शनिवार, 3 सितंबर 2011

नहीं अब वक्त है उनका.



हंसी बेशर्म है उनकी, करम बेशर्म है उनका 
वतन को बेचते हैं वो, धरम बेशर्म है उनका. 

खुदी में डूब कर खुद को, खुदा ही मान बैठे जो 
बता औकात दे उनकी, नहीं अब वक्त है उनका.

ज़माने से उन्हें हमने, ज़रा भी है नहीं छेड़ा .
उन्होंने हर समय फिर भी, जी भर-भर के दिल तोड़ा .

हदों को ढूँढते हैं हम, हदें फिर भी नहीं मिलतीं .
हदें उनके इशारों पे, न जाने अब कहाँ रहतीं 

सुना है तोड़कर सारी, हदें मरघट में हैं फेकी 
अपनी रोटियाँ जी भर, शवों की आँच पर सेकी .

मंदिर की दिवारों पर, न होगा नाम अब तेरा 
छलक कर आ गया बाहर, भरा है पाप घट तेरा

9 टिप्‍पणियां:

  1. डॉक्टर साहब!
    सच तो यही है और सच सबको पता है.. लेकिन साधो इस मुर्दों के गाँव में कौन जगाने आएगा!!

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  2. खुदी में डूब कर खुद को, खुदा ही मान बैठे जो
    बता औकात दे उनकी, नहीं अब वक्त है उनका.
    बस्तर की यह अभिव्यक्ति तो कहीं से भी बासी नहीं है -चिर नवीन ऊर्जा से ओतप्रोत !

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  3. मिश्र जी ! बस्तर में सब ताज़ा ही ताज़ा है बासा कुछ नहीं मिलता..

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  4. .

    @-हदों को ढूँढते हैं हम, हदें फिर भी नहीं मिलतीं .
    हदें उनके इशारों पे, न जाने अब कहाँ रहतीं

    -------------

    जिन्हें अपनी हदें नहीं मालूम ,
    वो ज़माने की हदें तय करते हैं।
    रुलाकर अपनी जनता को ,
    नरक के कर्म वो करते हैं...

    .

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  5. दिव्या जी ! गहरी बात पकड़ कर सुर मिलाया है आपने ......इन नयी पंक्तियों के लिए धन्यवाद !

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  6. हदों को ढूँढते हैं हम, हदें फिर भी नहीं मिलतीं
    हदें उनके इशारों पे, न जाने अब कहाँ रहतीं ।

    सुना है तोड़कर सारी, हदें मरघट में हैं फेकी
    अपनी रोटियाँ जी भर, शवों की आँच पर सेकी ।

    बेहतरीन शायरी का नमूना प्रस्तुत किया है आपने।

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  7. @ "सुना है तोड़कर सारी, हदें मरघट में हैं फेकी
    अपनी रोटियाँ जी भर, शवों की आँच पर सेकी ."

    'सत्यवादी' राजा हरिश्चंद्र को भी पहुंचा दिया था श्मशान में,
    सत्यम शिवम् सुन्दरम वाले शिव के निवास स्थान में
    किन्तु यह कलियुग है सतयुग नहीं
    अब तो सत्यवादी जनता है बैठी वहाँ...

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.