सोमवार, 11 जून 2012

हर पल चीरहरण की बेला

 

जंगल में बहते थे झरने
बांह पसारे पेड़ खड़े थे।
बस्ती ने थीं खायी कसमें
क़ातिल सारे वहीं अड़े थे।

 चलते-चलते जंगल में ये
बस्ती ने क्यों डेरे डाले।
अंग-अंग पर इस जंगल के
इंसां ने हैं डोरे डाले।

 हर पल चीरहरण की बेला
में जंगल ने रुदन किया था।
जिसको अब तक पाला उसने
उसी के हाथों गरल पिया था।

 कुछ न छिपा है, देखा सब कुछ
फिर भी क्यों चुप तारे सारे ?
रोत-रोते युग बीते हैं
सूख गये अब आँसू सारे।

जंगल को यूँ खाते-खाते
हुये जंगली बस्ती वाले।
क्या होगा जब लूट मची हो 
    लूट रहे हों ख़ुद रखवाले।    

2 टिप्‍पणियां:

  1. जंगल को यूँ खाते-खाते
    हुये जंगली बस्ती वाले।
    क्या होगा जब लूट मची हो
    लूट रहे हों ख़ुद रखवाले।

    [am]बेहतरीन अभिव्यक्ति की सुंदर रचना,,,,, ,[/am]

    MY RECENT POST,,,,काव्यान्जलि ...: ब्याह रचाने के लिये,,,,,

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  2. इंसान हुआ स्वार्थी......
    अपने माँ-बाप,भाई-बहन को नहीं छोड़ता तो जंगल क्या चीज़ है...................

    सुन्दर रचना.

    अनु

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.