सोमवार, 16 जनवरी 2012

गोंड आदिवासियों का पूस कोलांग नृत्य महोत्सव


हे आदिवासी ! 
तेरे पास खोने के लिए क्या है ?
जल-जंगल-जमीन ...जो कभी तेरी थी 
आज वह पराई हो गयी है.
सोना, चांदी, धन-दौलत, मोटर-गाडी. बंगला-हवेली तेरे पास है नहीं
तेरी प्राकृतिक संपदा और मौलिक सत्ता, बहुत पहले तुझसे खो गयी है
फिर तू खोने (मरने ) से क्यों डरता है?
अब तू पाने के लिए उठ, लड़, 
क्योंकि तेरे पास खोने को कुछ शेष नहीं है.
हे आदिवासी ! 
जो तेरा था उसे प्राप्त कर 
क्योंकि धरती का सारा ऐश्वर्या तेरा ही इंतज़ार कर रहा है,
क्योंकि भारत का तू ही मूल निवासी है. 

-के. आर. शाह 


रायपुर से प्रकाशित होने वाली "आदिवासी सत्ता" मासिक पत्रिका के संस्थापक व सम्पादक के. आर. शाह के उक्त उद्बोधन से आदिवासी समाज का एक आकर्षक स्वप्न लोक में पहुँचना स्वाभाविक है. पूस मास में, धरती माँ से धान की फसल का उपहार प्राप्त करने के बाद प्रकृति को धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए मनाये जाने वाले कोलांग उत्सव के उद्घाटन समारोह में एक बार फिर इसी स्वप्न की बात दोहराई गयी. 
खैर ! अभी तो हम चलते हैं कांकेर जिले के सिवनी ग्राम में जहाँ पदोमान (जनवरी )  की पदानालू (१४ ) एवं पदसंय्यू ( १५ ) तारीख  को पूस कोलांग की धूम मची हुयी है. गोंडी बोली में कोलांग का अर्थ है दंड या डंडा....तो डंडों के साथ किये जाने वाले इस नृत्य से गुजरात के डांडिया नृत्य की छवि मन में उभरती है. 

आप तैयार हो गए हों तो चलिए न ! हमारे साथ .......



लो, आ गए हम सिवनी ......

  
      
    जंगल में मंगल की तैयारी 


मंच की साज-सज्जा .....



नृत्य स्थल की तैयारी .......



लो, जुट गयी भीड़ .......लेकिन पहले देव आराधना ......फूस का मंदिर ...जिसमें विराजे हैं प्रकृति देव.....


....ये रहे प्रकृति देव .......


इतनी भीड़ ! अरे वाह !........चलो-चलो इन्हें स्वप्न दिखाएँ ...


...................................क्योंकि धरती का सारा ऐश्वर्या तेरा ही इंतज़ार कर रहा है,
क्योंकि भारत का तू ही मूल निवासी है. ..................



स्वप्न लोक से.....
चलो, धरती पर आएँ ....अपनी-अपनी ढोलक उठायें .......
सबने अपना राग सुनाया ...हम भी अपना ढोल बजाएं ........


पाँव में पहना यह वाद्य यंत्र घुँघरू सी आवाज देता है ....जब नाचूँगा तब सुनना ......
सबहिं नचावत राम गोसाईं .....
हम भी तैयार हैं नाचने के लिए .....


औरतों का घाघरा पहन कर ये मर्द कैसे लगेंगे...ज़रा हम भी तो देखें ....


लो देख लो जी ! ऐसे लगते हैं हम घाघरा पहनकर ...... रंग तो अच्छा है न ! 




अच्छा ! तो इन्होने लाली भी लगाई है .....सुन्दर दिख रहे हो जी !
और .....अपनी वही गुवाहाटी वाली हीर जी की जुबां में कहूँ तो ...ओय-होय-होय .....बड़े सोणे दिख रहे हो जी !


ये दर्पण ...?
हाँ ! मामला जब श्रृंगार का हो तो सर में कुछ भी खोंसा जा सकता है ....क्यों अच्छा नहीं लग रहा क्या ?  



लीजिये, हो गया नृत्य शुरू .......यही है कोलांग नृत्य .....डंडों की धुन सुनना है तो कल तक चुप बैठिये ...क्योंकि अब शाम होने वाली है ...कल चलचित्र देखिएगा ......लेकिन इससे पहले कुछ चित्र और .....

छोटा बच्चा जान के हमको ........
डूबी-डूबी डम-डम...... 


मैं फोन करके दुरपती (द्रोपदी) को बुलाती हूँ ...कितना मज़ा आ रहा है ....


चूल्हे ही चूल्हे ....
इतने लोग हैं तो चूल्हे तो इतने बनाने ही पड़ेंगे .... 
हाली-हाली चल  रे कहंरवा सुरुज डुबे ना दिहs ..........
मगर सूरज अब कहाँ रुकने वाले .......
यह कार्यक्रम तो चलेगा रात भर .....पर इतनी शीत में मेरी तो कुल्फी जम जायेगी ..ना बाबा ...हम ना रुकब ...
मैं भी चला अपने घर ...कल फिर आयेंगे ... 

8 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. jangal ke mangal ka sachitra varnan...yun jaise hum sabhi wahaan upasthit hon...shubhkaamnaayen.

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  2. गज़ब की तश्वीरें खींचता है आपका...अरे नहीं..गज़ब की आँख है आपकी। आनंद आ गया।
    अभी बनारस की छत पर तो अभी कांकेर जिले के सिवनी ग्राम में!
    ..जय ब्ल़ॉगिंग।

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  3. पूष कोलांग उत्सव की जानकारी और सुन्दर चित्रों के लिये आभार! कविता भी अच्छी लगी। विविधा भारतीय संस्कृति के कितने रंग हैं, यह समझने के लिये एक उम्र भी थोड़ी है। शुभकामनायें!

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  4. आपको अंदाज है ना कि जगदलपुर में इंटरनेट कनेक्शन कितना कष्ट देता है ! कल बहुत कोशिश की पर फोटोज के चक्कर में पेज खुला ही नहीं ! आज बमुश्किल खोल पाया ! फोटोग्राफ्स अच्छे हैं और कैप्शंस भी ! युवाओं के वस्त्र विन्यास और लाइफ स्टाइल में परिवर्तन अनायास ही मुखर हो रहा है !

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    1. यह कष्ट यहाँ भी है. दो दिन से लगा हूँ वीडियो लोड नहीं कर पा रहा हूँ ....कोलांग नृत्य दिखाने का वादा पूरा नहीं कर पा रहा हूँ .....

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  5. बहुत सुन्दर कौशलेन्द्र जी......तस्वीरें भी ...और आपके लिखे हुए कमेंट भी....

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  6. चंद पंक्तियों म्रं शाह जी ने इन आदिवासियों के दर्द, हक़ीक़त और बेरहम समाज को पिरो कर प्रस्तुत कर डाला है। एक बेहद विचारोत्तेजक रचना पढ़वाने के लिए शुक्रिया।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.