शनिवार, 12 नवंबर 2011

अथ टिप्पणी कथा ........

सभी लोगों को सादर नमस्कार ! 
कुछ दिनों के लिए बाहर चला गया था ...आज वापस आया हूँ. इस बीच कई लोगों की पोस्ट्स देखने का अवसर नहीं मिल सका. 
पिछले कुछ दिनों से कुछ अपवादों को छोड़ कर अपनी पोस्ट्स पर मैंने टिप्पणियों का विकल्प बंद कर दिया था. अब पुनः प्रारम्भ कर रहा हूँ. बंद करने का कारण यह था कि एक ब्लोगर द्वारा टिप्पणियों को लेकर मुझ पर दो आरोप लगाए गए थे, पहला यह कि मैं ब्राह्मणवादी हूँ और दूसरा यह कि टिप्पणियाँ खोने के डर से मैं उनके द्वारा नापसंद किये गए ब्लोगर्स का विरोध नहीं कर पाता एवं तटस्थता की स्थिति में हूँ.  
मैंने इन आरोपों का उत्तर टिप्पणियों का विकल्प बंद करके देने का प्रयास किया. मेरे द्वारा निर्धारित समय सीमा के समाप्त हो जाने के बाद भी मैं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका अस्तु विकल्प पुनः प्रारम्भ कर रहा हूँ. मैं एक बात और कहना चाहता हूँ कि मैं जो भी लिखता हूँ वह टिप्पणियों के लिए नहीं लिखता. लेखन का उद्देश्य टिप्पणियाँ नहीं हैं......अभिव्यक्ति है. टिप्पणियाँ तो विमर्श के लिए हैं ...जिससे विचारों और लेखों को और परिष्कृत किया जा सके. यूं भी मेरे ब्लॉग पर टिप्पणियों की सख्या इतनी नहीं होती कि मुझे टिप्पणियों का लालची कहा जा सके. मैंने इसके लिए कभी कोई प्रयास भी नहीं किया. कभी करूंगा भी नहीं.
लोग टिप्पणियों को इतना महत्त्व क्यों देते हैं.....इसके विश्लेषण में जाने पर दुःख होता है. बस एक बात कहूंगा कि कुछ लोग जीने के लिए खाते हैं तो कुछ लोग खाने के लिए जीते हैं. यही बात लेखन और टिप्पणियों के बारे में भी है. 
इस पूरी कथा का प्रारम्भ ब्लोगर्स के आपसी विवादों...टिप्पणियों-प्रतिटिप्पणियों....अशोभनीय भाषा के प्रयोग, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की वृत्ति, आत्म्श्लाधा, महान होने के प्रदर्शन ...आदि से होता है. ब्लोगिंग में बहुत कुछ अच्छा हो रहा है तो बहुत कुछ अशोभनीय भी हो रहा है. अभी तक हिन्दी ब्लोगिंग में संविधान की आवश्यकता पर गंभीरता से विचार नहीं हो सका है.....इसीलिये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग संभव हो सका. 
कभी किसी की पोस्ट पर .....किसी नुक्कड़ पर मुझे कुछ भला नहीं लगा तो अपने तरीके से मैंने उसका विरोध भी किया. यह संभव नहीं है कि विरोध का तरीका वही हो जो लोग चाहते हों. विरोध करने वाला बाध्य नहीं है आपके तरीके से विरोध करने के लिए. आप चाहते हैं कि लोग आपके नापसंद लोगों का विरोध आपके तरीके से करें .....यदि वे अपने तरीके से करते हैं तो वे भी दुश्मन की श्रेणी में शामिल घोषित कर दिए जाते हैं .....मैं मानसिक रूप से इस वृत्ति पीड़ित हुआ हूँ. हर व्यक्ति की विरोध करने की अपनी सीमा और अपने तरीके होते हैं. आप किसी गलत घटना के विरोध की कामना कर सकते हैं किन्तु किसी तरीके विशेष के लिए बाध्य नहीं कर सकते. लोग मेरे विरोधियों का विरोध नहीं करते हैं इसलिए मेरे द्वारा उन पर छीटाकशी करना या उन्हें अपमानित करने वाली पोस्ट्स बारम्बार लिखना .....उन्हें कटघरे में खडा करना प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता. 
मुझे कुछ ब्लोग्स पर जाने में डर लगने लगा है.....पता नहीं लोग किस बात पर अपमानित करने लगें. पता नहीं वे हमसे किस प्रकार की टिप्पणियाँ चाहते हैं .....पता नहीं उनकी हमसे क्या अपेक्षाएं हैं .....हम नहीं जानते ...या जानते भी हैं तो उन्हें पूरी कर पाने में समर्थ नहीं हैं ......यह असमर्थता भी उनके लिए एक विषय बन जाता है. वे हिंसा का विरोध करते हैं पर हिंसक तरीके से क्रांति में विश्वास रखते हैं. उनके पास आदर्श की बाते हैं किन्तु आचरण में कहीं झलकता भी नहीं. वे देश की सेवा करना चाहते हैं किन्तु देशवासियों से झगड़ा करने में पीछे नहीं रहते. वे अश्लीलता का विरोध करते हैं पर अपने ब्लोग्स में अश्लील शब्दों के प्रयोग से परहेज नहीं करते. वे स्वयं सम्मान की अपेक्षा करते हैं पर दूसरों को अपमानित करने में एक क्षण की भी देरी नहीं लगाते. हम नहीं जानते उनका यह कैसा देश प्रेम है ???
मैं कई बार कह चुका हूँ कि सशक्त विरोध के समर्थ स्वर मर्यादित भाषा से ही निकल सकते हैं ....अमर्यादित भाषा से नहीं. गालियाँ दुर्बलता की प्रतीक हैं ....पौरुष की नहीं. 
....किन्तु यदि लोग गालियों की भाषा में विश्वास रखते हैं तो हम क़ानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते. गाली का बदला गाली नहीं है ...अब इसके लिए यदि आप हमें कायर और मानसिक रूप से दुर्बल कहना चाहें तो कह सकते हैं.
हर किसी से विवाद करना देशभक्ति का प्रतीक नहीं है. देशप्रेम के लिए देशवासियों से झगड़ा करना आवश्यक नहीं है. अपराधी को दंड देने का काम हमारा नहीं है....क़ानून का है. हाँ ! यदि क़ानून लोक कल्याणकारी नहीं है तो हम क़ानून बदलने की बात कर सकते हैं ...हम व्यवस्था बदलने के लिए क्रान्ति कर सकते हैं...किन्तु इसके लिए हिंसा करने का अधिकार हमारा नहीं है.
हमने प्रयास किया .......किन्तु अपनी बात समझा सकने में असफल रहे और अब सब कुछ इश्वर के हाथों में सौप देने की विवशता के साथ हम पुनः प्रकृतिस्थ हो वापस आ रहे हैं अपनी दुनिया में..........


सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःखमाप्नुयात                     

5 टिप्‍पणियां:

  1. स्वागत है बंधु इस मायावी दुनिया में स्वयं संघर्ष में पुनः झोकने के लिए। सोना तप कर ही कुन्दन बनता है।

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  2. स्वागत डॉक्टर साहब!! घुटन हो रही थी आपकी अनुपस्थिति और इस बंद दरवाज़े से लौट जाने के कारण!! आपके विचार शत प्रतिशत सही हैं.. जितनी जल्दी भ्रम टूटे उतनी जल्दी सुकून मिलता है!!
    स्वागत एक बार फिर!!

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  3. मैं कई बार कह चुका हूँ कि सशक्त विरोध के समर्थ स्वर मर्यादित भाषा से ही निकल सकते हैं ....अमर्यादित भाषा से नहीं. गालियाँ दुर्बलता की प्रतीक हैं ....पौरुष की नहीं.

    सही और खरी बात .. टिप्पणियाँ हमेशा मर्यादित भाषा में ही होनी चाहिए भले ही आप विचार से असहमत हों ..

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  4. मोह में पड़े अर्जुन को बोध कराने के लिए आप तीनों कृष्णों का सादर आभार.....और धन्यवाद उत्साहवर्धन के लिए.
    इस बीच नए जुड़े बंधुओं- श्री महेंद्र जी, श्री परस साहू जी, श्री चन्दन जी, श्री अंकित तोमर जी और श्री आर.एन. शुक्ल जी का हार्दिक स्वागत है.
    मैं भाग्यशाली हूँ कि इस ब्लॉग पर दो-दो जेन्नी जी हैं :))

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  5. @ उनके पास आदर्श की बाते हैं किन्तु आचरण में कहीं झलकता भी नहीं.

    जी, संसार में हर प्रकार के लोग हैं। कोई कितना भी सज्जन हो संसार की सारी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। आप बेफ़िक्र होकर अपना काम करिये।
    शुभकामनायें!

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.