गुरुवार, 14 जुलाई 2011

प्रतीक्षा


                                    
  नारी के दुखते मन को हलके से सहला भर दो एक बार फिर तो उसके अंतर्मन की कोई बात छिपी न रह सकेगी आपसे. यह मेरे अनुभव की बात है . यदि ऐसा न होता तो क्यों राहुल की साल भर की ब्याहता मुझ अनदेखे व्यक्ति के सामने सारा भेद रख देती खोलकर ! 



   कल पूछा था उसके पति ने- " तुम नाराज तो नहीं हो मुझसे ?" 
   उत्तर मिला था - "नहीं "
   फिर उसने भी यही प्रश्न पूछा था राहुल से और उत्तर मिला था - "नहीं" . 
   जीवन के अंतिम क्षणों में भी यह नाटक मेरी आँखों के सामने खेल रहे थे दोनों पति-पत्नी. और मजे की बात यह कि दोनों ही यह अच्छी तरह समझ रहे थे कि वे मात्र एक-दूसरे का मन रखने के लिए ही झूठ बोल रहे हैं. 
   चलो, झूठ ही सही, दोनों ने एक-दूसरे के बारे में सोचा तो सही. मैं स्पष्ट अनुभव कर रहा था, तेज आंधी के बाद की शान्ति है यह जिसमें किसी को हवा से कोई परिवाद नहीं, और हवा को भी किसी से कोई बैर नहीं. 
   अभी कुछ ही समय पूर्व राहुल की ब्याहता ने किसी से न बताने की कसम दे कर वास्तविकता बतायी थी मुझे. कैसी विचित्र है नारी ! जो भेद पुलिस अधिकारी के सामने नहीं खोला, किसी डॉक्टर से भी नहीं कहा, वही मुझसे कह डाला सब कुछ. एक अनदेखे व्यक्ति पर इतना विश्वास ! बार-बार पूछा था सभी ने, आखिर ऐसा किया ही क्यों था तुमने ? पर बहू का हरबार वही रटा रटाया उत्तर मिलता- " तुम लोग अपने मन से चाहे जो गढ़ते रहो, मैं तो चाय बना रही थी , धोखे से आग लग गयी थी कपड़ों  में."
   उधर सास सबको यह बता-बता कर परेशान कि आखिर यह सूझा क्या बहू को ? छोटी-मोटी बातें तो हर घर में होती ही रहती हैं. मन नहीं मिलता था तो अलग हो जाती अपने पति को लेकर, मना तो किया नहीं था किसी ने. इधर समाज में एक मत से यह चर्चा चल पडी कि सास ने ही मिट्टी का तेल डालकर जला डाला बहू को . पर बहू ने चुपके से जो बताया था मुझे उसका आशय यह था कि आखिर वह अलग भी हो जाती तो किसे लेकर ? जब पति ही अपना न हो तो जिए भी तो किसके सहारे ? 
    मैं आश्चर्यचकित !  तो क्या विवाद सास -बहू का नहीं ? परन्तु यह तो बाद में स्पष्ट हो सका कि विवाद का मूल न तो पति-पत्नी के बीच था और न सास-बहू के बीच, अपितु विवाद का मूल तो था ...........
  "कोई है ........." 
  बहू के गले से एक क्षीण पुकार सुनकर मैं तुरंत उसके पलंग के निकट जाकर किंचित झुककर पूछता हूँ- " पानी चाहिए ?" 
  " नईं  ................करअट.." ( नहीं करवट ) उसके होठ आग की लपटों में भुन कर अपना मौलिक कर्त्तव्य छोड़ चुके थे इसीलिये उच्चारण में बाधा हो रही थी. 
मिट्टी के तेल, जले चमड़े और औषधियों की एक मिली-जुली तीव्र गंध आती उसकी देह को एक बार आपाद-मस्तक देख मैं कुछ क्षण साहस जुटाने में लगाता हूँ फिर किसी तरह उसे अपनी दोनों बाहों का सहारा देकर दाहिनी करवट लिटा देता हूँ.
   " सोने सी देह मिट्टी कर ली बहू ने "....किसी पंजाबी भाषी महिला का स्वर मेरे कानों में पडा. पलटकर देखता हूँ, सहानुभूति प्रदर्शित करने कुछ स्त्रियाँ आयी हुयी हैं.... उन्हीं में से किसी एक का स्वर था यह. 
    एक बात मैं बराबर लक्ष्य किये जा रहा था कि आने वाली स्त्रियाँ जब सास के पास खड़ी होकर सहानुभूति प्रदर्शित करतीं तो बीच में बहू की सुन्दरता की चर्चा करना न भूलतीं. तो क्या इतनी सुन्दर थी बहू ! रही होगी.............मैं तो पहली बार देख रहा हूँ उसे...वह भी ऐसी स्थिति में जबकि उसकी आँखें भी सूजकर बंद हो गयी हैं...... ....पलकें और होठ जलकर फट गए हैं......चेहरे को छोड़कर पूरे शरीर पर पट्टियाँ ...और चेहरा भी तो जलकर कितना वीभत्स हो गया है. डॉक्टर्स को आश्चर्य, नब्बे प्रतिशत जली होने पर भी वह जीवित कैसे है अभी तक !  स्वयं उसे भी कोई कम आश्चर्य नहीं. मुझसे कह रही थी, " मैं क्या जानूँ जलकर मरने में इतनी असहनीय पीड़ा होती है . अखबार में जब-तब निकलता रहता है ...सैकड़ों बहुएं तो मर गयीं आग लगाकर."
     नारी मन तो है ही विचित्र ......पर मैं अपने भी मन की क्या कहूँ . परसों जब सुना कि पड़ोस के एक घर में किसी की बहू ने मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा ली अपने शरीर में तो उस क्षण मुझे उससे बिलकुल भी सहानुभूति नहीं हुयी, पर जब चिकित्सालय में आकर नारकीय यंत्रणा भोगते हुए उसे जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते देखा तो मैं सहज ही उसके प्रति अन्दर तक आर्द्र हो उठा......पर यही  एक कारण नहीं......इसके अतिरिक्त एक कारण और भी था मेरे द्रवित हो जाने का. 
                                  .................कहानी के शेषांश के लिए प्रतीक्षा करें             

4 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक कहानी....शेषांश की प्रतीक्षा है.

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  2. रोचक कहानी....शेषांश की प्रतीक्षा है.

    आप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

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  3. कथा बहुत मार्मिक लगी..मगर अगली कड़ी का इंतजार है..
    द्रवित होने का दूसरा कारण???

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.