खायेगा"...! जो आपने बयान किया वो 'घोर कलियुग' के प्रतिबिम्ब हैं शायद! जो बिमारी आप देख रहे हैं वो अब हर प्रदेश में फ़ैल चुकी है और 'यथा प्रजा तथा राजा' द्वारा भी गणतंत्र में समझी जा सकती है... मौन मोहन जैसे शरीफ किन्तु लाचार केवल एक मुखौटा समान उपयोग में लाये जा रहे प्रतीत होते हैं...

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  3. सलिल भैया ! बिहार के माथे पर लगा चोरी और भ्रष्टाचार का कलंक एक ऐसी विडम्बना है जिसमें पूर्वाग्रह अधिक है. मुझे भी हर जगह बिहार की फर्जी डिग्री के नाम पर बारबार अपमानित होना पडा है. मुम्बई से एम.डी. इसीलिये नहीं कर सका. जबकि महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्यप्रदेश की प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रथम प्रयास में ही मुझे बेहतरीन स्कोर के साथ सफलता मिली है. मैं आज खुले आम कहता हूँ कि बिहार सबसे अच्छा था और आज भी है. बिहारी छात्रों ने हर जगह...हर प्रांत में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है. आज छत्तीसगढ़ पूरे देश में भ्रष्टाचार का कैपिटल बन गया है.....वह भी बेलगाम घोड़े की तरह ....

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.