शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

शीर्षकहीन


  
   पने लौह अयस्क के लिए विख्यात दल्लीराजहरा नगर से दक्षिण-पूर्व दिशा में भानुप्रतापपुर राजमार्ग पर मुल्ला से उत्तर की ओर धूल भरी पगडंडी पर पिच्चेकट्टा जलाशय  की ओर पैदल ही आगे बढ़ते हुए लल्ली ने सुबोध को छेड़ा. वह सात वर्ष तक बिठूर में समाजसेवा करके अभी-अभी अपने गाँव 'डूबा' वापस आयी थी. इतने दिनों में वह उत्तर-प्रदेश की शिराओं-धमनियों और उनमें बहने वाले रक्त से भली-भाँति परिचित हो चुकी थी.
     वहाँ की पाठशालाओं की दुर्दशा, शिक्षा की दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती दुकानों, गिरते शैक्षणिक स्तर, परिवारों में आपसी कलह ...मुकदमेबाजी ......गंगा में बहाई जाती नालों की गन्दगी आदि के किस्से सुनाने के बाद बोली- " आपतो अपने यू.पी.- बिहार की तारीफ़ करते नहीं अघाते थे ....देख लिया आपका यू.पी. भी"
लल्ली झूठ नहीं कह रही थी. वास्तव में उत्तर-प्रदेश अब पहले जैसा नहीं रह गया था. सुबोध के पास कोई उत्तर नहीं था इसका. परिहास में बोला- "मैं बिहार का हूँ, यूपी का नहीं...."
        वे जलाशय तक पहुँच गए थे. बाँध पर खड़े होकर लल्ली ने विशाल काले पत्थरों वाले पर्वत की ओर कुछ देखा और चकित होकर बोली- "अरे सिद्धांत ! और यह साथ में कौन है उनके ?"
       विषयांतर होते देख सुबोध को चैन आया, चिंहुक कर बोला- "कहाँ?"
       लल्ली ने अपनी बचपन में आधी पोर कटी तर्जनी अंगुली उठाकर पर्वत की ओर संकेत कर दिखाया - "ओ दे" ( वह देखिये )
    बहुत ऊपर, जहाँ से ऊंचे-ऊंचे सागौन के वृक्षों का साम्राज्य समाप्त होकर मात्र काले पत्थरों का कठोर साम्राज्य प्रारम्भ होता है.....उसी पर्वत की चोटी से नीचे उतरते घुटी चाँद वाले सिद्धांत के साथ दीर्घकेशी विदुषी को देख सुबोध चकित रह गया. उसके मुंह से निकला- "अरे! ये तो दोनों ध्रुव हैं किन्तु एक साथ ...और यहाँ ?...कोई सोच भी नहीं सकता." 
     विक्रम संवत दो हज़ार अड़सठ की माघ पूर्णमासी के दिन जलाशय के ऊंचे बाँध पर खड़े-खड़े उन दोनों ने एक असंभव सी घटना देखी .....दो अविवाहित ध्रुवों को पिच्चेकट्टा पहाड़ की चोटी से एक साथ नीचे उतरते देखा. यह किसी आश्चर्य से कम न था. 
     उन दोनों की मन बुद्धि सहित समस्त इन्द्रियों का प्रवाह उत्तर-दक्षिण ध्रुव की जोड़ी के नाम से विख्यात सिद्धांत और विदुषी के एक साथ नितांत सूने पर्वत की चोटी से नीचे उतरने की घटना के कारणों और उसकी विवेचना की ओर हो गया.          


       काले पत्थरों का साम्राज्य समाप्त हो चुका था, सागौन वृक्षों के गहन वन की छाया में पहुंचते ही विदुषी एक स्थान पर बैठ गयी. वह थक गयी थी, बोतल से पानी निकालकर पीने के बाद बोली- "शहतूत की हरी-हरी टहनियों से लटकते कोसा के ककूनों को देखा है कभी ?....कोसा के धागे कितने बुने से लिपटे रहते हैं आपस में. पहले मैं भी इन धागों को उलझा हुआ समझती थी ...पर सचमुच ऐसा है नहीं....बाहर से जो जैसा दिखाई देता है आवश्यक नहीं कि अन्दर से भी वह वैसा ही हो."
      सिद्धांत ने कुछ आहत होते हुए पूछा, "क्या यह कटाक्ष है तुम्हारा ?"
      "मैंने अपनी बात कही है, कटाक्ष है या नहीं यह आप जानिये. यदि न भी जानें तो क्या अंतर पड़ने वाला है .."
     सिद्धांत बोला- "देख रहा हूँ, आजकल बातें बहुत घुमा फिरा कर कहने लगी हो. मैं तो यूं भी आना ही नहीं चाहता था तुम्हारे साथ ....."
      कठोर हो कर विदुषी ने आँखें तरेरीं- "आना ही नहीं चाहते थे? प्रस्ताव किसका था यहाँ आने के लिए ? ......मैं इसीलिए कहती हूँ, सिद्धांत चट्टोपाध्याय जी ! आप बहुत उलझे हुए मानुष हैं. आपका मन चाहता क्या है ...प्रायः यही नहीं पता होता है आपको"
     "पर अभी तो तुमने कहा था कि ककून के धागे उलझे से दिखते हैं पर होते नहीं.."
     "हाँ ! कहा था....पर बिना तोड़े हुए धागा निकालने के लिए उसका एक स्वतन्त्र छोर खोजना पड़ता है ...और आपसे वही नहीं हो पा रहा है"
    सामने आयी केशराशि को पीछे कर वह खड़ी हो गयी, बोली- "चलिए, अन्यथा गाँव तक पहुंचते-पहुंचते अन्धेरा हो जाएगा और फिर मेरे साथ आपको किसी ने देख लिया  तो ......."
     एक शरारती मुस्कान के साथ उसने हाथ पकड़ लिया सिद्धांत का, बोली- "मेरे छूने से कहीं अपवित्र तो नहीं हो जायेंगे आप ? "
     सिद्धांत बोला- "कौन जाने ...हो भी जाऊं ?"
    विदुषी ने झटके से हाथ उसका छोड़ दिया-" यानी आप सशंकित हैं .....यह शंका क्यों ? कभी विचार किया है आपने ? ...."
    कुछ रुककर विदुषी फिर बोली- "सिद्धांत ! किताबों की दुनिया से बाहर निकलकर देखो, वहाँ वह सब कुछ है जो किताबों में कहीं नहीं है ...और वही जीवन का सत्य है. आपके सिद्धांत जीवन के सत्य नहीं हैं ...छलावा है. यदि तुम्हारे अन्दर दृढ़ता होती तो शंका नहीं होती. यह जो शंका है आपके मन में यही तो दुर्बलता है आपके थोथे चरित्र की ?"
      विदुषी की बात से तिलमिलाए सिद्धांत ने बिना कुछ कहे आगे बढ़ना प्रारम्भ किया. वह सोचने लगा, उफ़ मैं आया ही क्यों इस घमंडी लड़की के साथ ? भूल तो मेरी ही थी.
    सिद्धांत को अब चिंता होने लगी, कहीं गाँव तक पहुँचने में देर हो गयी तो.... क्या सोचेंगे लोग ..यही कि सिद्धांत भी बातें तो बड़ी-बड़ी करता है और घूमता है विदुषी के साथ ....वह भी पिच्चे कट्टा .
      ग्लानि में डूबे सिद्धांत ने तेज-तेज कदम बढ़ाने शुरू किये. पीछे-पीछे विदुषी भी चल पड़ी. वन समाप्त होने को था  तभी विदुषी ने पुकारा - "रुको सिद्धांत ...मैं पीछे रह गयी हूँ."
    सिद्धांत को खीझ होने लगी, उसके ऊपर ज़ल्दीसे ज़ल्दी घर पहुँचने की धुन सवार थी. न चाहकर भी उसे रुकना पडा. तभी एक अप्रत्याशित घटना ने सिद्धांत को विचारशून्य कर दिया. 
    हुआ यह कि पास आते ही विदुषी ने आगे बढ़कर सिद्धांत के कुंवारे चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी. सब कुछ इतना अप्रत्याशित था कि सिद्धांत को संभलने का अवसर ही नहीं मिल सका. जैसे-तैसे उसने विदुषी से अपने को छुडाया ...और ज्यों ही आगे बढ़ने को हुआ तो उसने अपने सामने सुबोध और लल्ली को खड़े पाया. 
सिद्धांत को काटो तो खून नहीं.  उसे लगा धरती फट जाय और वह उसमें समा जाय. 


 क्रमशः ........      
  


  

4 टिप्‍पणियां:

  1. अंतहीन..
    शीर्षक नहीं..मेरा मतलब अभी अंत नहीं हुआ है। पूरा पढ़ेंगे तब बतायेंगे कैसी है।

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  2. आपका पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगा मेरे नए पोस्ट "खुशवंत सिंह" पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  3. विदुषी का सिद्धांत या सिद्धांत की विद्वता ... अभी अपूर्ण है ...
    हम इंतज़ार में हैं।

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  4. kaushalendra ji,
    kahani ka sheershak pata nahin kya ho, par abhi tak ki kahani se ek aham baat jo dimag mein aai ki... ''दृढ़ता होती तो शंका नहीं होती''
    kai baar aise bhaav hote hain lekin shabd nahin mil pata. aur ye sach bhi hai ki udhedbun mein tabhi raha jata hai jab dridhta nahin hoti hai. agle ank padhne ja rahi.

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.