गुरुवार, 19 जनवरी 2012

ये वो नन्हें फूल हैं जो ......



मैं हूँ छुटकी ...

और मैं हूँ बड़की .....


बच्चे मन के सच्चे .....सारी जग की आँख के तारे
ये वो नन्हें फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे .....
छोटे से कांकेर के नन्हें से पार्क में इन बच्चों को देखा तो सत्तर के दशक के गाने की उपरोक्त पंक्तियाँ याद आ गयीं


  अंकल ! इस छोटू को तो मुस्कराना भी नहीं आता ...चलो मैं ही खींच देता हूँ इसके होठ .....


मेरा तो समय हो गया पढ़ाई का .....

और मेरी पढाई का वक़्त ? 
शायद अब कभी नहीं आयेगा ........

मालुम है .....बच्चों की फेहरिश्त में अपना नाम जुड़वाने और अपना फोटो छपवाने के लिए मुझे कितने पापड़ बेलने पड़े हैं .......यह सफलता यूँ ही नहीं मिली है मुझे......
मेरा नाम याद है न ! लोग मुझे बूज़ो कहते हैं .....कुछ लोग मुझे बदमाश भी कह कर पुकारते हैं ..........क्या मैं आपको बदमाश जैसा दिखता हूँ ?  





6 टिप्‍पणियां:

  1. जहाँ तक मैं समझता हूं ये अलग लोकेशन , अलग ऋतुओं और भिन्न आर्थिक वर्ग के फोटोग्राफ्स हैं ! पहले पांच कांकेर के पार्क के और अंतिम किसी रेल्वे प्लेटफार्म का ! यह अजब संयोग है कि छुटकी और उसकी बड़ी बहिन ( चौथा फोटो ) ने एक जैसे गुलाबी कलर को धारण किया सर्दी के मौसम में पर छठवां फोटो जोकि गर्मी के मौसम का है , में भी , कलर वही गुलाबी :)

    बहरहाल फोटोज के मार्फ़त आपने एक बड़ा सन्देश दे डाला ! अगर आप अक्षरों का उपयोग ना भी करते तो भी बात आईने की तरह साफ़ है !

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  2. @और मेरी पढाई का वक़्त ?
    काश वह समय आता!

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  3. पाण्डेय जी ! कुछ फोटो मोबाइल के भी हैं.
    अली साहब ! बिलकुल दुरुस्त फ़रमाया आपने. अंतिम फोटो मुम्बई जाते समय किसी रेलवे स्टेशन का है ..दिन थे वारिश के. पंचम फोटो इनडोर है....रात में खीचा हुआ. और शेष फोटो कांकेर पार्क के हैं.
    अनुराग जी ! भारत में प्रौढ़ शिक्षा के नाम पर अरबों रुपये खर्च किये जा रहे हैं ....प्रतीक्षा की जा रही है कि कब यह बच्ची जामुन बेचते-बेचते प्रौढ़ हो और कब उसे प्रौढ़ शिक्षा प्रदान की जाय ....हम लोग कितने दूरदर्शी हैं ! आपके यहाँ है कोई इतना दूरदर्शी ? बात करते हैं ........हुंह ...सीखना है तो हम से सीखो दूरदर्शिता.

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  4. दूसरे नम्बर की फोटू नहीं भी होती तो काम चल जाता। जैसा कि अली सा ने कहा शब्दों के बिना भी बात आइने की तरह साफ हो जाती। यह कहें कि संदेश और व्यापक हो जाता तो गलत न होगा। जैसे छठें चित्र में लड़की गर्मी की छुट्टी में पढ़ाई करते-करते जामुन बेचकर अपना गुजर बसर कर रही हो! इस संभावना का विकल्प भी खुला रह पाता।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.