रविवार, 14 अगस्त 2011

जब हम मुस्कराएँ तो समझ लेना कि यह भी हमारी विवशता है

      भी हम भी मनाया करते थे पंद्रह अगस्त .....पूरे जोश से मनाया करते थे...........हमारे मासूम चेहरे दो दिन पहले से खिल जाया करते थे. पर तब हम बहुत छोटे थे....दुनियादारी की समझ नहीं थी इसलिए किसी स्वप्न लोक में विचरते हुए खुश हो लिया करते थे. 
    अब हम  बड़े हो गए हैं .....हमारे साथ-साथ पंद्रह अगस्त भी बड़ा हो गया है....या यूँ कहिये कि सठिया गया है. सठियाये हुए क़ी सभी उपेक्षा करते हैं. 
     अब पंद्रह अगस्त हमारी उपेक्षा करता है...हम पंद्रह अगस्त क़ी करते हैं.
     पर हम दोनों को किसी क़ी तलाश आज भी है......जिसकी तलाश है वह मिल नहीं रहा.....कौन ले गया है उसे ? ......सब पता है....सबको सब कुछ पता है.....पर कोई कुछ कर नहीं पा रहा. कब दिन आयेगा कुछ कर पाने का ? 
  शैशवावस्था से अनायास ही वृद्धावस्था में पहुंचे हुए पंद्रह अगस्त को अपने अनदेखे बचपन, किशोरावस्था और युवास्था की तलाश है. उसे तलाश है उन लोगों की भी जिन्होंने उसकी उम्र के सुनहले पलों को आने से पहले ही अगवा कर लिया है . वह बड़ी उम्मीद और ललचाई दृष्टि से विदेशी बैंकों की ओर देखता है जहाँ इस देश का रक्त और स्वेद स्वर्णमुद्राओं में बंदी होकर सिसक रहा है. वह बड़ी निराशा से आर्थिक घोटालों और भारत के नैतिक पतन को होता हुआ देखने को विवश  है. सच पूछो तो पंद्रह अगस्त की विवशताओं का कोई अंत नहीं .  
  हमें भी तलाश है ........तलाश है उस स्वप्नफल की जो पंद्रह अगस्त के बाद हमें मिलना तय था, पर न जाने क्यों कभी मिल नहीं सका........बचपन से इस बुढापे तक की यात्रा में वह स्वप्नफल निरंतर और निरंतर दूर होता चला गया है. 
  कल सुबह जब ईसवी शताब्दी के दो हज़ार ग्यारहवें वर्ष के कैलेण्डर में पंद्रह अगस्त एक बार फिर हमें सोते से उठाने की कोशिश करेगा ......हम बड़े ही बेमन से उठेंगे ....एक सरकारी नाटक में शामिल होने के लिए ......एक ऐसा नाटक जो पिछले चौंसठ सालों से पूरी दुनिया को ठग रहा है . हमारा तंत्र एक बार फिर हमें मुस्कराकर तालियाँ बजाने और अपने विषादग्रस्त चेहरे पर मुस्कराहट का नकाब ओढ़ने के लिए विवश कर देगा. 
   निस्संदेह,  अब हम गुलाम नहीं रहे....किन्तु आज़ाद भी नहीं हो सके ........हम नहीं जानते कि इस स्थिति को क्या नाम दें  जिसमें कोई किसी को सरेआम पूरी निर्लज्जता से निरंतर लूटते रहने को स्वतन्त्र  रहता है. 
   इस देश पर लुटेरों का वर्चस्व है .....निर्लज्ज लुटेरों का वर्चस्व.... जिनके पास क़ानून बनाने का अधिकार है ...अपनी  सुविधा के अनुसार हमें लूटते रहने के अधिकार का क़ानून. 
    इनका बनाया तंत्र इनकी रक्षा करता है ...और वही हमारा सर्वनाश भी.....हम हमारा सर्वनाश होता हुआ देख रहे हैं....बड़ी पीड़ा .....और बड़ी खामोशी से. यह खामोशी हमारे जले पर नमक छिड़कती है और उन्हें देती है अभय का वरदान .
   हमारी हंसी खोयी नहीं है कहीं ......बल्कि सरेआम लूट ली जाती है रोज़. 
   कल सुबह जब हम मुस्कराएं तो समझ लेना कि यह भी हमारी विवशता है.

14 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति.....

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.

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  2. कौशलेन्द्र जी, जो दिख रहा है, यानी होता प्रतीत हो रहा है, उसका आपने सही वर्णन किया. धन्यवाद् सभी 'आम भारतीय' की व्यथा प्रस्तुत करने के लिए!

    इसे संयोग कहें कि किसी अदृश्य शक्ति का डिजाइन कि मैंने भी तिरंगे को '४७ से अन्य भारतवासियों की नक़ल कर वर्षों सलामी दी...किन्तु एक दिन, टीवी पर, लगा झंडे में मुझे 'मेरा' ही प्रतिबिम्ब दिख रहा था!...

    वो इशारे कर रहा था कि जब हम उस में गुलाब की पंखुड़ियां रख रस्सी में बाँध लटका देते हैं तो क्या अपनी गुलामी की याद नहीं आती? रस्सी से बंधा किन्तु अपने ह्रदय में अच्छाई समेटे!

    'वी आई पी' के आ रस्सी खींच आनन् फानन में मुक्ति पा आकाश में फहराने में क्या हम अपनी स्वतंत्रता का अहसास नहीं होता?

    किन्तु दूसरी ओर, दोष शायद हवा का नहीं है क्या कि जैसे हमने ऊंचाई पा ली हमारी अच्छाई हवा ने हर ली, पंखुड़ियां बिखर गयीं, और 'हवा लगते ही' हम गर्व से फड़फड़ाने लगते हैं और ऊंचाई पा नीचे सलामी देते 'आम आदमी' हमें तुच्छ लगते हैं?

    हवा रुक जाने पर ही लगता है स्वतंत्रता का अर्थ ही पता नहीं है जब झंडा, धरा पर शाष्टांग करते व्यक्ति समान, अपने आधार, डंडे पर, सिमट जाता है, शायद सोचते कि लोग सलामी मुझे दे रहे थे अथवा डंडे को?

    शायद स्वतंत्रता दिवस द्योतक है मोक्ष का, परम ज्ञान को पाने का! आदि, आदि,,,

    'स्वतंत्रता दिवस' की सभी भारतीय ही नहीं अपितु सभी सांसारिक प्राणीयों को बधाई!

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  4. अब हम गुलाम नहीं रहे....किन्तु आज़ाद भी नहीं हो सके ........हम नहीं जानते कि इस स्थिति को क्या नाम दें जिसमें कोई किसी को सरेआम पूरी निर्लज्जता से निरंतर लूटते रहने को स्वतन्त्र रहता है.
    @ हमने राष्ट्रीय ध्वजारोहण को तो नाम दिया ..... सरकारी तमाशा.
    अपनी 'आजादी' को मुझे एक नाम सूझ रहा है..... खूँटिया आजादी. ......... केवल खूँटे के इर्द-गिर्द घूम पाने की संवैधानिक-रज्जू हमारी श्वास-नलिकाओं में घुसा दी गयी है.
    जो इलेक्ट सांड इस खूँटिया आजादी से निकल भागे .... वे आज़ थुल-थुल बंड बने देश-विदेश में घूम रहे हैं.
    मैं आरम्भ में 'स्वतंत्र' का अर्थ किया करता था ........... स्वयं के लिये खुद नीति-नियमों का निर्धारण करना... मतलब स्वयं पर शासन करना .. न कि मनमाने रूप से जो मर्जी आये करना... और एक रूपक दिया करता था.... अपने लिये एक खूँटा स्वयं गाढ़ना और उस मर्यादा को नहीं लांघना जितनी रज्जू आपने अपने खूँटे से जोड़ी है...
    लेकिन आज उसी खूँटिया आजादी की नये सन्दर्भ में आलोचना करता हूँ... क्योंकि ये खूँटिया आजादी लादी हुई है, स्वैच्छिक नहीं.

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  5. जे.सी. की बातों में सत्य के दर्शन करता हूँ. ...... राष्ट्रीय समारोहों में जन-गन गाते बालकों को मालूम ही नहीं होता कि हमारी आस्था किसके प्रति है... हमारी सलामी, हमारा नमन किसके प्रति है . देश के, ध्वज के या फिर उस व्यक्ति के प्रति जो ध्वज आरोहण के लिये नियुक्त है?.... बालक क्या बड़े-बड़े नहीं जान पाये कि हम ध्वज के बहाने किसे याद कर रहे हैं... अपनी बीती गुलामी को अथवा अपनी भुक्त वर्तमान ज़िंदा गुलामी को..... हम बाध्य किये जाते हैं... अंग्रेजी बोलने को... हम बाध्य किये जाते हैं... उस कल्चर में ढलने को जिसका हमारे आदर्श पुरुषों में किञ्चित मात्र दर्शन नहीं होता था... हम फूहड़ नगमों से प्रेम (देश अथवा मानव) का सन्देश प्रसारित करने को बाध्य किये जाते हैं.... चुटकुलों से देश-प्रेम का इज़हार करते हैं... 'मनोरंजन' माध्यम से विजयनी-मानवता का मुकाम पाना चाहते हैं.

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  6. rongte khade ho gaye satya ke aage .... yah 15 august bhi khaas hai, kai logon ki kalam na sach kaha hai, sirf sach - vande matram

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  7. प्रतुल जी, अष्टभुजा धारी दुर्गा माता से याद आया कि जब मानव दृष्टि में अज्ञानी, मामूली किन्तु अष्टभुजा धारी मकड़ी, पापी पेट की संतुष्टि के लिए जाला बुनती है तो उसे भी कम से कम इतना पता होता है कौन सी रज्जुओं को चिपचिपा बनाये,,, जिसमें गरीब कीड़े- मकौड़े आ फंसे,,, और किसे अपने स्वतंत्रता पूर्वक निर्बाध विचरण के लिए साधारण, बिना किसी ग्ल्यू के :)

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  8. सब कुछ खोकर भी मुस्कराते रहना .....इससे बड़ी विवशता और क्या हो सकती है कौशलेन्द्र जी .....मैं नतमस्तक हूँ आपकी इस अभिव्यक्ति के सामने......हम सबके मन की पीड़ा और कड़वाहट को आपने शब्दों का जामा पहनाया....साधुवाद.....

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  9. देश के वर्तमान से हम सब दुखी हैं ....आक्रोशित हैं . शरद जी ! मैं किसी को बधायी देने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ....हाँ ! हम सब देश की नव स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए संकल्प ले सकें इसलिए सभी का आह्वान अवश्य कर रहा हूँ .
    जे.सी. जी ! मोक्ष का अधिकारी होने के लिए भी पात्रता चाहिए ....शायद उसी का अभाव है हम सब में. न भौतिक मोक्ष मिल पा रहा है और न आध्यात्मिक.
    प्रतुल भैया ! सबने अपने-अपने खूंटे गाड़ रखे हैं...सबकी रज्जुओं की लम्बाई भी अलग-अलग है ....जिसकी रज्जू जितनी लम्बी ...चरने की उसे उतनी ही अधिक स्वतंत्रता. हम स्वतंत्रता की मर्यादा को कभी समझ ही नहीं पाए ....सब लोग अपने-अपने तरीके से स्वतन्त्र हैं ....कुछ अधिक ही स्वतन्त्र हो गए गये हैं.
    रश्मि जी ! अब लोग मुखर होने लगे हैं ....मतलब, अब हम आज़ादी को समझने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. अब छद्म प्रशंसा और प्रसन्नता की नहीं कड़वी सच्च्चाई को स्वीकारने की ज़रुरत है.
    मालिनी जी ! स्वतंत्रता हो या आज़ादी ...या फिर नारी ......तीनों ही संबोधन स्त्री जाति की श्रेणी में आते हैं. और आपतो अच्छी तरह जानती हैं कि सब कुछ खोकर भी मुस्कराते रहने की नियत किसकी है .....! किन्तु इस नियति को बदला जा सकता है .....हमें कोशिश तो करनी ही चाहिए न !

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  10. आदरणीय डॉ.कौशलेन्द्र जी
    सादर वंदे मातरम् !
    कल रात को आपने जब यह पोस्ट डाली थी तब ही पढ़ चुका था …आज दिन की कुछ अलग ही समस्याएं रहने के कारण अब लौट कर आ पाया हूं …

    आपकी लेखनी हमेशा ही मुर्दा नसों को जाग्रत करती रही है …
    प्रस्तुत आलेख भी अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय है ।
    बेशक मैं तथाकथित स्वाधीन देश में ही जनमा …लेकिन बुजुर्गों के पास बैठते रहने के कारण बहुत सारे ‘सचों’ से भी परिचय बचपन में ही हो जाने के कारण इस छद्म आज़ादी से संतुष्ट कभी नहीं पाया स्वयं को …

    इस देश पर लुटेरों का वर्चस्व है .....निर्लज्ज लुटेरों का वर्चस्व.... जिनके पास क़ानून बनाने का अधिकार है ...अपनी सुविधा के अनुसार हमें लूटते रहने के अधिकार का क़ानून.
    …और इन लुटेरों के नपुंसकत्व के चलते हर ओर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए अन्य अपराधियों के सक्रिय होने के कारण
    मेरी झल्लाहट इन शब्दों में बाहर आती है -

    सियासतदां नशे में हैं या फ़िर आवाम सोई है
    खुले फिरते गुनहगारों के लश्कर मुल्क में मेरे


    आपका आलेख तारीफ़ के चंद शब्दों से बहुत ऊपर है …

    इनका बनाया तंत्र इनकी रक्षा करता है ...और वही हमारा सर्वनाश भी.....हम हमारा सर्वनाश होता हुआ देख रहे हैं....बड़ी पीड़ा .....और बड़ी खामोशी से. यह खामोशी हमारे जले पर नमक छिड़कती है और उन्हें देती है अभय का वरदान

    मृतक समान प्रतिक्रियाविहीनता से उकता कर ही मैंने कहा है-

    न सुनते , देखते ना बोलते ; हालात जो भी हो
    बचे हैं शेष गांधीजी के बंदर मुल्क में मेरे


    मेरी इस पूरी रचना के लिए मेरे यहां आइएगा अवश्य …

    रक्षाबंधन एवं ‘स्वतंत्रता दिवस’ और तीज की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  11. हर सच्चा हिन्दुस्तानी खून के आंसू ही बहा रहा होगा , मुस्कुराहट है तो उन गुजरे पलों की याद में जिन्होंने आज़ादी की सांस का आभास दिया था !

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  12. कौशलेन्द्र जी,
    बहुत सही कहा कि ''जब हम मुस्कुराएँ तो समझ लेना कि यह भी हमारी विवशता है''. स्वतंत्रता दिवस महज़ एक छुट्टी के दिन के सिवा कुछ नहीं रह गया है, जिसे सरकारी संस्थानों में और लाल किले पर झंडा फहरा कर मना लिया जाता है और औपचारिकताएं पूरी कर ली जाती हैं. १५ अगस्त हमारी हीं तरह खोखली हँसी हँसता है, क्योंकि अपनी दुर्दशा कहे भी तो किससे? लेकिन सवाल है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या हम नहीं? हम आम जनता जिसके पास तख़्त पलट देने की क्षमता है, फिर भी सब ख़ामोश हैं.
    आपके लेख से जागरूकता आये, इसी आशा के साथ बहुत बधाई और शुभकामनाएँ.

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  13. इस कविता का रूप देकर मुझे दीजियेगा संग्रह के लिए ......

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  14. शगुफ्ता लोग भी टूटे हुए होते हैं अंदर से,
    बहुत रोते हैं वो जिनको लतीफे याद रहते हैं!!
    डॉक्टर साहब! यहाँ हर कोइ पता नहीं कितने आंसू छिपाए मुस्कुरा रहा है!!

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.