रविवार, 5 अगस्त 2012

बादलों को कभी तो छटना ही था न !

 
ज सुबह से ही उदासी मेरे साथ थी। मैं जहाँ भी जाता वह भी साथ ही जाती, जहाँ ठहरता वह भी साथ ही ठहर जाती। जब चलता वह भी साथ ही चल देती। मैं नहीं चाहता था कि वह मेरे साथ रहे पर उदासी थी कि मुझे छोड़ने को तैयार ही नहीं हो रही थी।
 
बेचैन मन इधर-उधर कुछ खोजने में व्यस्त हो गया। खोज चलती रही ...पर कहीं कुछ मिल ही नहीं रहा था। क्या था जिसको खोज रहा था मन ? ......मुझे तो यह भी नहीं पता। थक हार कर चाय बनायी .... चाय पीकर कदाचित कुछ अच्छा लगे पर बात बनी नहीं। पलंग पर लेटकर सोने का प्रयास किया पर नींद को नहीं आना था सो वह नहीं आई। इस बार उसने अपनी छोटी बहन तन्द्रा को भेज दिया था।
  
तन्द्रा भी अनमने मन से आयी थी सो कुछ ही देर रुककर चली गयी। मुझे उठना ही पड़ा, उदासी भी साथ ही उठ बैठी। इस बार मन के आवारेपन ने भी अपनी आँखें मलीं...जैसे नींद से जागा हो अभी-अभी। मैंने कहा, तुझे भी अभी ही जागना था रे!

वह बोला, चलो कहीं चलते हैं।

मैंने पूछा, कहाँ?

वह बोला, कहीं भी ......जहाँ भी कहीं कुछ मिल जाय।

मैं, मेरा आवारा मन और मेरी उदासी तीनो घर से निकल कर सड़क पर आ गये। उदासी मुझसे बुरी तरह चिपकी हुयी थी.... और सिर्फ़ चिपकी हुयी ही। उसे मुझसे कोई मतलब नहीं था। आवारा मन अपनी आदत के वशीभूत हो भटकने लगा ...और मैं फिर कुछ खोजने में लग गया।

सड़क के किनारे-किनारे सुन्दर सप्तपर्णी की पंक्ति को निहारा, उसके सात-सात पत्तों वाले मुकुट भी आज सुन्दर नहीं लग रहे थे। मेरे पैर मुझे खेतों की ओर ले गये। मैंने देखा, हरा कम्बल सिर से ओढ़कर खेतों में जहाँ-तहाँ बैठे काजू के पेड़ तो ऐसे लग रहे थे जैसे किसी छापामार युद्ध की तैयारी में बैठे नक्सली हों। नक्सलियों का विचार आते ही मन के चित्रपटल पर सिर कटी लाशें और खून के छोटे-छोटे पोखरों पर बैठी मक्खियों के झुण्ड के झुण्ड दिखाई देने लगे। तब मैं तालाब की ओर गया, वहाँ कुमुदिनी तो खिली थी पर लग रही थी श्रीहीन। पार्क गया, झूला झूलते नन्हें-मुन्ने बच्चों की ओर देखा, पर वे भी आकर्षित नहीं कर सके आज। तरुणी के पुष्प देखे, पर मुझे पुष्प कम और उनके काँटे अधिक दिखायी दिये। मैं फिर सड़क पर आ गया।

हम तीनो सड़क पर चलते रहे, अपनी-अपनी दुनिया में खोये हुये। खोये-खोये ही मेरी खोज चलती रही...और मैं निराश होता रहा। तब मैंने अपने आप से पूछा, क्या खोज रहा हूँ मैं ? कहाँ मिलेगा वह जिसकी तलाश में हूँ मैं ?

मैं स्वयं से पूछे जा रहा था....उस ‘स्वयं’ से जो उत्तर न देने की कसम खाये बैठा था। इस ‘स्वयं’ को आख़िर हो क्या गया है, यह कुछ बोलता क्यों नहीं?

ओह, अब समझा, उसके पास उत्तर ही नहीं होगा तो बतायेगा कहाँ से ! पर उसके पास उत्तर क्यों नहीं है? यदि उसके पास उत्तर नहीं है तो क्या रिक्तता है वहाँ ?

रिक्तता....

रिक्तता .....

रिक्तता .........

अचानक एक प्रकाश सा कौंधा.... यही तो उत्तर है - ”रिक्तता”।

‘स्वयं’ ने उत्तर दे दिया, व्यर्थ है यह भटकाव! अन्दर की रिक्तता बाहर की पूर्णता को देख पाने में सक्षम नहीं है। अन्दर का सौन्दर्य ही बाहर के सौन्दर्य को पहचान पाता है। अन्दर यदि रिक्तता है तो वह बाहर भी रिक्तता को ही पहचान सकेगी। अन्दर यदि पूर्णता है तो बाहर की पूर्णता व्यापक हो जाती है। अन्दर यदि कटुता है तो वह बाहर भी कटुता को ही देखेगी सर्वत्र। अन्दर यदि निर्मलता है तो वह बाहर भी निर्मलता के अतिरिक्त और कुछ देख ही नहीं सकेगी। जो बाहर है ...आवश्यक नहीं कि वह अन्दर भी हो, किंतु जो भी अन्दर है वह बाहर अवश्य है।

तो यह तलाश बाहर नहीं अन्दर करनी होगी, खोज की दिशा बाहर नहीं अन्दर की ओर है। खोज की इस यात्रा में कोई साथ नहीं रह पाता.... अकेले ही करनी पड़ती है यह यात्रा।

अब तक “मैं” कहीं दुबक गया था, “उदासी” पलायन कर चुकी थी..... और“स्वयं” अकेला रह गया था।

बादलों को कभी तो छटना ही था न !

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णाद् पूर्णमुदच्यते ...... का अर्थ अब स्पष्ट होने लगा था।

8 टिप्‍पणियां:

  1. @ अन्दर यदि रिक्तता है तो वह बाहर भी रिक्तता को ही पहचान सकेगी। अन्दर यदि पूर्णता है तो बाहर की पूर्णता व्यापक हो जाती है। अन्दर यदि कटुता है तो वह बाहर भी कटुता को ही देखेगी सर्वत्र। अन्दर यदि निर्मलता है तो वह बाहर भी निर्मलता के अतिरिक्त और कुछ देख ही नहीं सकेगी। जो बाहर है ...आवश्यक नहीं कि वह अन्दर भी हो, किंतु जो भी अन्दर है वह बाहर अवश्य है।

    - बहुत सुन्दर! सहमत हूँ!

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  2. शायद आपकी किसी पुरानी पोस्ट पर ही मैंने कभी कहा था कि बस अंतर्मन की यात्रा ही वास्तविक यात्रा है.. मगर आपने इस खोज की यात्रा का जो वर्णन किया वह कम सतरंगी नहीं है!! डॉक्टर साहब, कमाल है!!

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  3. @ अन्दर यदि कटुता है तो वह बाहर भी कटुता को ही देखेगी सर्वत्र। अन्दर यदि निर्मलता है तो वह बाहर भी निर्मलता के अतिरिक्त और कुछ देख ही नहीं सकेगी....

    यह भी एक विचारधारा है, किन्तु मैं इससे सहमत नहीं हो पाई कभी | इस पहले आधे भाग से सहमत हूँ कि, भीतर की कटुता तो हमेशा बाहर कटुता ही दिखाती है | कहते हैं न की सावन के अंधे को सब हरा ही दीखता है |

    किन्तु, दुसरे भाग से असहमत हूँ |

    भीतर मिठास हो तो आवश्यक नहीं की बाहर भी मिठास ही दिखे | भीतर से बहुत भले लोग यदि बाहर की बुराइयों को अच्छी कहने / समझने / मानने लगें, तो वे बुराइयां अच्छी नहीं बन जातीं, बल्कि वे बुराइयां और अधिक शक्तिशाली, और अधिक उग्र, और अधिक सघन हो जाती हैं | और उनसे लड़ना उन लोगों के लिए और भी मुश्किल हो जाता है जो उनका विरोध करना चाहते हैं, क्योंकि बहुत से मीठे मन वाले व्यक्ति उस बुराई को अच्छी कहते हुए अनजाने ही उससे लड़ने वाले अच्छे व्यक्ति को चोट पहुंचाते हैं, उसे कमज़ोर बनाने में बुराई के साथ होते हैं |

    महाभारत युद्ध में बलराम जी तठस्थ रहे, किन्तु अंत में दुर्योधन की जंघा पर वार करने के लिए भीम को सजा देने को उद्ध्यत हुए | तब कृष्ण ने कहा, की यदि आप धर्मयुद्ध के समय निष्पक्ष रहना चुनते हैं, तब युद्ध की समाप्ति के बाद आपको उसके परिणाम में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है |

    यदि गलत होते हुए देख कर भी आँखों पर मिठास का चश्मा लगा रहे, तो यह उचित नहीं | कटुता को कम रखना / करना / हराना है, तो सर्वप्रथम यह स्वीकारना आवश्यक है कि, हाँ, कटुता है | उसे "नहीं है" कह देने से वह मिठास नहीं बन जाती |

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  4. दार्शनिकता जीवन में यूँ ही प्रवेश पाती है. जब उत्तर की प्रतीक्षा में प्रश्न और भी बड़ा होता जाता है कि हठात स्वयं के भीतर से उत्तर सामने आ जाता है. सच है कि जैसा मन होता है सब कुछ उसी के अनुरूप लगता है. हमारे भी प्रश्नों के उत्तर मिल गए. संदेशप्रद भावार्थ. धन्यवाद.

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    1. जेन्नी जी! सादर नमस्कार!
      @ स्वयं के भीतर से उत्तर सामने आ जाता है. सच है कि जैसा मन होता है सब कुछ उसी के अनुरूप लगता है।
      हमारे मनीषियों का कथन हैकि हमारी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में तब तक संलग्न नहीं हो पातीं जब तक कि उन्हें मन का सुयोग प्राप्त न हो जाय। अर्थात् हम आँखों से नहीं मन से देखते हैं, कानों से नहीं मन से सुनते हैं, नासिका से नहीं मन से सूंघते हैं, जिव्हा से नहीं मन से रसास्वादन करते हैं और त्वचा से नहीं मन से स्पर्श करते हैं। मन का योग आवश्यक है, वह भी मात्र सुयोग ही, अतियोग-हीनयोग या कुयोग नहीं अन्यथा ग्रहण किया गया परसेप्शन सत्य से परे होगा।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.