सोमवार, 28 नवंबर 2011

ZEAL OR ZEN ?


किसी जापानी से यह प्रश्न किया जाय तो उसका उत्तर होगा - "ज़ील भी ज़ेन भी". किन्तु भारतीय मानसिकता के अनुसार केवल "ज़ील" या फिर "ज़ेन", एक साथ दोनों नहीं. पहला उत्तर समझौतावादी सा है जबकि दूसरे उत्तर में इसका अभाव स्पष्ट दिखाई देता है. किन्तु इस ज़रा से प्रश्न के ज़रा से उत्तर में ही छिपा है भारत का वर्त्तमान और भविष्य. भारत के वर्त्तमान और भविष्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने से पहले ज़रा रजनीश से भी मिलते चलें, कदाचित् उनका उत्तर आपको अच्छा लगे.
 तो रजनीश का उत्तर है - "ज़ील से ज़ेन की ओर...". रजनीश की यात्रा स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है. वे कन्फ्यूशियस या ताओ की तरह किसी एक ही खूंटे से बंधे रहने की ज़िद नहीं करते. वे कहते हैं, न तो ओर्थोडोक्स बने रहने की आवश्यकता है और न एक्सट्रीमिस्ट.जब वे "सम्भोग से समाधि की ओर" यात्रा करने की बात करते हैं तो वे ऊर्जा के विनाशकारी विस्फोट को बचाते हुए उसके लिए एक दिशा निर्धारित करने की बात करते हैं. यह दिशा साधक को हलचल से प्रशान्तावस्था की ओर ले जाती है...अनेकांत से एकांत की ओर ले जाती है. उनकी यात्रा मार्ग में सब कुछ देखते हुए ...उसे छोड़ते हुए आगे बढ़ते जाने की है. आगे बढ़ने की प्रक्रिया में पीछे का सब कुछ छोड़ना ही पड़ता है. प्रतिक्षण हम कुछ नया पाते हैं और ठीक उसी क्षण कुछ पुराना छोड़ देते हैं.  
किसी सामान्य व्यक्ति के लिए वर्त्तमान को स्वीकारना और उसके अनुरूप भविष्य की रणनीति बनाना इतना सरल नहीं है. हम स्वीकारते कम हैं निषेध अधिक करते हैं......यह निषेध जटिलता उत्पन्न करता है .......अब वह सहज नहीं रह जाता ....जो सहज था अब जटिल हो जाता है. चीन के CHE'N की अपेक्षा जापान के ZEN में निषेध की अपेक्षा स्वीकार अधिक है और यही उनका बौद्धत्व है. 
यहाँ एक रोचक विचार मेरे मन में आ रहा है. जब हम ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की बात करते हैं तो प्रतीत होता है कि जहाँ जटिलता है सरलता भी वहीं है. जहाँ अन्धकार है प्रकाश भी वहीं है. बस, एक की अनुपस्थिति ही दूसरे की उपस्थिति है. इसे मैं यूँ कहना चाहता हूँ कि जहाँ प्रेम है वहीं घृणा भी है, जहाँ बुद्धिमत्ता का अंत होता है मूर्खता भी वहीं से शुरू हो जाती है . शत्रुता की सीमा जहाँ समाप्त होती है मित्रता की सीमा वहीं से आरम्भ हो जाती है. जिन्हें हम ध्रुव कहते हैं वे वस्तुतः बिंदु का विस्तार मात्र हैं. 
अब मैं इसी बात को कुछ और ढंग से कहना चाहता हूँ. कोई भी व्यक्ति धूर्तता और सज्जनता के तुल्य गुणों का स्वामी होता है. राग और विराग दोनों भाव  एक ही व्यक्ति में समान इंटेंसिटी में मिलते हैं. हम जितने सद् चरित्र हैं उतने ही दुश्चरित्र भी. पृथिवी के दोनों ध्रुवों को पृथक नहीं किया जा सकता .....पृथक कर देने से तो उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा. परस्पर विपरीत गुण वाले भावों का स्थान एक ही होता है. यह जो द्वैत है वह वस्तुतः अद्वैत की ही दो स्थितियाँ हैं. इन स्थितियों के विस्तार को समझ न पाने के कारण ही हम द्वन्द में पड़े रहते हैं. 
कहते हैं कि प्रेम चोपड़ा रजत पटल के बाहर परम सज्जन व्यक्तियों में से एक हैं. जबकि उनके दर्शक उनकी दुर्जनता को ही उनकी सत्यता मान बैठते हैं. प्रेम चोपड़ा सज्जन भी हैं और दुर्जन भी. वे अन्दर से सज्जन हैं तो बाहर से दुर्जन. ऐसा व्यक्ति इस स्थिति को बदलने की भी क्षमता रखता है. दोनों विपरीत गुणों की समान तीव्रता है वहाँ. मनुष्य एक ऐसा पात्र है जहाँ एक बार में बस एक ही भाव प्रकट हो पाता है. यह हमारे चाहने पर निर्भर करता है कि हम किस क्षण में किस भाव को प्रकट करना चाहते हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि समाज का हर व्यक्ति स्वयं के अन्दर की प्रतिभा को प्रकट कर सकता है ....निखार सकता है. जापानियों और चीनियों के सुखमय जीवन, दीर्घायु, राष्ट्रीय भावना, नैतिक चरित्र और भौतिक प्रगति का कारण यही है कि उन्होंने पूरी  ईमानदारी से स्थूल और सूक्ष्म की सत्ता को स्वीकार किया है. 
अभी मैंने ऊर्जा के विस्फोट की बात की थी. स्वाभाविक है, जहाँ ऊर्जा अधिक होगी वहाँ विस्फोट भी अधिक तीव्र होगा. कई बार हम अपनी ऊर्जा का सही आकलन नहीं कर पाते, या तो वास्तविक से न्यून या अधिक समझ बैठने की त्रुटि कर बैठते हैं. इसीलिये कभी हनुमान को उनकी शक्ति का स्मरण कराना पड़ता है.....तो कभी रावण को उसकी औकात बतानी पड़ती है. यह प्रक्रिया समाज में निरंतर होती पायी जाती है. हमें किसी को हतोत्साहित करना पड़ता है तो किसी को उत्साहित. zeal हमारे अन्दर की कार्योन्मुख शक्ति है......ऊर्जा का एक प्रवाह...जिसे zen  के नियंत्रण और सही दिशा देने की आवश्यकता होती है. ध्यान रहे, zen केवल साधना और उससे प्राप्त बुद्धत्व ही नहीं है बल्कि ऊर्जा को एक सही दिशा देने की विधा भी है. zen से संचालित हुए बिना zeal का अस्तित्व अनियंत्रित अश्व की तरह होता है ...तब zeal की ऊर्जा को zealotry में परिवर्तित होते देर नहीं लगती...और हमारे बीच की कोई प्रतिभा देखते-देखते अभिशाप बन जाती है ....स्वयं अपने लिए.....और समाज के लिए भी.
आपने देखा होगा, जिन्हें हम शरारती बच्चे कहकर दूर भगाते हैं वे बहुत ऊर्जावान होते हैं ....अपेक्षाकृत उन बच्चों के जो बिल्कुल सीधे सादे होते हैं. जो बच्चे चंचल होते हैं उनकी जिज्ञासाएं शांत होते ही वे स्वयं भी शांत होने लगते हैं .....पर यदि उनकी जिज्ञासा शांत न हो पाए तो ? तो यह ऊर्जा किसी भी दिशा में जा सकती है. हमें बच्चे की चंचलता को कोसने की अपेक्षा उसकी ऊर्जा को एक सही दिशा देने का प्रयास करना चाहिए. चीन और जापान अपने देश की प्रतिभाओं को पहचानने और उनको सही दिशा देने में चूक नहीं करते. क्या हम उनसे कुछ सीख लेंगे ?                                      

9 टिप्‍पणियां:

  1. डॉक्टर साहब! ओशो के दर्शन (वैसे भी वे चिंतन शब्द को पस्ग्चिम की मानसिकता मानते हैं और दर्शन को एक वृहत आयाम)को जिस तरह आपने प्रस्तुत किया है वह अद्भुत है... अधिक नहीं कहूँगा.. बस आनंदित हूँ!!

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  2. हम स्वीकारते कम हैं निषेध अधिक करते हैं......यह निषेध जटिलता उत्पन्न करता है .......अब वह सहज नहीं रह जाता ....जो सहज था अब जटिल हो जाता है. चीन के CHE'N की अपेक्षा जापान के ZEN में निषेध की अपेक्षा स्वीकार अधिक है और यही उनका बौद्धत्व है.
    ...किंतु मुझे लगता है ओशो ने निषेध को ही श्रेष्ठ कहा है। स्वीकार करने वाला सूक्ष्म की खोज कर ही नहीं सकता।

    zen के नियंत्रण के बिना zeal का अस्तित्व अनियंत्रित अश्व की तरह होता है
    ....किंतु मुझे लगता है ओशो ने सभी प्रकार के नियंत्रण का विरोध किया है। वे कहते हैं जो मन हो वह करके देखो तभी जान पाओगे के सत्य क्या है। इच्छाओं का दबाने से वह कभी नियंत्रित नहीं होती। ब्रह्मचर्य की कल्पना का मजाक उड़ाया है।
    ....भ्रम दूर करें डाक्टर साहब।

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  3. पाण्डेय जी ! आपके प्रश्नों का स्वागत है. चर्चा के पृष्ठ सन्दर्भ में चीन और जापान भी हैं. व्यावहारिक रूप से जो राष्ट्रप्रेम उनमें दिखाई देता है वह हममें नहीं दिखाई देता. हम अद्वैत और मोक्ष पर चिंतन करते हैं...संसार को निस्सार मानकर सन्यासी हो जाते हैं या संसार और माया के त्याग की संस्तुति करते हैं. हमने बहुत से निषेधों को सराहा है ...पूरा जीवन निषेधों से भर गया है.....किन्तु जीवन के उच्च धरातल पर यह निषेध कहीं दिखाई नहीं देता. हम माया का जितना विरोध करते हैं उतने ही माया में लिप्त होते जाते हैं. नाना पाटेकर और पल्लवी जोशी अभिनीत "त्रिशाग्नि" फिल्म इसी नैषेधिक द्वंद्व का चित्रण करती है. निषेध से आकर्षण बढ़ता है...उत्सुकता बढ़ती है....इन्द्रियाँ असंतुष्ट रह जाती हैं....और मोक्ष एक स्वप्न बन कर रह जाता है. जब हम संसार को भी स्वीकार करते हैं तभी उसे जान कर आगे की यात्रा प्रारम्भ कर पाते हैं. संसार को जाने बिना.... स्थूल को जाने बिना सूक्ष्म को कैसे जाना जा सकेगा ? ओशो तो सबको स्वीकार करने की बात करते हैं ...राग भी विराग भी. द्वैत से अद्वैत की यात्रा आसान हो जाती है तब. किसी एक को छोड़ देने से सम्यक ज्ञान से वंचित रह जाना होगा. निषेध को स्वीकारने से तो नियंत्रण को भी स्वीकारना होगा. जिसका निषेध होता है उसी के तो नियंत्रण की बात होती है. नियंत्रण यदि विराग है ....बुद्धत्व से उत्पन्न है...तो स्वीकार्य है ...यद्यपि तब वह नियंत्रण रह ही नहीं जाता .....विमुखता उत्पन्न हो जाती है .....ऊर्जा का एक सरल सहज प्रवाह प्रारम्भ हो जाता है जिसकी दिशा बदल चुकी होती है.
    @ zen के नियंत्रण के बिना zeal का अस्तित्व अनियंत्रित अश्व की तरह होता है "
    "नियंत्रण" के स्थान पर "zen से संचालित हुए बिना" अधिक उपयुक्त है. मैं सुधार कर रहा हूँ. वस्तुतः जापानियों ने zen को जिस अर्थ में लिया है वह चीन के zen से किंचित भिन्न है. उनका zen ताओ से अधिक प्रभावित लगता है जो बुद्धत्व के साथ-साथ जीवन की सहजता को स्वीकार करता है ...निषेधों को नहीं. तथापि इसका अर्थ स्वेच्छाचारिता कदापि नहीं है . जब मैंने zen के नियंत्रण की बात की थी उस समय यही बात मेरे मन में थी. zeal तो एक ऊर्जा है उसे स्वेच्छाचारी नहीं होने देना है अपितु एक ऐसी दिशा देनी है जिससे वह अपने लक्ष्य को पा सके.
    १९४७ में स्वतंत्रता पाने के बाद हमने अपनी zeal को स्वेच्छाचारी हो जाने दिया है.....आत्म बोध न होने से हम अपनी ऊर्जा का समुचित उपयोग नहीं कर सके. वहीं जापान ने संसाधनों की अल्पता होते हुए भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की तबाही से शीघ्र ही उबर कर विश्व में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी ... और हम अद्वैत की बात कहते कहते घोटालों में लिप्त होते चले गए. इस लेख का आशय भारतीय दर्शन के व्यावहारिक स्वरूप को समझने और उसे जीवन में उतारने का है.

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  4. पांडे जी,
    ओशो ने जापानी लोगों के विषय में यह भी कहा है कि दुनिया की समस्त आबादी में जापानियों की आबादी सबसे मुस्कुराती हुई आबादी है.. इसका कारण वे स्वयं बताते हैं कि उनके लोक-व्यवहार में निषेध का अभाव है... और स्वीकार्य प्रचुर है.. हमारे यहाँ तो बाल्यकाल से ही जो सबसे अधिक प्रत्यारोपित आदेश है वह है ऐसा मत करो...
    एक बड़ा साधारण सा उदाहरण... हम अपने सामान्य जीवन में (अधिकांशतः) पाते हैं वो यह है कि जब कोई हमारे घर भोजन पर निमंत्रित हो तो शिष्टाचार तक में भोजन के मध्य हम प्रायः कहते हैं, "अरे!आप तो कुछ ले ही नहीं रहे!" यदि वह चावल खा रहा हो तो कहते हैं "पूरी नहीं खा रहे आप!" यद्यपि इसमें भी प्रेम भाव ही छिपा है, किन्तु अभिव्यक्ति निषेध या नकार से हो रही है...
    बाकी तो डॉक्टर साहब ने स्वयं व्याख्यायित किया है..

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  5. कौशलेंद्र जी और सलिल भैया दोनो का आभार। सुंदर व्याख्या पढ़ने को मिली। ..सहमत हूँ आप द्वय के तर्कों से। निषेध को मैं गलत अर्थों में समझ रहा था। मैं समझ रहा था कि किसी के बताये मार्ग पर ही चलते रहेंगे तो कैसे नये मार्ग की तलाश होगी। लेकिन यहां संसार को स्वीकार करने की बात कही गया है।

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  6. पाण्डेय जी - कौशलेन्द्र सर - आपकी वार्ता में हस्तक्षेप करनेके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ |

    @.....किंतु मुझे लगता है ओशो ने सभी प्रकार के नियंत्रण का विरोध किया है। ....... nahi, osho ne , ऊपर से थोपे नियंत्रण का हमेशा विरोध किया है | वे कहते हैं की यदि ऊपर से बाँधा न जाए - तो भीतर का नियंत्रण स्वयं आता है | जब लोग पूछते की "आप्प नियंत्रण का विरोध करते हैं - तो ऐसे में क्या सब कुछ अस्त व्यस्त नहीं हो जाएगा| " तो वे कहते थे - मैं ऊपर से / सीखे हुए नियंत्रण का विरोध करता हूँ | थोपी हुई आस्थाओं, और जबरन सीखे हुए "इश्वर हैं" वाद के भी वे विरोधी थे | किन्तु - वे इन सभी चीज़ों के मूल रूप में विरोधी नहीं थे | उन्होंने हमेशा कहा की - यदि मनुष्य अपनी चेतना को खुला छोड़े - तब ही असल सत्य, असल नियंत्रण, असल आस्था, असल सत्य को पा सकता है |

    वे कहते थे के जो तुमने जान लिया- उस पर "विश्वास" करने की आवश्यकता नहीं रहती - जब तक नहीं जाना - कितना भी विश्वास ओढ़ लो - भीतर अविश्वास ही रहेगा किसी दबे हुए कोने में |

    जैसे - मैं "विश्वास करती हूँ" कि धरती गोल है - जब मेरे teacher मुझे यह पढ़ाते हैं जब मैं छठी कक्षा में भूगोल पढ़ रही हूँ | किन्तु मन में तो यही है कि धरती तो चपटी ही दिखती है - गोल क्यों कह रहे हैं teacher ? फिर जब मैं बड़ी होती हूँ - तो चाँद / satellite से ली गयी धरती की गोल तस्वीर देखती हूँ - परन्तु विश्वास गहरा भले हो जाए - वह 'जानना' अब भी नहीं है | कल को मैं यदि स्वयं अंतरिक्ष विमान में बैठ कर ऊपर से देखूं कि धरती सच में गोल है - तब मैं जान लूंगी - तब विश्वास नहीं करना पड़ेगा |

    मैं विश्वास करती हूँ कि "....."
    परन्तु मैं "जानती हूँ कि '२+२=४' "
    इसमें मैं कभी नहीं कहूँगी कि मुझे विश्वास है कि २+२=४ ... :)

    यह जो फर्क 'जान लेने' और 'विश्वास कर लेने' में है, यही फर्क 'ऊपर से थोपे नियंत्रण' और 'भीतर से विकसित नियंत्रण' में भी है |

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  7. शिल्पा जी ! किंचित अवरोधोपरांत सूक्ष्म जाल के इस संसार में आपका पुनः स्वागत है.
    आपके कथन से सहमत हूँ . नियंत्रण नहीं, सहज आत्मानुशासन की बात है जो बोध के बाद ही प्राप्त हो पाता है. ZEN दर्शन जीवन को नदी के सहज प्रवाह की तरह स्वतन्त्र बहने देने की संस्तुति करता है. नदी अपना मार्ग स्वयं तय करती है. मनुष्यकृत नियंत्रण ( बाँध या मार्ग परिवर्तन ) अंततः दोनों के लिए ही हानिकारक है ...नदी के लिए भी और मनुष्य के लिए भी. जापानियों का यह चिंतन कुछ वैसा ही है जैसा विदेह राज जनक का था. .....निर्लिप्त रहते हुए संसार का भोग. कन्फ्यूशियस का नियंत्रण सहज न होकर बाहर से थोपा हुआ है जिसका ZEN दर्शन में कोई स्थान नहीं है. ओशो ने भी इसी का विरोध किया है.
    जीवन यात्रा में हर किसी को अपना मार्ग स्वयं बनाना पड़ता है ....मार्ग बहुत हैं ..व्यक्ति विशेष के लिए उत्तम कौन सा है यह उसे अपने सहज विवेक से तय करना है.
    विमर्श में भाग लेने के लिए सभी का आभार.
    आपका ई .मेल अभी भी काम नहीं कर रहा.

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  8. बहुत ही गहन चिन्तन है। आलेख के साथ-साथ सारी टिप्पणियां पढ़ गया। बहुत कुछ सीखा समझा। बस आनंद आ गया।

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  9. मैं दिनेश पारीक आज पहली बार आपके ब्लॉग पे आया हु और आज ही मुझे अफ़सोस करना पड़ रहा है की मैं पहले क्यूँ नहीं आया पर शायद ये तो इश्वर की लीला है उसने तो समय सीमा निधारित की होगी
    बात यहाँ मैं आपके ब्लॉग की कर रहा हु पर मेरे समझ से परे है की कहा तक इस का विमोचन कर सकू क्यूँ की इसके लिए तो मुझे बहुत दिनों तक लिखना पड़ेगा जो संभव नहीं है हा बार बार आपके ब्लॉग पे पतिकिर्या ही संभव है
    अति सूंदर और उतने सुन्दर से अपने लिखा और सजाया है बस आपसे गुजारिश है की आप मेरे ब्लॉग पे भी आये और मेरे ब्लॉग के सदशय बने और अपने विचारो से अवगत करवाए
    धन्यवाद
    दिनेश पारीक

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.