मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

कुछ क्षणिकाएं ..आखिर मनायेगा कौन ?


१-
लो, 
तुम्हारी हठ का
मान रखा मैंने 
और ख़त्म कर दिए रिश्ते 
......................
पर कोई मरघट नहीं मिला ऐसा 
जहाँ दफ़न कर सकूँ इन्हें. 

२-
बड़ी गहरी मोहब्बत है 
सूरज से चाँद को. 
देश निकाला दे दिया 
पर 
ताक-झाँक से बाज नहीं आता
अभी भी भटकता है 
रात-रात भर.

३-
ये ज़िद है उनकी 
कि अब न मिलेंगे कभी. 
उनसे कहो 
इतनी ही दुश्मनी है 
तो निकाल कर फेक दें मुझे 
अपनी यादों के संदूक से. 

४-
हमें तड़पाने में 
मज़ा आता है तुम्हें
तो खुश हैं हम. 
वैसे नहीं 
तो ऐसे ही सही 
तुम्हें मज़ा तो आया.

५-
उन्हें तो 
दुश्मनी भी निभाना नहीं आता ढंग से.
सुना है 
छुप-छुप के रोने की 
आदत हो गयी है उन्हें 
दुश्मन की याद में.

६-
रात 
सितारों के पहरे में था चाँद. 
सुबह 
पूरी धरती भीगी पड़ी थी. 
क्या पता 
कौन रोया था इस कदर.

७-
हम हँसे .....तो वो हँसे
हम रोये  .....तो वो रोये 
हम रूठे  .......तो वो भी रूठे 
कमाल है ........
....ये मोहब्बत तो न हुयी,  
आखिर मनायेगा कौन ?






7 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन ! सब एक से बढ़कर एक !

    सोचता हूं ये सब आपने किस उम्र में लिखी होंगी :)

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  2. रात
    सितारों के पहरे में था चाँद.
    सुबह
    पूरी धरती भीगी पड़ी थी.
    क्या पता
    कौन रोया था इस कदर.
    इसमें चित्रात्मकता बहुत है। आपने बिम्बों से इसे सजाया है।

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  3. आ. कौशलेन्द्र जी इन क्षणिकाओं ने तो दिल जीत लिया, भई वाह...................

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  4. चौबे जी ! धन्न भाग हमाये
    जो आप हमाये जंगल में आये .....
    इतैं कांटेऊ हें . ....और काँकरऊ
    बस्स....! गली भर सांकरी नाय
    सो कूद-कूद के आय जइयो.....

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  5. सुबह
    पूरी धरती भीगी पड़ी थी.
    क्या पता
    कौन रोया था इस कदर.

    वाह!

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  6. चिंता जायज़ है
    आखिर मनाएगा कौन

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.