शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

सहमत न होने के बाद भी ....


    
    एम. डी. मेडिसिन सेकेण्ड इयर के अध्येता डॉक्टर गोरेलाल का मन आज कुछ उखड़ा-उखड़ा था, राउंड के समय इनडोर में मरीजों के साथ पूरा न्याय हो सके इसलिए राउंड में जाने से पहले छदामी की दूकान से एक सिगरेट ले कर सुलगाई और कोशिश की कि धुएं के साथ चीनी की स्मृति को भी कुछ नहीं तो कम से कम राउंड भर के समय तक के लिए तो उड़ा ही दे. पर ऐसा हो नहीं सका. वे चीनी से जितनी दूर भागने की कोशिश करते वह उके उतनी ही नज़दीक आ जाती. आखिर में उन्होंने सिर को एक झटका दिया, गोया वर्षा में भीग गयी कोई चिड़िया अपने परों को फड़फड़ा कर पानी की बूंदों को झटक रही हो .......और फिर वे अपने विचलित मन को हठ योग का सहारा दे कर इनडोर में दाखिल हुये. 
    बेड नंबर ३७, सरिता देवी.......सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस ........दिमाग पर चीनी ने फिर हमला कर दिया.......
   कितनी बार कह चुकी थी, सर कभी बटरफ्लाई लीजन दिखाइएगा ...मैंने आज तक नहीं देखा. 
   हुंह ...जब देखने का वक़्त आया तो भाड़ में चली गयी मरने. ऐसे मरीज कोई रोज-रोज आते हैं ....दो दिन हो गए सूरत नहीं दिखाई ...जानता हूँ बैठी होगी लाइब्रेरी में...मरने दो .....
   बेड नंबर ६४, सरबजीत सिंह, मायोकार्डियल इनफार्कशन......दिमाग में चीनी फिर कूद कर आ गयी. कभी एक भी कार्डियक पेशेंट छूट तो जाए भला चीनी से .......सर आपके साथ रहूँगी तो कार्डियोलोजी में भी कुछ सीख लूंगी .....आपकी तो पता नहीं किस-किस में मास्टरी है ....
   खूब काले और बहुत नाटे डॉक्टर गोरेलाल को अपनी शारीरिक बनावट के प्रति ईश्वर से गंभीर शिकायत थी ...किन्तु अपनी इस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने जो उपाय अपनाया था वह काबिले तारीफ़ था. तभी तो इतनी सुन्दर ...दूध धुले रंग वाली चीनी उनके पीछे पड़ी रहती थी. नाम उसका चीनी था पर वह नाटी बिलकुल नहीं थी....हरियाणा की थी ...खूब लम्बी .....बस आँखे भर चीनियों जैसी थीं उसकी ....बचपन में रखा गया दुलार का नाम अब सील मोहर लग कर पक्का हो गया था. गोरेलाल को अपने माता-पिता से भी शिकायत थी .....वे अक्सर कहा करते, पता नहीं क्या सोच कर यह नाम रखा गया मेरा ....मेरा यह नाम मुझे हमेशा चिढ़ाता रहता है. 
उन दोनों की जोड़ी पूरे कॉलेज में मशहूर थी ...पूर्णिमा और अमावस की जोड़ी के नाम से.
   बचपन में अपने दुबले-पतले शरीर और बदसूरत चेहरे के कारण साथियों से उपेक्षित रहे गोरेलाल ने कभी यह प्रतिज्ञा की थी कि एक दिन मैं ऐसा बनूंगा कि लोग मेरे पीछे भागेंगे ....वही हुआ भी. राउंड पर जाते समय यू.जी और पी.जी वाले कितने ही लडके-लड़कियाँ उनके पीछे लगे रहते थे. पर डॉक्टर गोरेलाल ने सबसे अधिक जिसे घास डाली वह थी पी.जी. फर्स्ट इयर की ख़ूबसूरत चीनी. लाइब्रेरी में उन दोनों को अक्सर देखा जा सकता था. दोनों आमने-सामने बैठते. चीनी चेयर पर और गोरेलाल एक ऊंचे से स्टूल पर ...इसके बाद भी गोरेलाल को जब  कभी चीनी से कुछ कहना होता था तो सिर ऊपर उठाये बिना काम नहीं चलता था. राउंड पर जाते समय चीनी की उंगली पकड़ कर चलते गोरेलाल ऐसे लगते जैसे कि कोई बच्चा अपनी अम्मा के साथ जा रहा हो. 
    आज वही चीनी पिछले दो दिन से गायब थी......गोरेलाल को गुस्सा आ रहा था ...हुंह यह भी कोई बात हुयी .......मेरे प्रस्ताव पर कोई आपत्ति थी तो सीधे से मना भी तो कर सकती थी ...मैं कोई जबरन शादी  करने तो जा नहीं रहा था ....प्रस्ताव ही तो था. मैं जानता हूँ ...मुझे कोई पसंद नहीं करेगा ...सब स्वार्थी हैं ...सब मुझसे लाभ भर लेना चाहते हैं .....ज़िंदगी भर साथ कोई नहीं देना चाहता. शरीर की इतनी अहमियत है क्या ? 
    गोरेलाल बाहर आ गए ...ओ.पी.डी. की तरफ नहीं गए ....एच.ओ.डी. ने बुलाया था ...उधर भी नहीं गए. इन दो दिनों में चीनी के बिना जैसे उनकी दुनिया ही सूनी हो गयी थी. कितनी स्वार्थी होती हैं ये लड़कियाँ ....सोचते-सोचते वे कैम्पस से बाहर आ कर छदामी की दूकान की ओर बढ़े .....
    चीनी को बुरा लगता है उसका सिगरेट पीना ......लगता है तो लगता रहे ....उसे इतनी ही परवाह थी तो पिछले दो दिनों से कोप भवन में क्यों पड़ी है ..... 
    छदामी ने गोरेलाल को देखते ही उनकी मनपसंद सिगरेट निकाल कर आगे बढ़ा दी. सुलगा कर पहला कश लिया ही था कि एक ऑटो सामने आकर रुका.....एक जानी-पहचानी खुशबू वातावरण में फ़ैल गयी .....भक्क सफ़ेद सूट पहने चीनी उतरी....परी जैसी .....सफ़ेद सूट में कितनी सुन्दर लगती है ये मरी चीनी ....गोरेलाल हड़बड़ा गए. फिर उपेक्षा भाव से, अनायास ही पीछे छिपा ली गयी सिगरेट बड़े आराम से सामने निकाल कर कश खींचने लगे ......
   चीनी ने देखा ....डॉक्टर गोरेलाल कुछ अजीब तरह से सिगरेट पी रहे हैं.....
   वह उनके पास गयी और धीरे से कहा - सर  ! एक मिनट .....
   गोरेलाल जी आज्ञाकारी बालक की तरह चीनी के पीछे चल दिए. एक ओर ले जाकर चीनी ने एक झटके से उनकी उँगलियों में फंसी सिगरेट खींच कर फेक दी ...फिर बिना कुछ कहे आगे बढ़ गयी. डॉक्टर गोरेलाल ठगे से खड़े रह गए .....थोड़ी देर तो वे चीनी को जाते देखते रहे ...फिर खुद भी लाइब्रेरी की तरफ बढ़ लिए....डॉक्टर चीनी से यह पूछने के लिए कि वाकई तुम्हें अभी भी परवाह है मेरी  ...मेरे प्रस्ताव से सहमत न होने के बाद भी ....      


8 टिप्‍पणियां:

  1. लगता तो है कि डाक्टर चीनी को परवाह है..

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  2. वाकई तुम्हें अभी भी परवाह है मेरी ...मेरे प्रस्ताव से सहमत न होने के बाद भी ....
    THIS IS THE PICK OF THE DEVOTION OF LOVE.

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    1. रमाकांत जी ! हमारे जंगल का हिस्सा बनने के लिए आभार !

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  3. फिल्‍म चश्‍मे-बद्दूर के दृश्‍य की तरह.

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  4. बहरहाल यह कहानी नहीं हो सकती :)


    मेरा मतलब किसी दोस्त या '..' का संस्मरण :)

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    1. जब तक सच्ची कहानियाँ हमारे चारो ओर बिखरी हैं तब तक किसी फिक्शन की क्या आवश्यकता ?
      जी ! ये हमारे सीनियर थे .....कहीं पता चल गया उन्हें तो मेरी खैर नहीं ......हालांकि पहले तो वे हमें जम के गरियायेंगे (सारी गंदी गालियों का प्रयोग करते हुए ) फिर हँस देंगे, यह कहते हुए कि, "साले ! तुम लोग कब पीछा छोड़ोगे हमारा"

      ..............मगर मजाल है जो किसी ने भी उनकी गाली का बुरा माना हो कभी. उन्हें हम लोग कभी नहीं भूल पायेंगे ...डॉक्टर चीनी जी बहुत ही सीधी थीं ...गंभीर भी ......

      मुझे ऐसा लगा कि चीनी जी के प्रेम में जो गंभीरता थी वह डॉक्टर साहब के प्रेम में नहीं थी .....अपने शरीर को लेकर उनकी हीन भावना हर जगह प्रकट होती थी. यूँ उनकी योग्यता के कारण हम सब उनका सम्मान करते थे.....पर वे कभी अपनी कुंठा से उबर नहीं सके ....

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  5. सर ! मैं डॉक्टर गोरेलाल सर को फोन करने जा रहा हूँ, आप गालियाँ खाने के लिए तैयार रहिये ......
    चीनी मैडम का फोन नंबर नहीं मालुम नहीं तो उन्हें भी खबर कर देता. आपके पास हो तो दीजिये.
    खैर ! यह तो परिहास रहा, किन्तु डॉक्टर गोरेलाल जी सभी के लिए एक प्रेरणा स्रोत रहे हैं. यह बात भी सही है कि वे कुंठा से ग्रस्त थे ...फिर भी वे हतः योगी तो हैं ही. अपनी कुंठा को उन्होंने कभी अपने विकास में आड़े नहीं आने दिया......और फिर अवतार बन कर कौन आया है यहाँ ?

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.