मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

चौपाल की चखचख ....२

 यह कैसी देश भक्ति ?

मैं घुमा फिरा कर नहीं कहूँगा।  एक लम्बे समय से ब्लॉग जगत में शीतयुद्ध चल रहा है। प्रतीक्षा थी कि सभी लोग तो देशभक्त हैं ..आपसी समझ और सहनशीलता से सब कुछ ठीक हो जाएगा। ..पर मैं दुखी हूँ....ऐसा कुछ भी नहीं हो सका। 
मैं बात कर रहा हूँ हमारी बिटिया रानी दिव्या, अनुज अनुराग, और दिव्या के प्रबल समर्थक दिवस जी की। 
कष्टपूर्वक कहना पड़ रहा है कि हम सब आपसी लड़ाई में अपनी रचनात्मक ऊर्जा नष्ट करने में लगे हुए हैं। आश्चर्य तो यह है कि सभी लोग अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदार हैं और राष्ट्र के उत्थान के लिए चिंतित हैं। इन तीनो के राष्ट्र प्रेम पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। तीनो ही लोग भारत को आदर्श की ऊँचाइयों पर प्रतिष्ठित और पूरी तरह आत्मनिर्भर देखना चाहते हैं। फिर क्या कारण है कि ये लोग अपने उद्देश्य से विचलित होकर आपसी युद्ध में ही अपनी रचनात्मक ऊर्जा जाया करने में लगे हुए हैं?
विदेशियों के आक्रमण से पूर्व भारत के राजघरानों के आतंरिक और बाह्य संघर्षों ने उनकी शक्ति और बुद्धि को कुंठित कर दिया था। राजा आम्भिदेव को विदेशियों के भारत में स्थापित होने वाले शासन से कोई आपत्ति नहीं थी। उन्होंने यवनों को अपने राज्य में से होकर आगे जाने का मार्ग दे दिया... कोउ नृप होय हमें का हानी....। देशी राजाओं की आतंरिक कलह ने  विदेशियों को बारम्बार भारत आने के लिए अनुकूल अवसर उपलब्ध करवाए..परिणामतः भारत को एक लम्बे समय तक न केवल पराधीन होना पड़ा अपितु अपने सांस्कृतिक और वैज्ञानिक गौरव से भी वंचित हो जाना पड़ा।
भारत की वर्त्तमान राजनीति अत्यंत निराशाजनक है, औद्योगिक घराने व्यक्तिगत समृद्धि के लिए सत्ता को अपनी उँगलियों पर नचा रहे हैं, आमजनता किसी चमत्कार की आशा में है और किसी भी अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहती, प्रबुद्धवर्ग एक मत नहीं हो पा रहा... और आपसी संघर्षों में लीन है। यह परिदृश्य है वर्त्तमान भारत का।
मैं बारम्बार कहता हूँ कि इस तरह तो हम कबीला संस्कृति  की ओर बढ़ते जा रहे हैं...हर कबीले का अपना एक अलग मत ..एक अलग संविधान .. अलग भाषा  .. अलग नीति और रीति ....सबकुछ अलग ...। इस सब के बीच में देश कहाँ है? 
ब्लॉग लेखन में मुद्दों से निकलकर व्यक्तिगत दोषारोपण और आरोप-प्रत्यारोप के जाल से आखिर कब निकलेंगे हम ? जब हम समूह से छिटककर व्यक्ति पर आ जाते हैं तो समाज और राष्ट्र की अवधारणा समाप्त हो जाती है ...और तब अपने मूल उद्देश्य से भटकने में देर नहीं लगती हमें। क्या हम केवल मुद्दों पर ही चर्चा नहीं कर सकते ? बच्चों की तरह आपस में लड़कर हम किस आदर्श को स्थापित कर रहे हैं? ...और क्या जिस क्रान्ति की बात हम करते हैं वह इस तरह संभव हो सकेगी? अरे हम तो पूरी वसुधा को परिवार मानने का आदर्श लेकर चले थे .....और हो क्या रहा है? कहाँ है कुटुंब का प्रेम और वैसी सहनशीलता ? 
नहीं....मैं दुखी हूँ ...बहुत दुखी हूँ .... जब हम देश के लोगों से ही प्रेम नहीं कर सकते तो देश प्रेम का क्या अर्थ है? 
समूह में मतवैषम्यता स्वाभाविक है किन्तु आगे बढ़ने के लिए एकमत होना भी आवश्यक है। अंतरजाल पर होने वाले सारे क्रियाकलाप वैश्विक होते हैं ...किन्तु क्या उनका स्तर भी वैश्विक बना पा रहे हैं हम ? हमें अंतर्जाल के इस विश्वमंच पर अपनी दुर्बलताओं का प्रदर्शन नहीं करना चाहिये।  क्या हम भारतीय इतिहास के काले अध्यायों की पुनरावृत्ति किये बिना शांत नहीं होने वाले? 
मेरी विनम्र करवद्ध प्रार्थना है सभी ध्रुवों से कि वे अवधारणाओं के विरोध को व्यक्तिगत विरोध न बनायें। शालीन भाषा के प्रयोग से लोगों के दिल जीते जा सकते हैं ....और दूसरे का सम्मान करके हम अपने सम्मान के बीज बो सकते हैं। ध्यान रहे हमारा लक्ष्य भारतीय गौरव की पुनर्स्थापना है ...इसलिये हमारा आचरण भी तदनुकूल होना ही चाहिये। 
हम आशा करते हैं कि अब कोई विवाद नहीं होगा। तीनों को मेरा आशीर्वाद ...शुभकामनायें...कल्याणमस्तु ।

सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दुःख माप्नुयात ॥            
   

16 टिप्‍पणियां:

  1. आपका बहुत बहुत शुक्रिया इतने अछे कमेंट्स के लिए ... वैसे अब मैं कानपूर में नहीं हूँ ...अपने शेहेर शिमला में हूँ ... और सेहत भी ठीक है .. phd final stage पर है ... जल्द ख़तम हो जाएगी ... लेकिन मेरा का विषय आपको कैसे पता .. ?? .. मैंने तो mention नहीं किया है कहीं ... ??

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. क्लिनिकल साइकियाट्री भर मालुम है, शोध का टॉपिक नहीं पता। अभी इसी महीने तो देहरादून गया था मैं, पहले पता होता तो मिलने ज़रूर आता। अगली यात्रा में तय रहा। शोध का टॉपिक बताइयेगा,मेरा मेल नोट किया जाय-
      kaushalblog@gmail.com

      हटाएं
  2. आपकी पोस्ट पढ़ी ... ब्लॉग्गिंग थोड़ी कम हो गयी है .. इसलिए आपने जो लिखा है उसके बारे में पता नहीं है .. मगर आपका लेख पढ़कर ये ही कहूँगी ही बड़ी बड़ी प्रोब्लेम्स का हल बातचीत से किया जा सकता है ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. भारत में यदि बुद्ध और महावीर हुए हैं, तो परशुराम जी भी | वैसे भी आज तो परशुराम जी की जयंती है |

    श्री कृष्ण ने गीता में यह भी बताया की चुप कब रहना है, और यह भी की युद्ध कब करना है |

    सिर्फ इसलिए किसी की गलतियों से आँख मूँद लेना की वह "पुत्र / बिटिया" है - यह धृतराष्ट्र की निशानी है - the mad attachment to offspring led to thousands of deaths. just because duryodhana kept on fooling his father about commiting suicide if things were not done to his wishes. शकुंतला के महान पुत्र भरत जी ने अपने बेटों को काबिल न पाया - तो सब जानते हैं की क्या किया |

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. विश्व के अन्य युद्धों की अपेक्षा कौरव-पाण्डव और राम-रावण युद्ध कई अर्थों में विशेष थे। एक तो यही कि इनके पीछे कुछ ठोस कारण थे, दूसर यह कि युद्ध से पूर्व युद्ध को टालने के हर सम्भव प्रयास किये गये थे। युद्ध तो अंतिम विकल्प है, और रहेगा भी। भारत में श्रेष्ठता को सदा सम्मान दिया जाता रहा है। भरत की परम्परा अनुकरणीय है। दिव्या के प्रति यदि मेरा बिटियावत स्नेह है तो अनुराग के प्रति भी अनुजवत प्रेम है। गलत को गलत कहना ही पड़ेगा फिर वह चाहे बिटिया हों या अनुज। मैं तटस्थ रहने का प्रयास कर रहा हूँ। किसी की गलती को इंगित नहीं कर रहा। इससे विवाद और भी बढ़ते हैं, मैं चाहता हूँ कि सभी पक्ष आत्मान्वेषण करें और समझदारी का परिचय दें। जीवन की अवधि इतनी नहीं है कि हम रचनात्मक कार्यों से हटकर युद्धों में अपनी ऊर्जा नष्ट करें।

      हटाएं
    2. आदरणीय सर
      जी | आप सच कह रहे हैं - युद्ध टालने के प्रयास हुए थे |

      परन्तु राम रावण युद्ध को टालने के सारे ही प्रयास श्री राम जी की ओर से आये थे - रावण की और से सिर्फ और सिर्फ जिद थी | रावण की तरफ तो सिर्फ एक ही व्यक्ति था जिसने उसे सही गलत समझाने की कोशिश की - विभीषण | जिसे रावण ने निकाल दिया | उसे दिख रहा था की क्या सही है और क्या गलत | उसने सही का साथ दिया |

      इसी तरह महाभारत युद्ध में भी शान्ति के प्रयास पांडवों की ही और से होते रहे | बहुत सी गलतियों को (हत्या की कोशिशों तक को ) कई कई बार माफ़ ओर नज़रंदाज़ किया गया | परन्तु धृतराष्ट्र की छाँव में बैठा दुर्योधन अपने गर्व में अपनी गलतियाँ देख ही न सका | पिता यह जानते हुए भी की मैं अनुज पुत्रों के साथ अन्याय कर रहा हूँ , अपने मोह में बंधे रहे | विदुर ने प्रयास किया - उसे निकल जाने को कहा गया | भीष्म अपने पितृ मोह में ली गयी अंधी प्रतिज्ञा से बंधे रहे, ओर सही गलत देख कर भी गलत का साथ देने पर मजबूर रहे | इसी तरह आचार्य द्रोण भी अपने मित्र द्रुपद पर क्रोध ओर अंध प्रतिशोध के चलते अपने आप को धृतराष्ट्र का ऋणी बना बैठे |

      तो सब देख कर भी, ध्रितराष्ट्र, भीष्म ओर द्रोण ने गलत का साथ दिया | द्रौपदी का चीर हरण होता रहा - ओर ये तीनों आँख कान मूंदे रहे | द्रौपदी की रक्षा को सिर्फ कृष्ण सामने आये |

      विदुर अपना मंत्री धर्म निभा कर आखिर युद्ध के समय पांडवों (धर्म) के साथ दिखे | शायद दुर्योधन से भी अधिक जिम्मेदारी इन शक्तिशाली बुजुर्गों की है | दुर्योधन उस सीमा तक जा ही नहीं पाता यदि उसे ये तीनो समर्थन न दे रहे होते |अन्याय का साथ देना भी अन्याय ही होता है | मैं यह सब गुस्से में नहीं लिख रही हूँ - आपने "सभी पक्षों" से आत्म मंथन को कहा है - इसीलिए कह रही हूँ | क्या राम रावण युद्ध में राम से आत्म मंथन को कहना उचित होते ? या - क्या भीष्म ओर द्रोण ( जो युधिष्ठिर के भी गुरु थे ) युधिष्ठिर (या कृष्ण) से आत्म मंथन करने को कह सकते थे ? आत्म मंथन वहां उचित है - जहां मंथन करने वाले के मंथन करने से कुछ सार निकलने वाला हो |

      आपसे हाथ जोड़ कर माफ़ी चाहती हूँ - आपसे बहुत छोटी हूँ | आपके सामने इतना कह गयी - कृपया मुझे माफ़ कर दीजिये | किन्तु यह मैंने क्रोध में नहीं कहा - न्याय अन्याय की द्रष्टि से कहा | आप भी सोचियेगा की न्याय का तकाज़ा क्या है |

      हटाएं
    3. नेपथ्य में कल ही इस प्रकरण पर बहुत चर्चा हो चुकी है। मैं तटस्थ की भूमिका में हूँ किंतु दुर्भाग्य से स्क्रिप्ट बदल गयी, थीम बदल गयी, किरदार बदल गये, मैं भी एक पार्टी घोषित कर दिया गया हूँ।
      नहीं .... यह फ़िल्म मुझसे नहीं हो सकेगी..क्योंकि मैं पार्टी नहीं हूँ अतः अपनी पराजय स्वीकार करते हुये पलायन कर रहा हूँ। सब लोग समर्थ हैं... ज्ञानवान हैं ....वस्तुतः मेरी यहाँ आवश्यकता ही नहीं थी। अपने अविवेकपूर्ण कृत्य के लिये जो भी दण्ड दिया जायेगा उसे स्वीकार कर लूँगा। वचन देता हूँ,पुनः ऐसा अपराध नहीं होगा।

      हटाएं
  4. आदरणीय डॉ. साहब, आपने मुझे अनुज माना, इसका अभार! क्षमा कीजिये, मुझे आज तक ऐसी किसी भारतीय परम्परा का ज्ञान नहीं है जिसमें नारी और संविधान को खुलेआम लांछित करने वाले देशभक्त कहलाते हों।

    भगवान परशुराम पर एक आलेख यहाँ भी है: http://pittpat.blogspot.com/2010/05/blog-post_15.html
    पढकर बताइये, कैसा है।

    जय भारत, शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं
  5. मिथ्या लांछना किसी की भी निन्दनीय ही है। संविधान की उपादेयता और अनुकूलता पर चर्चा की जा सकती है। यदि उसमें ऐसा कुछ है जिससे देश के नागरिकों के साथ पक्षपात होता हो या उनकी स्वतंत्रता का अपहरण होता हो या किसी समूह विशेष के विकास में बाधा उत्पन्न होती हो तो संविधान के उन इश्यूज का तर्क सम्मत विरोध होना ही चाहिये। पर यह ध्यान रखा जाना चाहिये कि विरोध तर्कसम्मत,विनम्रतापूर्वक और शालीन भाषा में हो। हमें हर हाल में अपने देश के संविधान का सम्मान करना ही चाहिये। विरोध और अपमान में बहुत अंतर है...शायद शिल्पा जी ने भी यही बात कही थी...आपका भी यही आशय रहा था।
    देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप पुराने के स्थान पर नये नियमों की आवश्यकता पड़ती ही है। समय-समय पर संविधान में संशोधन भी इसीलिये किये जाते हैं। किंतु इन स्ंशोधनों के लिये एक निर्धारित प्रक्रिया की आवश्यकता होती है जिसकापालन अपरिहार्य है। कोई भी वह प्रक्रिया जो देश और उसके निवासियों की सुख-शांति में बाधक बनती है देशद्रोह कही जायेगी।
    हमारा सभी लोगों से विनम्र अनुरोध है कि वे आत्ममंथन करें...बिना किसी पूर्वाग्रह के। अंततः विवाद का अंत तो करना ही पड़ेगा ...बेहतर है कि शालीनतापूर्वक किया जाय ...मर्यादा में रहते हुये।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपको कोई और काम धाम नहीं है क्या भाई ?

    उत्तर देंहटाएं
  7. काहें? ई काम ज़रूरी नइखे का? अइसन उपेक्षा मत करीं मिसिर जी! इहो ज़रूरिये काम बा ।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अब हमरो के बुझा गइल, राउर ठीके कहत रहलीं .... ई काम हमार बस के नाईं हौ।

      हटाएं
  8. निसंदेह लक्ष्य सभी का उत्तम हो सकता है पर समस्या उस लक्ष्य को पाने के मार्ग व उपाय के साथ है। अक्सर उस मार्ग से असहमति व्यक्तिगत विवाद में परिणित हो जाती है। ज्ञान जहाँ हमारे दिमागों के दरवाजे खोलता है वहीं ज्ञान के दर्प का आक्समिक आगमन विवादों का जन्मदाता बन जाता है और ज्ञानी स्वयं अनभिज्ञ ही रहता है। अहं इस बात को बढाता जाता है। स्वाभिमान उस विवाद को हवा देता रहता है।

    देश का गौरव उत्थान लक्ष्य है। पर मार्ग तीन है……
    १- वास्तविक गौरव के कार्य किए जाय।
    २- किसी अन्य के गौरव से तुलना करके हमारे गौरव को श्रेष्ट बताया जाय।
    ३- किसी अन्य के गौरव को खण्डित करते हुए यह माना जाय कि उसका गिरना हमारे गौरव का उत्थान है।

    पहला सही मार्ग है। दूसरे दो मिथ्या मार्ग है। मिथ्या मार्ग को चुनौती देने पर प्रतिपक्षी में यदि मान(ईगो) कषाय उन्नत होगा। तो वह चुनौती व्यक्तिगत विवाद में परिणित हो जाएगी।

    प्रश्न यह है कि सभी का मार्ग सार्थक सुविचारित और सुपरिणामी कैसे बनाया जाय?

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुज्ञ जी! अभी जो आपने कहा .... ऐसे ही विमर्ष की आशा थी मुझे। पर निराश हुआ हूँ... कदाचित मेरे कहने में ही कुछ दोष हुआ है। इस प्रकरण पर यह मेरा अंतिम प्रयास माना जाय। आज सुबह से मैं व्यथित हूँ इस प्रकरण पर। सभी पक्षों से क्षमा याचना के साथ इस प्रकरण से विदा लेता हूँ अब..और वादा करता हूँ कि अब ऐसी कोई अपेक्षा नहीं करूँगा। भविष्य में किसी को शिकायत का अवसर न मिले यह वचन भी देता हूँ।

      हटाएं
  9. kitne sobhagya ki baat hai jis vishay par maine abhi ek post likhi usi vishay se sambandhit ek achchi post padhne ko mili..aabahr

    मत भेद न बने मन भेद -A post for all bloggers

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.