शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

आरक्षण की माया+दलितों की माया = मायावती की माया -विकास -विकास -विकास......

बा अदब ! बा मुलाहिजा होशियार ! 
एक खौफ़नाक ख़बर है .........दिल थाम कर सुनियेगा ....
उत्तर-प्रदेश में अगले वर्ष चुनाव होने हैं ....................और ख़बर है कि मायावती मुस्लिमों को आरक्षण देने की माँग कर रही हैं. 
वे स्वयं को दलित प्रचारित करती हैं...और सम्राटों की तरह ऐश्वर्य भोग करने वाली मलिका-ए-उत्तरप्रदेश का रुतबा रखती हैं. भारत का कोई भी आम नागरिक यह जानने के लिए उत्सुक है कि क्या उन्होंने यह रुतबा आरक्षण की बैसाखियों से प्राप्त किया है ? क्या कोई दलित इन बैसाखियों के बिना बाबा साहेब आम्बेडकर नहीं बन सकता ? 
यदि माया को मिली माया का मूल आरक्षण की शिथिलता से उर्वरता प्राप्त करता है तो उन्हें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह व्यवस्था पर्याप्त है और उन्हीं की तरह अन्य लोग भी इसी व्यवस्था का लाभ लेते रहेंगे, इसमें कुछ और नया करने की क्या आवश्यकता ? किन्तु यदि बाबा साहेब की उपलब्धियाँ उन्हें अपनी क्षमताओं के कारण मिली हैं तो ऐसी ही क्षमता अन्य लोग भी क्यों नहीं अर्जित करते और क्यों नहीं लोगों को ऐसी क्षमता अर्जित करने के लिए उत्साहित-प्रोत्साहित किया जाता ?  
वस्तुतः आज राजनीति में कोई रुतबा हासिल करने के लिए किसी प्रशंसनीय गुण की आवश्यकता नहीं रह गयी. कूटनीतिक जोड़-तोड़, निम्नस्तरीय छल, जनता में दृढ़ता की कमी  और तामसिक परिस्थितियों से बने  शोषक समीकरण देश के अवसरवादियों को उनके अभीप्सित भेंट करते रहेंगे.  सत्ता सुख के लिए कुछ भी कर गुज़रने के लिए पागल हो रहे राजनीतिज्ञों से जनता के हित की अपेक्षा करना व्यर्थ है . 
जनता के हित की छद्मचिंता से ग्रस्त होने के अभिनय में कुशल राजनीतिज्ञों से देश के लोग जानना चाहते हैं कि  देश को छल रही सरकारें जनता को कब तक बैसाखियाँ पकड़ाती रहेंगी ? 
दुर्बल वर्ग को बैसाखियों की नहीं अच्छे सोसियोथिरेपिस्ट की ज़रुरत है. जातिगत आरक्षण अपात्र को अपात्र बने रहने देने का और सुपात्र को उसकी क्षमताओं से देश को वंचित करने का निर्मम षड्यंत्र है. देश की जनता ...विशेष कर आरक्षित वर्ग को यह मंथन करना होगा कि आरक्षण की एक लम्बे समय से चली आ रही व्यवस्था से अब तक उनका कितना गुणात्मक उन्नयन हुआ है ? 
गुणात्मक उन्नयन के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है उनकी उपेक्षा करते रहने से बौद्धिकविकलांगता तो बढ़ेगी ही, देश में वर्ग-भेद भी बना रहेगा......अगले, पिछड़े, अतिपिछड़े, दलित, अतिदलित, अनुसूचितजाति, अनुसूचितजनजाति, मुस्लिम, ईसाई (आदि के अतिरिक्त....वैचारिक गर्भ में पल रहे अन्य समाज तोड़क वर्गों की कल्पनाएँ जो भविष्य में कभी भी जन्म ले सकती हैं) की खाइयाँ और भी गहरी और चौड़ी होती रहेंगी. 
अब समय आ गया है कि आरक्षित वर्ग के लोग स्वयं अपने गुणात्मक विकास का प्रयत्न करें और बैसाखियों का व्यामोह छोड़ें. आरक्षण एक ऐसा बौद्धिक कैंसर है जिसकी मेटास्टेसिस को आगे रोकना होगा. इस कैंसर से छद्म चिकित्सक बन कर रहनुमाई करने वाले मात्र राजनैतिक दलों का ही लाभ है, पीड़ित का लेश भी नहीं. पीड़ित आने वाले समय में कॉमा में चला जाय इससे पहले उसे अपना चिकित्सक स्वयं बनना होगा. 
जातिभेद और शोषण के विरुद्ध वर्गहीन, सामाजिक समानता और सुख के कल्पना जगत में मोहित हुआ समाज का लुब्धवर्ग धर्मांतरण के बाद भी त्यक्त व्यवस्था की दुहाई देकर ...उसी त्यक्त जाति, वर्ग-भेद और सामाजिक असमानता के नाम पर किसी अनपेक्षित लाभ की आशा क्यों करना चाहता है ? उसे अपने नए धर्म की व्यवस्था में ही विकास के पथ खोजने चाहिए ...यदि ऐसा कर पाने में वह असफल रहता है तो उसे यह घोषित करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि धर्मांतरण के नाम पर उसे ठगा गया है और यह भारतीय समाज को विखंडित करने की विदेशी कुनीति का एक पक्ष है.
यह भी विचारणीय है कि समाज में बौद्धिक और सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों में क्या धर्म की भी कोई भूमिका है ? आखिर क्यों किसी धर्म विशेष के लोगों का भारतीय समाज में रहते हुए....समान नागरिक सुविधाओं का उपयोग करते हुए भी  विकास नहीं हो पाया ?  या फिर इस पिछड़ेपन के कोई अन्य कारण भी हैं ? 
जहाँ तक पिछड़ेपन का प्रश्न है, भारतीय ( और पाकिस्तानी भी ) समाज के सभी धर्मों की सभी जातियों में कुछ लोग पिछड़ेपन के शिकार हैं. इन पिछड़े हुए लोगों में तथाकथित अगली जातियों के लोग भी हैं. सच तो यह है कि आर्थिक विपन्नता और सामाजिक कुरीतियों को दूर किये बिना किसी भी प्रकार का आरक्षण गुणात्मक विकास में सहायक होने के स्थान पर बाधक ही रहा है ...यह प्राकृतिक विकास के सिद्धांतों के विपरीत भी है. किसी भी धर्म के अनुयायियों को धर्म और जाति निरपेक्ष रहते हुए केवल और केवल विकास की समान मौलिक सुविधाओं की माँग करनी चाहिए.  
हमारा दावा है कि फिलहाल अगले कई वर्षों तक आने वाली कोई भी सरकार समान मौलिक सुविधाएं उपलब्ध कराना सुनिश्चित नहीं करेगी.   





  

7 टिप्‍पणियां:

  1. चला बिहारी ब्लॉगर बनने माता का भक्त भला
    बस्तर की अभिव्यक्ति -जैसे, झरना फूट चला
    महिला-पुरुष विमर्शी गाथा, इतिहासिक दृष्टि डला
    शुक्ला बोल पड़े मतदाता, कोलाहल बड़ा खला

    लिंक आपकी रचना का है
    अगर नहीं इस प्रस्तुति में,
    चर्चा-मंच घूमने यूँ ही,
    आप नहीं क्या आयेंगे ??
    चर्चा-मंच ६७६ रविवार

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. *लोगों ने हरदम किया, महापलायन खूब |
    *हाथी जो होता नहीं, यू पी जाता डूब |

    *यू पी जाता डूब, बड़ी किरपा की बहना |
    *यन यस पी डी खूब, सजे गुजराती गहना |

    *हाथी पर अब बैठ, ठगिन-माया को भोगो |
    *बढ़िया तर्क - रिपोट, लौट कर आओ लोगों ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. सार्थक चिंतन!!
    जातिगत आरक्षण अपात्र को अपात्र बने रहने देने का और सुपात्र को उसकी क्षमताओं से देश को वंचित करने का निर्मम षड्यंत्र है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. हम तो भाई अभी भी अपने मूल को ढून्ढ रहे हैं... 'माया जाल' को समझने के लिए...
    पहले भी मैंने लिखा था -

    डॉक्टर कौशलेन्द्र जी, सोचने वाली बात यह है कि इतने बड़े, अनंत ब्रह्माण्ड के शून्य में हमारी बीच में मोटी और किनारे की ओर पतली, अनंत आकार वाली सुदर्शन-चक्र समान दिखने वाली गैलेक्सी, और उसके भीतर उसके बाहरी ओर अवस्थित सौर-मंडल के एक छोटे से सदस्य पृथ्वी ग्रह में हम कौन हैं? कहाँ से आये हैं? किस लिए आये हैं? और हमारी मन की आँख में स्वप्न कहाँ से और क्यूँ दीखते हैं - हमें मानवों को ही नहीं अपितु निम्न स्तर के कई पशुओं में भी? और यह ही नहीं, जागृत अवस्था में भी प्रतिपल विचार कहाँ से आते हैं?

    इसी लिए हमारे पूर्वजों के माध्यम से प्रश्न पूछा गया है, "मैं कौन हूँ?"
    और उत्तर भी दिया गया है, "शिवोहम!" "तत त्वम् असी!"...
    उन्होंने तो शिव अथवा 'परम सत्य' को पा भी लिया!
    और हम कलियुगी प्राणी असत्य में ही उलझे हुए हैं, वैसे ही जैसे मकड़ी के जाल में उसका भोजन, एक कीड़ा!
    और हम भी भोजन की श्रंखला में शीर्ष स्थान पर हैं!
    हमारी मिटटी तो अग्नि जला देती है और जो फिर से धरा पर ही रह जाती है...

    उत्तर देंहटाएं
  5. aarakshan se hamara desh kai samoohon mein bant gaya hai aur aapsi vaimanasya bhi badhta ja raha hai. koi bhi sarkar ho is mudde ke bal par sirf satta pana chaahti hai na ki sudhaar. jaatigat aarakshan aapsi bhed bhaav ko badhaane ke liye kiya gaya hai. agar desh ki aur janta ki fikra hoti to aarakshan ka aadhar sirf aarthik hota. samaan suvidha aur saman awsar diya jana chaahiye. aapne bilkul sahi likha hai...
    जातिगत आरक्षण अपात्र को अपात्र बने रहने देने का और सुपात्र को उसकी क्षमताओं से देश को वंचित करने का निर्मम षड्यंत्र है.

    aapki lekhni se jaatigat aarakshan ke samarthakon mein kuchh saarthak soch vikasit ho, aisi aasha rahegi. dhanyawaad.

    उत्तर देंहटाएं
  6. जब पृथ्वी आदि ग्रहों के शक्ति के मुख्य स्रोत सूर्य समान देवता (ब्रह्मा? जिस में 'ब्रह्मास्त्र' समान हाइड्रोजन बम फटने से शक्ति उत्पन्न हो रही है), और विषैले वातावाराब वाले राक्षस शुक्र ग्रह के - (अर्थात परोपकारी और स्वार्थी ग्रहों के) - मिले जुले प्रयास से, देवताओं के गुरु बृहस्पति (जुपिटर ग्रह जो उच्च दबाव में तरल हाइड्रोजन गैस का स्रोत है) की देख रेख में, अर्थात उस को केंन्द्र में 'विष्णु की नाभि' में रख, 'क्षीर-सागर मंथन' आरम्भ हुआ तो सबसे पहले 'विष' उत्पन्न हुआ, जिसे महाशिव के गले अर्थात शुक्र ग्रह में ग्रहण कर लिया गया! और इस प्रकार चौथे चरण के अंत में सोमरस अर्थात चन्द्रकिरण यानी अमृत संभव हो पाया पीताम्बर कृष्ण, विष्णु के मोहिनी रूप, की कृपा से :)

    और क्यूंकि 'हम' मानव भी अनंत नवग्रह के सार के मिश्रण से बने हैं, किन्तु केवल हमारी और आपकी परमात्मा का ही एक अदृश्य अंश आत्मा ही अमृत और अनत है, और मिटटी से बना शरीर अस्थायी, किन्तु दृष्टि दोष के कारण सत्य प्रतीत होने के कारण, हम 'माया' अथवा 'योगमाया' में उलझ गए हैं भौतिक और आध्यात्मिक में समन्वय न होने के कारण, और अंत तक उलझे रह जाएँ यदि परम गुरु, परमात्मा, की हम पर कृपा दृष्टि न हो जाए :)

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेर नए पोस्ट पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.