शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

बाज़ार बहुत बड़ा है.......


दृश्य एक -
मद्यपी पिता और श्रमिक माता की किशोर होती कन्या पर कृपालु दृष्टियों की झमाझम होती वारिश ....वारिश में भीगती किशोरी.....माँ की विवशता  ...पिता की पाशविकता.....कुछ  लालच ....कुछ हिंसा ....  मृत शरीरों का जीवित बाज़ार .....पीड़ाके मोल 
बिकते आनंद की विवशता .....शून्य संवेदना के साथ विकसित होती सभ्यता ......बड़ी खामोशी से दौड़ता व्यापार और स्टेटिस्टिक्स का यह प्रमाण कि हम हर स्तर पर पहले से कहीं अधिक सभ्य और विकसित हुए हैं.

दृश्य दो-
स्वयं की भोगी अवर्णनीय पीड़ा की पुनरावृत्ति को चुपचाप देखने की एक और पीड़ा का सागर .....सागर के खारे पानी में डूबती आशाएं ....तैरती परम्पराएँ .....परम्पराओं से फलते धन कुबेर ....और धन कुबेर की आँखों में बसी किसी सभ्य के पाप की किशोर होती एक और बेटी ...जोकि बेटी नहीं ...... एक माल है....

दृश्य तीन -
मंदिरों में बजती घंटियाँ....मंत्रोच्चारण से पवित्र होता वातावरण .....वर्ष में दो बार नवरात्रि पर स्त्री शक्ति की पूजा का पाखण्ड .....कन्या भोज ...भोज से पूर्व कन्याओं के चरण प्रक्षालन का पुण्य लूटते लोग ...
जिस देश में कन्या को देवी का स्वरूप मान कर उसे पूजा जाता हो वहाँ प्रथम दो दृश्य केवल कल्पना या मिथ्या आरोप जैसे नहीं लगते आपको ? यदि ये आरोप मिथ्या नहीं हैं तो हम सब घोर पापी हैं यह सत्य स्वीकारना होगा. यह मैं नहीं कहता .....न जाने कितनी मासूम फलक ...कितनी मंजू.....कितनी विमला ...कितनी राधा ....कितनी भंवरी बाई
...कितनी ......बाज़ार बहुत बड़ा है किस किस के नाम गिनाऊँ ? 
मंदिरों में पत्थर की देवियाँ क्यों होती हैं ....अब मैं समझ गया हूँ .......वे अपने प्रतिरूपों की पीड़ा सह नहीं सकती न ...इसीलिये.....  

5 टिप्‍पणियां:

  1. सभ्यता और मूल्यों के गिरते स्तर पर बस्तर से प्रस्तर होती कन्याओं की यह कथा मात्र तीन दृश्यों में वर्णित व्यथा नहीं है... तीन दृश्य, मूलतः तीन पटकथाएं हैं जिनपर सम्पूर्ण कथा सनसार रचा जा सकता है... दोहरे मानदंडों और पाशविक चरित्र का मार्मिक प्रकटन, डॉक्टर साहब!!

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  2. यह एक क्रूर किंतु सच टिप्पणी है हमारी सामाजिक व्यवस्था पर।

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  3. समाज के पाखण्ड पर करारी चोट करती है यह पोस्ट। दरअसल, हम आपने आदर्शों को जीवन में नहीं उतारना चाहते।

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  4. :( यह वाला कमेंट ही सही है इस पोस्ट के लिए।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.