शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

प्रतीक्षा (..प्रथम भाग से आगे )

   
     आधुनिक सुख सुविधाओं में जीने के अभ्यस्त हो चुके हम कितने असहिष्णु होते जा रहे हैं यह आये दिन की घटनाओं से प्रमाणित होता रहता है. हमारी सहनशीलता के घटते स्तर ने हमारे अन्दर उग्रता और हिंसा भर दी है. हमारे मन के विपरीत तनिक कुछ हुआ नहीं कि हम आर या पार की बात सोचने लगते हैं. 
    ...........तो मैं आपको विवाद का मूल कारण बता रहा था.....वह कारण जिसे जानकर मैं भी आश्चर्य चकित रह गया कि बस इतनी सी बात ! ...... इतनी सी बात इतनी बड़ी घटना का कारण भी बन सकती   है भला. किन्तु सत्य तो यही है .......नयी और पुरानी पीढ़ी के बीच बढ़ते जा रहे शून्य का विस्तार आत्मदाह की सीमा तक पहुँच जाय तो यह एक चिंतनीय विषय हो जाता है. जीवन जीने के तरीकों में स्वेच्छाचारिता और उच्छ्रंखलता की स्वतंत्रता का अधिकार चाहने वाली नयी पीढ़ी का एक एक वर्ग उत्तेजना और निराशा का शिकार होता जा रहा है....राहुल की ब्याहता ने इसे प्रमाणित कर दिया था.  रसायनशास्त्र में परास्नातक बहू ने विद्रोह भी किया होता तो ठीक था, पर उसने तो ........ 
     सास-श्वसुर के दिशा निर्देशों से आहत बहू को लगा कि हमारी स्वतंत्रता का तो अपहरण कर लिया इन लोगों ने ...अब जीने का क्या औचित्य ?  ये रोज-रोज सास के ताने वह क्यों सहे भला .....सहना है तो पति सहे ..........उनका खून जो ठहरा. और फिर किसी को क्या अधिकार अपने विचार दूसरों पर थोपने का ? और सच पूछो ....तो राहुल को भी पसंद नहीं था यह सब.... पर लोक-लाज का डर जो ठहरा ! क्या कहेंगे पड़ोसी ...क्या कहेंगे नाते-रिश्तेदार ....अभी साल भर हुआ नहीं ब्याह का कि अलग हो गया जोरू को लेकर ...जोरू का गुलाम कहीं का ! 
      जोरू का गुलाम .......यह एक ऐसी गाली है जिसे जोरू का गुलाम भी सुनना पसंद नहीं करता. तो राहुल ने पत्नी जी से सीमित सम्बन्ध रखना ही उचित समझा...कौन झंझट में पड़े...अपना मतलब निकालो और बाकी जय राम जी की. पत्नी को पति की इस भीरुता से और भी कष्ट. 
      दिन में राहुल की अम्मा ने रो-रो कर कलह गाथा का विस्तृत विवरण दिया था मुझे. क्यों दिया था ...इसका भी एक कारण है. एक तो हमारे समाज में सासें कुछ हैं ही बदनाम उस पर पिछले कुछ दशकों से जल कर मरने वाली बहुओं ने इस धारणा की पुष्टि ही की है. तो राहुल की अम्मा का एक तरह से स्पष्टीकरण था यह. 
       मैं सोचता था कि सासें अपनी बहुओं को खाना नहीं देती होंगी . बेचारी बहूयें एक फटी साड़ी पहने सारे दिन चूल्हे-चौके से खटती रहती होंगी और खूसट सासें पान की गिलौरी मुंह में दबाये पलंग पर बैठी आदेश देती रहती होंगी. फिल्मों के ऐसे दृश्य देख-देख कर मेरे मन में बनी यह धारणा कितनी सत्य थी और कितनी अतिशयोक्तिपूर्ण यह तो ऊपर वाला ही जाने. पर मेरे मन में एक बात सदा से उठती रही है कि क्या सासें सचमुच ही इतनी ही अमानुष होती हैं ? आखिर वे भी तो बहू रही होंगी कभी किसी की. तब ...? तब क्यों होता है यह गृहकलह ...क्यों आत्मह्त्या कर लेती हैं बहुएं ....और बहुएं ही क्यों ...सासें क्यों नहीं करतीं ?  क्या इसलिए कि बहू पराई जायी है ?  
      पर सासों के प्रति मेरी यह धारणा तब की है जब हमारी उम्र गधापचीसी की थी.......जब मैं निरा नासमझ था और इस बहुरंगी ...छली जगत के व्यावहारिक स्वरूप से अनभिज्ञ था. आज तो बहुत कुछ देख सुनकर सही गलत का निर्णय कर सकने में समर्थ हो गया हूँ. जहाँ तक राहुल की अम्मा का प्रश्न है......मेरे अनुमान से झूठ नहीं कहतीं वे. ठीक वैसा ही तो होता है मेरे भी घर में . मेरी पत्नी को भी पसंद नहीं हैं माँ की पुरानी मान्यताएं. सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की के सामने खड़े होकर बहू को बाल संवारते देख टोके बिना रहा नहीं जाता मेरी अम्मा को .  पत्नी भी खीझ कर कहेगी - "अरे अम्माँ ! आदमी अंतरिक्ष में पहुँच रहा है और आप हैं कि अभी तक उन्हीं दकियानूसी मान्यताओं से चिपकी चल रही  हैं " 
     बहू को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता और अम्मा को अपने समय की मान्यताओं के आगे सब कुछ थोथा लगता है. तुरंत कहेंगीं -"मगर बहू ! अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले आदमी भी यान के भीतर सुरक्षित बैठकर ही तो यात्रा करते हैं ...न कि उसके ऊपर बैठकर. बहू-बिटिया को घर ही शोभा देता है ..सड़क या मैदान तो नहीं." फिर तो महाभारत छिड़ते देर लगती है भला ! माँ कहेंगी, हमारे घर में आज तक कभी छिपकली नहीं पड़ी दूध में, जब से ये महारानी जी आयी हैं आये दिन दूध में छिपकली ही पड़ती रहती है. पढी लिखी बहू को भला सहन होगा यह आरोप ? उस पर मेरी पत्नी को तो अपनी परास्नातक उपाधि का बड़ा ही गर्व. तुरंत उत्तर देगी, मैं क्या जानबूझ कर छिपकली पकड़ कर डाल देती हूँ दूध में ?  
      माँ को पत्नी का उन्मुक्त स्वभाव , सभी के सामने सर खोले बातें करना ....चाय का जूठा कप दिन भर पड़े रहना ......न जाने कितनी ही बातें हैं ऐसी जो उन्हें बिलकुल  भी पसंद नहीं हैं. और पत्नी को माँ की सारी बातें ही दकियानूसी लगती हैं.   
    खैर !  कुछ भी हो, मेरा अक्खड़ मन द्रवित था राहुल की आग में जल कर भुन गयी बहू के प्रति . वस्तुतः, कल जब लोकाचारवश  मैं भी रुग्णा को देखने चिकित्सालय पहुंचा तो देखा कि बहू अपने पलंग पर पड़ी तड़प रही है और सम्बन्धियों में से कोई भी पास नहीं फटक रहा उसके. सभी को दुर्गन्ध और घृणा लग रही थी. सब दूर बैठे तड़पता हुआ देख रहे थे उसे. मुझे समझ में नहीं आ रहा था  ...... फिर लोग आये ही क्यों हैं यहाँ ? पड़ोसी भी आकर घर वालों से ही थोथी सहानुभूति प्रकट कर और चलते-चलते कान में कुछ खुसुर-फुसुर करके चले जाते थे वापस. कल तक बहू की सुन्दरता की प्रशंसा करने वाले लोगों को बहू के वीभत्स हो गए चेहरे से डर लगने लगा तथा अब. ऐसे में अपने आपको रोक पाना संभव न था मेरे लिए. पड़ोस में रहकर भी जिस बहू को आज तक देखा नहीं कभी उसी के समीप बैठकर मैंने निःसंकोच उसका शरीर तो छुआ ही मन भी स्पर्श किया...और तभी  निर्मल स्पर्श की ऊष्मा से उसके मन के सारे छाले एक-एक कर फूट कर बहने लगे. 
       " आक्कर................कैसे ई अशा लो उन्झे    ..." ( डॉक्टर ......कैसे भी बचा लो मुझे ) 
       उसका अस्पष्ट करुण चीत्कार सुनायी पड़ता है . मैं फिर निरुपाय हो देखने लगता हूँ उसकी ओर. ......उफ़ ! अपने ही हाथों कैसे दुर्गति कर ली है इसने ! चेहरा कितना वीभत्स हो गया है. सूजन के बाद अंगों में कठोरता प्रारम्भ हो चुकी है अब . निचले जबड़े से लेकर वक्ष तक और दोनों भुजाओं में कठोरता बढ़ती ही जा रही है. कठोर और विदीर्ण हो गए होठों से निकले अस्पष्ट शब्दों को बड़े प्रयास से ही समझा जा सकता है. बोलने में भी कष्ट हो रहा है उसे, फिर भी वह बराबर अपनी पीड़ा को शब्दों से ही अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रही है. सोचने और समझने की विवेक शक्ति भी अभी तक यथावत है उसमें ....जबकि काल का क्रूर पंजा निरंतर उसकी ओर बढ़ता चला आ रहा है. 
   अनायास पूछ बैठता हूँ, " यह क्या हो गया था आपको ....अपने ऊपर इतना अत्याचार ....ऐसा भी क्रोध किया जाता है भला ? "
    वह  रो पड़ी . परन्तु रुदन के करुण स्वर के अतिरिक्त अब कोई और ऐसा चिन्ह शेष न रहा जिससे उसके रोने का अनुमान भी किया सकता. शारीरिक जैव रासायनिक परिवर्तन से उत्पन्न कठोरता की जड़ता ने चेहरे को भाव शून्य कर दिया है . रुदन की विकृत रेखाएं चेहरे को अब और विकृत कर पाने में असमर्थ हो चुकी हैं. नेत्रों की अश्रुग्रंथियों की भी कार्यशक्ति क्षीण हो चुकी है ....मृत्यु पूर्व कितनी यातना सहनी पड़ रही है उसे. उसकी यह दुर्दशा देख मेरी आँखों की सहनशीलता समाप्त हो गयी ...झर पडीं झर-झर.........
    मेरा विचार था कि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति जीवन से निराश और कायर होता है अतः वह सहानुभूति का पात्र नहीं है. पर जब उसने अपनी खंड-खंड आवाज़ में पूछा  -" मैं बच तो जाऊंगी न ! "  तो मेरा ह्रदय भी कंठ को आ पहुंचा...ह्रदय में एक हूल सी उठी........मैं कितना गलत हूँ, आवेश में उसने कर कुछ भी लिया हो पर जिजीविषा पूरी तरह समाप्त कब होती है मनुष्य में. आत्मह्त्या के क्षणों में व्यक्ति की निराशा और कायरता का क्षणिक आवेग अपने चरमोत्कर्ष  पर पहुँच जाया करता है. इन चरम क्षणों में ही घटित होती हैं ऐसी अमानवीय घटनाएँ . ऐसा व्यक्ति यदि बच जाय किसी तरह तब जीवन से सर्वाधिक प्यार करने वाला वही होता है.   
    यह जीवन से मोह ही तो है उसका जो बार-बार रटे जा रही है ......"मुझे बचा लो किसी तरह". इस मोह का एक रूप और भी देखने को मिला मुझे. सुबह उसने असहनीय पीड़ा में गिड़गिड़ा कर कहा मुझसे..."यदि बचा नहीं सकते तो यूँ तड़पा कर क्यों मार रहे हो मुझे ...कुछ नहीं तो ज़हर ही दे दो न ! "
   पर उसे क्या मालुम कि चिकित्साशास्त्र में मरते हुए रोगी को शान्ति से मरने देने का विधान नहीं है. डॉक्टर तो अंतिम साँस तक दवाइयां देता रहेगा ...भले ही रोगी में अरिष्ट लक्षण स्पष्ट क्यों न हो चुके हों.
    " आनी  ..............." उसके विदीर्ण होठों से एक शब्द निकलकर बर्न यूनिट के वार्ड में तैर गया. मैं उसके मुंह में गंगा जल की कुछ बूँदें टपका देता हूँ ( घर वालों का ऐसा ही निर्देश था ) . उसने हलके से सर हिला दिया -"अस्स ......."
     उफ़ ! मृत्यु कितनी भयानक होती है ...और उसकी प्रतीक्षा ......!  वह तो और भी यंत्रणादायक होती है . मृत्यु की आसन्नता निश्चित हो चुकी है. आगरा में माघ की शीतरात्रि  में सब लोग उसकी टूटती साँसें बंद होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं ...कितने दिन हो गए ....ग्रीष्म ऋतु होती तो कब का राम-नाम सत्य हो गया होता. सच ही तो ....शीघ्र मृत्यु हो तो इस यंत्रणा से तो मुक्ति पा जाय बेचारी. पर क्या मृत्यु इतनी सहज है
    रात्रि के दो बज चुके हैं, पूरे वार्ड में शान्ति है. मृत्यु संभवतः चुपके-चुपके अपने पैर बढ़ा रही है. एक ओर बहू अपनी मृत्युशैया पर पड़ी अपनी अंतिम साँसें गिन रही है वहीं दूसरी ओर कुछ दूर हटकर दीवाल के सहारे फर्श पर बिस्तर बिछाए उसका पति और सास खर्राटे भर रहे हैं. मुझे कष्ट हो रहा है और आश्चर्य भी कि लोग ऐसे में सो कैसे लेते हैं
    मैं देख रहा हूँ .....बहू के विकृत और वीभत्स हो गए डरावने चेहरे को ...सुन रहा हूँ उसके अस्पष्ट स्वर .....और अनुभव कर रहा हूँ दो पीढ़ियों के बीच पड़ी खाई की गहराई और उसकी भयानकता को. मुझे एक बात बार-बार खटकती है.....राहुल को भी नींद आ गयी !  कहीं उन दोनों के बीच में भी तो नहीं बन गयी थी कोई खाई


                                                                                  ..............अगले अंक में समाप्त 

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