मंगलवार, 25 सितंबर 2012

मौत अब आधुनिक हो चुकी है


मुझे
मौत से
डर नहीं लगता अब
क्योंकि मौत
अब परेशान नहीं करती,
पहले से भयभीत नहीं करती,
सौम्य इतनी
कि पीड़ा अनुभव करने तक का
समय नहीं देती,
वह तो आती है...
मुस्कुराती हुयी सुन्दरी के वेश में 
या...
कभी छिपकर
फूलों के गुलदस्तों में
या ...
कभी बन्द होकर
टिफ़िन में
रहस्यमय भोजन की तरह
और...
पलक झपकते ही
पूरा करती है अपना धर्म।
लोग कहते हैं...
कि ज़माना फ़ैशन का है,
मौत
अब आधुनिक हो चुकी है।
मैंने
तैयार कर लिया है अपने आप को
नये फ़ैशन के लिये।

8 टिप्‍पणियां:

  1. फैशन संक्रामक होता है। फैशन की लोग नकल करते हैं। यह संक्रमण मुझे भी हो चला है। मैंने भी अधुनिक फैशन करना शुरू कर दिया है।

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  2. परनाम करतानी मनोज भइया जी!
    भारत के नक्सलियों और दुनिया भर में फैले फ़िदायीनों ने मौत के प्रति आम आदमी का नज़रिया बदल दिया है। मौत को नये कोण से देखा जाने लगा है, इस नये दृष्टिकोण के लिये हम नक्सलियों और फ़िदायीनों के ऋणी हैं।

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  3. इस फैशनपरस्त मौत का क्या कहिये.
    जब आती है नए लिबास में आती है.

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    1. क्या सूफ़ियाना टिप्पणी है शिखा जी आपकी! :)

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  4. ई मौत त बहुते बढ़िया हौ। जमराज के तीन दाईं लौटा चुकलीं। हर दाईं कुछ न कुछ ले गइल पापी। कब्बो आँखी कs अजोर ले गइल, कब्बो दुई गो दंतिये उखाड़ ले गइल तs कब्बो बालि कs करियाई ले गइल। अब जौन मौत आप कहतानी ऊ मौत तs बहुते बढ़िया हौ। न हमका रिरियाये के पड़े न जमराज के मायूसी हो।

    जय हो।

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    1. सच्ची मं अइसन मौत तs मौत के बहुतये नीमन रूपांतरण हौ। चट्ट आगमन पट्ट गमन...

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  5. यह आधुनिक फैशन भी अपना लेंगे कहते हैं न की समय के साथ जो चले वाही सुखी ,तो ये भी सही है बहुत बढ़िया रचना है आपकी |

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    1. अदिति जी ! नमस्कार! बस्तर के नक्सलपूरित जंगल में आपके साहसपूर्ण प्रथम आगमन पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.