शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

मेरे ही सुर होंगे


अब न चुराऊँगी मैं, प्रियतम !

यह लो अपनी मुरली, प्रियतम !

रोज-रोज ना मिल पाऊँगी

जमुना तट ना आ पाऊँगी।

 

काम बहुत हैं और भी मुझको

रास रचाना केवल तुमको।

मैंने अपने अधरों से छू

वंशी में प्राण हैं डाले, प्रियतम !

मान यही लेना अब से तुम  

मुरली ही है राधा, प्रियतम !

बातें कर लेना जब जी हो

अपनी प्यारी मुरली से तुम।

मुरली से निकले सारे सुर

मेरे ही सुर होंगे, प्रियतम।  

अब न चुराऊँगी मैं, प्रियतम !

यह लो अपनी मुरली, प्रियतम !

6 टिप्‍पणियां:

  1. राधिका कभी खुद को मुरली कहती..कभी मुरली से जलती....
    प्रेम बावला कर देता है...

    अनु

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  2. सुन्दर प्रवाह | गहरे भाव ||
    शुभकामनायें ||

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  3. बहुत सुंदर भाव ,बहुत ही सुंदर रचना

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  4. मै ही हूं ये मुरली प्रियतम । वाह बहुत कोमल और सुंदर भी ।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.