बुधवार, 9 मई 2012

महाभिनिष्क्रमण से निर्वाण तक

प्रिय ब्लॉग साहित्यकार बन्धु एवं भगिनी!

यशोधरा जैसी न जाने कितनी ऐसी स्त्रियाँ हैं जो बड़ी ख़ामोशी से अपने सहचर की ऐषणाओं की पूर्ति के लिये स्वयं को नीव का पत्थर बना देती हैं। ऐषणा चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक पति के लिये स्त्री का उत्सर्ग  पति की तमाम उपलब्धियों के अधिकतम मूल्य से भी कहीं अधिक है...इतना अधिक कि कोई अपना सर्वस्व दे कर भी उसे चुका नहीं सकता। स्त्री का स्वर..उसकी भावना...उसका त्याग ...उसका समर्पण सब कुछ नेपथ्य में बना रहता है और जीवन के रंगमंच पर प्रकाशित होती हैं केवल पुरुष की उपलब्धियाँ। नींव में पड़े पत्थरों की धड़कनों को सुना है रश्मि प्रभा जी ने ...और सुनकर उन्हें अपने शब्दों से ध्वनित कर दिया है अपनी कृति "महाभिनिष्क्रमण से निर्वाण तक" में। पठनीय और संग्रहणीय कृति....  
आपका    - कौशलेन्द्र

पुस्तक का नामः महाभिनिष्क्रमण से निर्वाण तक

विधाः कविता

कवयित्री- रश्मि प्रभा

पृष्ठः 96

मूल्यः रु 150

प्रकाशकः हिंद युग्म, नई दिल्ली




रश्मि प्रभा का नाम इंटरनेट की दुनिया के लेखकों-पाठकों के लिए नया नहीं है। रश्मि उन बहुत थोड़े लोगों में से हैं, जिन्होंने इस आभासी दुनिया का बहुत रचनात्मक इस्तेमाल किया है। ये थोड़े लोग ही किसी माध्यम विशेष की प्रासंगिकता को चिन्हित करते हैं। हर कवि लिखते-लिखते एक समय अपनी एक खास शैली विकसित कर लेता है। प्रस्तुत संग्रह में रश्मि अपने पूर्णतया मौलिक स्वर एवं शैली के साथ मौजूद हैं। इनकी कविताओं का झुकाव कुछ हद तक आध्यात्मिक है और इस संग्रह की लगभग हर कविता में यह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान है।

सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रमण की कहानी का मुख्य पात्र यधोधरा है। रश्मि ने 'सिद्धार्थ ही होता' कविता के माध्यम से किसी सिद्धार्थ के बुद्ध होने की प्रक्रिया में उसकी यशोधरा की भूमिका को रेखांकित किया है। रश्मि की यह नवीन दृष्टि ही इनके लेखन को नई ऊँचाइयाँ प्रदान करती है। असल में रश्मि के काव्य-साहित्य की एक बहुत खास बात यह भी है कि इसमें पौराणिक एवं ऐतिहासिक चरित्र नये अर्थों के निकस पर कसे जाते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस कारण ही रश्मि की कविताएँ प्राचीन मान्यताओं, परंपराओं एवं प्रवृत्तियों पर नये तरह से विमर्श करने का सामर्थ्य रखती हैं।

रश्मि अपनी कुछ कविताओं में पुरुषवादी प्रवृत्तियों से मध्यमवर्गीय स्त्री की भाँति सवाल करती नजर आती हैं। 'महिला दिवस' के नाम पर पुरुषवादी मानसिकता द्वारा किए जाने वाले छल को उजागर करती हैं। 'पुरुष और स्त्री' कविता में एक दार्शनिक की तरह इन दो मानसिकताओं का फर्क समझाती हैं। कुल मिलाकर रश्मि की कविताओं में बहुत सारे विमर्श हैं, बहुत से सवाल हैं, कुछ समाधान भी हैं और इनसे भी अधिक लगातार असंवेदनशील होते जा रहे मनुष्य को सचेत करने के प्रयास हैं। मैं समझता हूँ कि पाठक इन्हें हृदय से स्वीकारेंगे।

शैलेश भारतवासी

संपादक, हिंद युग्म

7 टिप्‍पणियां:

  1. महाभिनिष्क्रमण से निर्वाण तक पुस्तक की सुंदर समीक्षा के लिए बधाई,,,,,
    इसमें कोई शक नही.... "रश्मी जी" एक बेहतरीन रचनाकार कवियित्री है,......
    कोशलेन्द्र जी,अगर कोई कमेंट्स आपकी पोस्ट पर करता है तो उसके पोस्ट पर जाकर अपना कमेंट्स दे,ये मेरा सुझाव है ,,,,,,,,,ताकि लोग अधिक से अधिक आपके पोस्ट पर पहुचे,और आपको पहचान सके,...

    my recent post....काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....

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  2. रश्मि दी और उनका लेखन तो सबको प्यारा हैं........
    मुझे उनका स्नेह प्राप्त है सो खुद को गौरवान्वित महसूस करती हूँ.

    ढेर सा स्नेह और शुभकामनाएँ.
    आपका शुक्रिया.

    अनु

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  3. अनुग्रहित हुई ... शुक्रिया कौशलेन्द्र जी एवं सारे शुभचिंतकों का

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  4. रश्मि दीदी की संवेदनाओं और मुद्दे से जुड़े सवालों से मैं परिचित हूँ और उनका कायल भी.. उनकी विशेषता यह है कि उनके द्वारा अभिव्यक्त मुद्दे कभी चीखते चिल्लाते नहीं, ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाते नहीं, बल्कि खामोशी से अपनी बात कह जाते हैं और यदि संवेदनाएं जीवित हों तो उसे जगाने का काम करते हैं.. इन्होने अपनी रचनाओं के माध्यम से न कोई समाजसेवी होने का दावा किया और न ही क्रान्ति के सूत्रपात का, बस यथावत अपने विचार रखे हैं!
    देखूं पुस्तक हाथ में आ जाए तो पढकर सीखने की कोशिश करता हूँ!! डॉक्टर साहब, आभार आपका!

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  5. "रश्मि की कविताएँ प्राचीन मान्यताओं, परंपराओं एवं प्रवृत्तियों पर नये तरह से विमर्श करने का सामर्थ्य रखती हैं।"

    रश्मि जी की कविताओं के विषय में यह कहना...बिलकुल सार्थक है..उसनी एक जगह संग्रहित रचनाएं पढना एक सुखद अनुभव होगा.

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.