रविवार, 17 जून 2012

कागज का पुलिन्दा

  उस दिन जब मृण्मयी ने कहा था कि यह जितना भी दिखाई देता है .....संसार इतना ही नहीं है, और भी बहुत से संसार हैं जो दिखाई तो नहीं देते पर होते बहुत जटिल हैं और जिनके रचयिता हम स्वयं होते हैं, तब निशांत कुछ समझ नहीं सका था। समझ सका तब, जब किशोर ने एक-एक कर अपनी कई गाँठें खोल डालीं उसके सामने। पर गाँठें क्या यूँ ही खुल गयी थीं ! सहज नहीं होता किसी गाँठ को खोल पाना...विशेषकर तब और भी जब कि अपने रचना संसार की सीमायें दूसरों के लिये अप्रवेश्य हों। 

    अपने एक दूर के चाचा के पास रहकर पढ़ायी के लिये आये किशोर का अपना घर यहाँ से बहुत दूर है इसलिये पड़ोस में रहने वाली मृण्मयी ने उसे नाम दिया है प्रवासी । ग्रामीण पृष्ठभूमि से आये प्रवासी किशोर को यहाँ रहते दो वर्ष बीत चुके हैं। संकोची स्वभाव का किशोर आजकल कुछ अधिक ही गंभीर हो गया है। उसकी गंभीरता ने सामान्य व्यवहार की सरलताओं को वर्ज्य कर दिया था जिसके कारण उसका मित्र निशांत भी कुछ असहज अनुभव करने लगा था। कई बार निशांत ने जानने का प्रयास किया कि आख़िर हुआ क्या, पर किशोर ने कोई उत्तर नहीं दिया। निशांत पीछे पड़ता तो चुपचाप उठता और चल देता नदी की ओर ......और बैठा रहता वहीं घण्टों ...नदी के किनारे। 

  पर आज निशांत ने भी पीछा नहीं छोड़ा उसका, पीछे-पीछे लगा ही रहा नदी तक। उसने भी सोच लिया था, कुछ भी हो आज इस प्रवासी मित्र के मन का रहस्य अनावृत करना ही होगा। अंततः इस सबका दुष्प्रभाव उसके अध्ययन पर पड़ना निश्चित था। तब उस दिन बहुत मनाने समझाने के पश्चात् जो भी कुछ बताया उसने उसे सुनकर तो एक बारगी आश्चर्यचकित ही रह गया निशांत। इतना कुछ घट गया और उसे पता तक नहीं। 

  कुछ स्तब्ध क्षणों को पारकर निःश्वास छोड़ते हुये निशांत ने पुनः प्रश्न किया - "तो उस दिन मृण्मयी की हठीली धारणा का समाधान न कर पाने से ही इतना विषाद हो गया है तुम्हें?" 

   एक गम्भीर श्वास लेकर रहस्य की एक और पर्त को उदीर्ण किया किशोर ने, बोला -"नहीं बन्धु! इतना भी तो ठीक था पर मेरी समस्या तो उस दिन से प्रारम्भ हुयी जिस दिन मैं यह लक्ष्य कर सका कि मृण्मयी के जीवन में एक विचित्र ही परिवर्तन हो गया है। तुमने भी देखा होगा, अब वह पहले जैसी नहीं रह गयी। उसकी चपलता, चंचलता और हर पल अधरों पर रहने वाली निर्मल हंसी सब कुछ एकबारगी ही न जाने किस गह्वर में विलीन हो चुकी हैं । मुझे लग रहा है अब उसके जीवन में वह उल्लास नहीं ...वह आनन्द नहीं ..। बस, जीवन एक निरुद्देश्य भार सा बन कर रह गया हो जैसे...और जिसे वह ढ़ोये जा रही है चुपचाप , बिना किसी प्रतिवाद के। उसकी यह स्थिति ही मेरे लिये असह्य हो उठी है क्योंकि इसका उत्तरदायी किसी न किसी रूप में मैं स्वयं ही हूँ। सच, यदि मैने इतना तिरस्कार न किया होता उसका तो ऐसा नहीं होता......कभी नहीं होता।"  

  बोलते-बोलते उसकी आँखें शून्य में न जाने कहाँ जाकर उलझ सी  गयीं, जैसे खो गया हो कुछ ....और उसे खोजने में प्रयत्नशील हो वह । 

  देर तक दोनो के मध्य मौन छाया रहा। निशांत भी किंकर्तव्यविमूढ़ ...कुछ सोचने की शक्ति ही जैसे समाप्त हो गयी हो। समस्या अवश्य ही साधारण नहीं थी, और उसका समाधान ? अब भला समाधान भी क्या हो सकता है उसका ? शत्रु के संसाधनों को नष्ट करते समय यह विचार ही नहीं आया उसे कि अपनी सीमा में वापस आने के लिये कोई तो मार्ग शेष रखे। सब साधन नष्ट कर दिये थे उसने ...स्वयं अपने ही हाथों से। 

  निशांत की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था , तो भी इतना तो कहा ही - "जिसका स्वेच्छा से ...अकारण ही तिरस्कार कर दिया तुमने आज उसके लिये ही इतना दुःख या मोह करने की क्या आवश्यकता ?"  

  कहने को तो कह गया पर तुरंत ही किशोर की अपनी ओर उठी आहत दृष्टि देखकर ही निशांत ने अनुमान कर लिया कि अभी उसने जो कहा वह उचित नहीं था अथवा सामयिक नहीं था। जो भी हो, फिर तो उसने चुप रहना ही उचित समझा। परंतु मन स्थिर न रह सका, स्थिर रहता भी कैसे, कोई साधारण कहानी थी किशोर की ? 

  निशांत का मन करुणा से भर उठा, पर उससे क्या, दोष तो सचमुच किशोर का ही था न! समाज की प्रतिक्रियायों का ध्यान करके इतने भीरु होने से काम चलता है कहीं ? समाज तो हर अच्छे-बुरे कार्य में टिप्पणी करने से नहीं चूकता पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि मनुष्य आलोचना के डर से हर कार्य को तिलांजलि ही दे दे। प्रत्युत् यहाँ तो मृण्मयी की ही प्रशंसा किय बिना नहीं रहा जा सकता जो उसने सबके सामने ही एक दिन यह घोषणा कर दी कि "समाज की संकीर्ण बुद्धि किसी के घर आने-जाने और परस्पर विचार विनिमय को भ्रांत दृष्टि से विश्लेषित कर कोई प्रतिबन्ध लगाना चाहे तो मुझे उसकी लेश भी चिंता नहीं ...और इसके लिये तो मैं लड़की होकर भी समाज के प्रत्येक आघात का सामना करने के लिये सदैव तैयार हूँ।" 

  सच तो यह है कि मृण्मयी को किशोर के पास बैठकर बातें करना अच्छा लगता था, विभिन्न विषयों पर ढेरों बातें होती थीं उनके बीच ..बिना किसी दुराव-छिपाव के। पर यह केवल सम्भाषण ही नहीं था, इस साहचर्य के पीछे  किशोर के प्रति अपने सहज आकर्षण को मृण्मयी ने कभी छिपाया नहीं, उसे इसकी कभी आवश्यकता ही नहीं हुयी । पर किशोर ?  

  ग्रामीण पृष्ठ्भूमि से आया प्रवासी किशोर जानता है कि हमारे समाज में विपरीत लिंगियों के मध्य की इस सहजता के लिये कोई स्थान नहीं है, इसी कारण वह नहीं चाहता था कि वहाँ के समाज के परोक्ष या अपरोक्ष  विरोध के कारण उसके अध्ययन में कोई बाधा आये। तभी तो उसने अड़ोस-पड़ोस का हल्का सा विरोध होते ही एक दिन स्पष्ट कह दिया मृण्मयी से -"यहाँ मत आया करो मृण्मयी, तुम्हारा मुझसे मिलना-जुलना उचित नहीं।" 

  पर जब मृण्मयी ने इसके लिये समाज से टक्कर लेने की घोषणा कर किशोर को अवाक कर दिया तो शीघ्र ही कुछ उत्तर देते न बन पड़ा उसे। फिर जैसे-तैसे धीरे से कहा -"मैं प्रवासी हूँ, तुम्हारे सान्निद्य के लिये मुझे समाज का विरोध सहने की क्या आवश्यकता ?" 

  किशोर के इस उत्तर से मृण्मयी के दुःख और क्षोभ का अंत नहीं, खिन्न मन से इतना ही कहा- "जानती हूँ, तुम भी घृणा करते हो मुझसे। दूसरों की तरह स्वयं को मिथ्या पूर्वाग्रहों से मुक्त न कर सके तुम भी। पर इतना समझ लो, वैसी नहीं हूँ मैं जैसी कि धारणा बना रखी है तुमने। मेरी उन्मुक्तता को बहुत ही संकीर्ण अर्थों में लिया है तुमने।" 

   इसके बाद एक पल भी नहीं रुकी मृण्मयी, तुरंत द्रुत गति से चली गयी वहाँ से। किशोर रोकता ही रह गया...पर नहीं, मानिनी मृण्मयी को रोक पाना सम्भव नहीं था अब। घर पहुँचते ही क्षोभ और अपमान से झर-झर आँसू झर पड़े उसके ।

   मृण्मयी के हृदय में किशोर के प्रति उत्पन्न हुये सहज आकर्षण के लिये हमारे समाज में एक ही संज्ञा है -'उच्छ्रंखलता'। अपने खुले विचारों के कारण वह लोगों की घृणा की पात्र थी । पर किशोर से ऐसी आशा नहीं थी उसे।

  मृण्मयी की इस धारणा का समाधान चाहकर भी किशोर नहीं कर सका कभी। मृण्मयी ने समाधान चाहा भी नहीं । पर यह एक अंतिम पृष्ठ था उसकी किशोरावस्था के एक अध्याय का। इसके बाद जो नया अध्याय खुला उसके प्रथम पृष्ठ ने ही तो किशोर को झकझोर कर रख दिया है इतना। 

  परंतु प्रारम्भ में तो किशोर ने भी कहाँ ध्यान दिया था इस ओर प्रत्युत् यही सोचकर चैन की साँस ली कि चलो, आँधी आयी, निकल गयी....मुक्ति मिली। 

  सच ही, आँधी सी ही तो आयी थी वह । एक दिन निशांत के घर ही परिचय हुआ था उन दोनो का । उसी दिन मृण्मयी को किशोर की विलक्षणता का आभास हो गया था । उसके मन ने स्वीकारा था कि इसमें अवश्य ऐसा है कुछ जो अन्य लोगों में नहीं है । वह मंत्र मुग्ध हो खिंचती चली गयी थी किशोर की ओर। किशोर वय किशोर ने भी मन ही मन स्वीकार किया था, मृण्मयी नहीं ....शकुंतला है यह। कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम की अनिन्द्य सुन्दरी। 

  यह सब जैसे एक बारगी अनायास ही  प्रारम्भ हुआ था वैसे ही अनायास इतिश्री भी हो गयी इसकी। परंतु कसक! वह तो शेष है अभी तक ..और कब तक अभी और सालती रहेगी उन्हें , यह भी कौन जानता है? खेत में पड़े हर बीज का अंकुरण आवश्यक तो नहीं ...पर जो अंकुरित नहीं हो पाता सड़ना पड़ता है उसे। प्रकृति का यही नियम है।

                                                                             ॥ दो ॥


  आज सुबह से ही पानी की जो झड़ी लगी तो पूरे दिन लगी ही रही । अपरान्ह, जबकि सूर्य विन्ध्य पर्वत श्रेणियों के पीछे छिपने का उपक्रम कर रहा था तभी आकाश पूरी तरह निर्मल हो गया। सन्ध्या की रक्तिम किरणें विन्ध्य उपत्यका में जंगली लताओं और मखमली घास पर अठखेलियाँ करने लगी थीं । वातावरण एकाएक ही बड़ा मनोरम हो उठा था। निशांत रोक नहीं सका अपने आपको, सम्मोहित हो चल पड़ा नदी की ओर । सावन में इस पहाड़ी नदी का उन्मुक्त हास बड़ा ही प्रिय है उसे। 

  नदी के किनारे पर पहुँचते ही उसकी दृष्टि एक ओर को पड़ी तो तत्क्षण ही निशांत के मानस पटल पर महाकवि जयशंकर प्रसाद की कामायनी की पंक्तियाँ अंकित हो उठीं -"हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह। एक व्यक्ति भीगे नयनों से, देख रहा था प्रबल प्रवाह॥"

  एक ऊँची शिला पर बैठ नदी के जल-प्रवाह को अपलक निहारे जा रही मृण्मयी सम्भवतः किसी गहन चिंतन में लीन थी । गहरी हरी साड़ी, गोया मखमली धरती से होड़ लेने की ठान रखी हो मृण्मयी ने। सिर पर पड़े पल्लू से झाँकता उसका गौर मुखमण्डल ....जैसे कि मक्के के हरे भुट्टे को ऊपर, एक ओर से थोड़ा सा अनावृत्त कर पौधे में ही लगा छोड़ दिया हो किसी ने।

  इधर कई महीनों से उसे घर के बाहर कदम रखते नहीं देखा था किसी ने। यह अप्रत्याशित था, नहीं तो उसका पैर्‍ टिकता ही कब था घर में । सारे दिन निर्भय सिंह शावक की तरह उसे मोहल्ले की गलियों में, खेतों में ..तो कभी ऊँची शिलाओं पर ..तो कभी नदी में अठखेलियाँ करते देखा जा सकता था। वही चंचल मृण्मयी इतनी गम्भीर हो एकाकी ही बैठी थी चुपचाप। ठीक ही तो कहा था किशोर ने, मृण्मयी के जीवन में अनायास हुआ यह अवसादपूर्ण परिवर्तन ही तो व्यथित किये है उसे। किशोर को लगता है कि इस सबके लिये वह स्वयं ही उत्तरदायी है, एक अपराधबोध से ग्रस्त हो गया  है वह।

  आज मृण्मयी को कई माह बाद इस तरह देख आश्चर्यचकित हुये बिना न रह सका निशांत। वह और निकट पहुँच गया उसके पर मृण्मयी की तन्मयता में तो लेश भी व्यवधान नहीं हुआ। तभी ध्यान आया, किसी को इस तरह तन्मय देख न जाने कितनी शैतानियाँ उपज आती थीं मृण्मयी के मन में। उसकी चुहुलों से कौन परिचित नहीं था भला! किसी जंगली लता का फूल फेक कर स्वयं आड़ में छिप जाना या फिर चुल्लू भर पानी ही उलीचकर किसी की भी तन्मयता भंग कर देना बड़ा प्रिय लगता था उसे। कई बार तो स्वयं निशांत भी तंग हुआ था उसकी ऐसी चुहुलों से। कोई और अवसर होता तो सम्भवतः निशांत भी सारे बदले चुक लेता आज। परंतु कभी गम्भीर न रहने वाली मृण्मयी को आज गम्भीर देख ऐसा करने का साहस नहीं हुआ निशांत का। उसने धीर से पुकारा। पर बड़ी रुखाई से एक बार निशांत को देखा भर उसने फिर पुनः ध्यानमग्न हो गयी उसी तरह। बड़ा विचित्र लगा निशांत को, ऐसी तो कभी नहीं थी मृण्मयी। दोनो बालसखा हैं, कदाचित इसी कारण भीतर से करुण हो उठा निशांत । स्नेहासिक्त शब्दों में फिर पुकारा -" बोलोगी नहीं मन्नो?"

  एक बार फिर उसका बचपन झाँकता सा प्रतीत हुआ। इस बार वह अवहेलना न कर सकी, शिला से उतर घायल मृगी सी भाव-भंगिमा लिये मंथर गति से चलती हुयी निकट आकर खड़ी हो गयी। तब बिना किसी भूमिका के ही कहना प्रारम्भ किया निशांत ने, -"यह सब कैसे हो गया मन्नो ? ऐसी तो कभी नहीं थीं तुम !"

  मृण्मयी ने इस बार भी कोई उत्तर नहीं दिया। एक बार आहत करुण दृष्टि से उसकी ओर निहारा भर फिर चल दी घर की ओर...बड़ी ही मंथर गति से। निशांत चुपचाप खड़ा ही रह गया। 

  पर वह गयी नहीं .....तुरंत ही पलटकर उसके समक्ष आ खड़ी हुयी, बोली- "अच्छा निशांत! यह तो बता कि मनुष्य अन्दर से जैसा होता नहीं वैसा बाहर से दिखने का प्रयास क्यों करता है, किस प्रयोजन से भला?"

    निशांत सोच ही रहा था कि उसके इस अप्रत्याशित प्रश्न का क्या उत्तर दिया जाय कि तभी वह पुनः बोल पड़ी, -"यह जो प्रवासी है न ! तुम्हारा मित्र ! मुझे बड़ी दया आती है उस पर, कितना उलझा हुआ है अपने आप में । स्त्री-पुरुष के सामान्य संबन्धों में भी आचरणहीनता की दुर्गन्ध लगती है उसे। स्त्री को मात्र वासना भर ही समझ सका है वह। स्त्री-पुरुष के साहचर्य को घृत और अग्नि के सम्बन्ध की तरह देखता है वह। यह सब इसलिये क्योंकि पुस्तकों में ऐसा ही पढ़ा है उसने, और इसलिये भी कि उसकी बुद्धि का भी यही निर्णय है। परंतु जानते हो निशांत, उसने पुस्तकें तो पढ़ लीं पर वह अपने मन को नहीं पढ़ सका अभी तक, पढ़ पाता तो समझ भी लेता। मन उसका सहज आत्मनियंत्रित नहीं है, बल्कि उसे बलात् अंकुश में रखने का प्रयास कर रहा है वह। भय लगता है उसे , पुस्तकीय शिक्षा से...पाप से...समाज से......और इन सबके ही भय से वह सहज सत्य को अस्वीकार कर सांसारिक संबन्धों से वंचित रखना चाह्ता है स्वयं को ।  

   निशांत ने अनुभव किया, मृण्मयी का अंतर्मन बहुत ही आहत था। सम्भवतः वह अभी कुछ और कहती पर बीच में ही प्रतिवाद कर दिया निशांत ने, -"तुमने कैसे जाना कि मन उसका आत्मनियंत्रित नहीं है, किसी के मन की बात को भला कैसे जान सकता है कोई?"

  वह उपेक्षा से किंचित मुस्कुरा दी, "यह भी कोई इतना दुरूह विषय है जो जाना न जा सके? समाज के भय से ही तो उसने मुझे अपने घर आने से रोक दिया । परंतु क्या सचमुच  समाज के भय से ही? उसे अपने आप से लेश भी भय न था क्या? समाज की मिथ्या धारणाओं का प्रतिवाद कर सकने का साहस था उसमें ? और यदि नहीं, तब क्या यह उसके अंतर्मन के दौर्बल्य का परिचायक नहीं?"

  फिर कुछ क्षण चुप रहकर पुनः कहना प्रारम्भ किया, -"यह मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि किशोर के मन में ही कहीं दबी-ढकी अप्रकट कोई लालसा उत्पन्न हो गयी थी, जिसे अप्रकट ही बने रहने देने के लिये उसने ऐसा निर्णय लिया था। उसे भय हो गया था कि कहीं हम दोनो के सान्निद्य से वही सब न हो जाय जिसकी कल्पना को कारण बनाकर समाज ने उसका विरोध करना चाहा था । दुनिया में स्त्री-पुरुष का एक ही सम्बन्ध तो नहीं ....?"

   मृण्मयी का मुखमण्डल दीप्त हो उठा था। तर्क अकाट्य थे उसके, निशांत कुछ भी उत्तर न दे सका।

फिर चलते-चलते  लक्ष्य किया उसने, मृण्मयी के नेत्रों से अनवरत अश्रु प्रवाह चल रहा था। जैसे उसके भीतर का सारा समुद्र विद्रोह कर उठा हो बाहर उमड़ पड़ने के लिये। उसके दुःख से निशांत भी कातर हो उठा, पर उसकी सहायता किस प्रकार से कर सके या किस उपाय से उसकी प्रसन्नता लौटाई जा सकती है, यही उसकी समझ में नहीं आ रहा था। 


                                                                  ॥ तीन ॥


   निशांत के प्रवासी मित्र का अपने गाँव जाने का समय हो आया, उसकी पढ़ायी पूरी हो चुकी थी। विदायी की बेला में उसने कागजों का एक बड़ा सा पुलिन्दा थमा दिया निशांत के हाथों में, यह कहते हुये कि "जो बात मृण्मयी से प्रत्यक्ष में न कह सका कभी उसे ही विभिन्न रूपों में कहने का प्रयास किया है मैने। यदि किसी तरह ये कवितायें पहुँचा सको मृण्मयी के पास तक तो इतना उपकार कर देना मित्र।" 

  फिर किंचित रूखी हंसी हंसकर बोला,- "कल स्वप्न में देखा था, मैं एक पहाड़ी की चोटी पर हूँ और समीप ही समुद्र में एक जहाज दूर जा रहा है मुझसे। जहाज की डॆक पर खड़ी मृण्मयी अश्रुपूर्ण नेत्रों से हाथ हिला-हिलाकर विदा दे रही है मुझे। "

  किशोर चला गया। निशांत के हाथों में था कागजों का एक पुलिन्दा और मन में थे मृण्मयी के शब्द-"मन उसका आत्मनियंत्रित नहीं है ...उसे बलात नियंत्रण में करने का असफल प्रयास भर कर रहा है वह .....समाज की मिथ्या धारणाओं का प्रतिवाद करने का साहस था उसमें? "

  थोड़ी देर में जब निशांत सामान्य हुआ तो उसके सामने एक प्रश्न आ खड़ा हुआ, यह पुलिंदा मृण्मयी को समर्पित कर दूँ या फिर इसे विन्ध्य की गोद में बहती नदी की धारा में विसर्जित कर दूँ ?

   वह विचार कर ही रहा था कि तभी उधर से मृण्मयी आती दिखी उसे । निशांत के हाथ से कागज का पुलिन्दा छीनकर फेकती हुयी बोली, "उठो न! कितने दिन हो गये हमें शैतानियाँ किये, चलो आज फिर कोई शैतानी करते हैं । 

  और फिर हाथ खीचकर उठा ही लिया उसने निशांत को । वह उठकर खड़ा हुआ ही था अभी कि मृण्मयी ने अपना सिर टिका दिया उसके वक्ष पर और स्फ़ुट स्वर में बोली,- "मैं तुम्हें सदा से बुद्धू ही समझती रही मेरे बाल सखा!" 

           

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बेहतरीन सुंदर प्रस्तुति,,,,,,,

    RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

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  2. मृण्मयी का चरित्र बहुत प्रेरक है. समाज के डर से कोई जीवन जीना छोड़ दे? किशोर तो कमजोर ठहरा, खुद न कह सका तो कागज़ का पुलिंदा क्या कहता. अच्छा हुआ मृण्मयी ने उसे फेंक दिया. बहुत अद्भुत कहानी लगी. बधाई कौशलेन्द्र जी.

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.