शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

राज्योत्सव

स्थापना दिवस ....यानी स्वतंत्र भारत के एक राज्य का जन्म दिन । जन्म दिन है तो उत्सव का स्वस्फूर्त कारण तो है ही।

  

हुक़्म हुआ है कि उत्सव को हर्षोत्साह के साथ मनाया जाय।

सभी सरकारी विभागों के अधिकारी सारे विभागीय नित्य कर्म त्याग कर योजना बनाने और जन्म दिन मनाने की तैयारियों में जुट गये हैं। कुछ विभाग बेहद गरीब हैं तो कुछ बहुत ही सम्पन्न। ज़ाहिर है, जन्म दिन मनाने में धन का अपव्यय तो होना ही चाहिये। उत्तर प्रदेश की याद आती है जहाँ की एक महिला का जन्म दिन उतर प्रदेश के लोग बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं। हीरे और स्वर्णाभूषणों के अम्बार लग जाते हैं। एक गरीब महिला केवल अपने प्रतिवर्ष मनाये जाने वाले जन्म दिनों से ही अरबपति बन गयी है।

यह छत्तीसगढ़ है ...प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर एक गरीब प्रांत जहाँ के लोग बड़े गर्व से गीत गाते हैं -"मैं छत्तिसगढ़िया हौं .....मैं चटनी-बासी खात हौं। नदी किनारे मोर झोपड़ी ....जंगल-जंगल जात हौं॥"

 

तो इसी गरीब प्रांत के जन्म दिन पर करोडों की धनराशि उत्सव पर खर्च की जा रही है। जनता और राष्ट्र की सेवा में लगे सभी विभागों के अधिकारी और कर्मचारी व्यस्त हैं ...जन्मदिन की तैयारियों में। भव्य पण्डाल लगाये गये हैं। प्रशासनिक अधिकारी घूम-घूम कर निरीक्षण कर रहे हैं। भव्यता और उपलब्धियों के प्रदर्शन में कोई कमी नहीं रहनी चाहिये। आवश्यकता न होने पर भी वे विभागीय अधिकारियों को कुत्ते की तरह डाँट भी रहे हैं। अधिकारीगण एक प्रशिक्षित दासानुदासानुदास की तरह बड़े ही विनयपूर्वक उनकी उद्दण्डता को आत्मसात कर रहे हैं। अत्यंत हर्षमय वातावरण निर्मित हो गया है जिसमें प्रशासनिक अधिकारियों के सहज आतंक ने उसे कोटि गुणित  कर दिया है। दासानुदासानुदास धन्य हो रहे हैं।  

 

कुछ दरिद्र विभागों के दीन-हीन अधिकारियों ने भयभीत हो कर अपनी आर्थिक हैसियत से कहीं ज़्यादा खर्च करके प्रदर्शनी की भव्यता निर्मित करने का प्रयास किया।

 

आयुष विभाग के पण्डाल में चिकित्सा अधिकारियों की पूरी एक फ़ौज़ थी। वे  स्थानीय विधायक और सांसद को चिकित्सा विज्ञान की भारतीय परम्परा की विशेषतायें बताने में व्यस्त रहे, व्यस्त कैसे न होते, दो दिन में उनके पण्डाल में प्रवेश करने वाले एलिट लोगों में वे पहले प्राणी थे। प्रशासनिक अधिकारियों ने तो फूटी आँख उठाकर देखना तक मंज़ूर नहीं किया।  उनका ध्यान गुण से अधिक संख्या पर है। वे चाहते हैं कि स्वास्थ्य विभाग के लोग जहाँ कहीं सशरीर उपस्थित हों तुरंत उपस्थित लोगों की चिकित्सा में लग जायें। गोया पूरा देश रुग्ण है। जन समस्या निवारण शिविर हो या राज्योत्सव या अन्य कोई कार्यक्रम .....डॉक्टर्स को चलते-फिरते हर समय केवल और केवल रोगियों को दवाइयाँ बांटते रहना चाहिये। डॉक्टर यानी एक ऐसा मज़दूर जो हर समय ...हर स्थिति में फावड़ा चलाने के लिये तत्पर रहे। प्रशासनिक अधिकारियों की यह मानसिकता अनुकरणीय है ...अद्भुत् है ....स्तुत्य है। वारे जाऊँ इस मानसिकता पर। स्वास्थ्य विभाग चाहता है कि लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाय जिससे वे कम से कम रुग्ण हों। प्रशासकीय अधिकारी चाहते हैं कि लोग अधिक से अधिक रुग्ण हों जिससे कि उनकी चिकित्सा की जा सके और फलित आँकड़े दर्शनीय हो सकें। यूँ भी डॉक्टर्स लोग काम ही क्या करते हैं ....बस जरा सी कलम हिलायी और प्रिस्क्रिप्शन पूरा। यह भी कोई काम हुआ?

एक साहब बड़े गुस्से में आये, आते ही कच्ची ककड़ी की तरह भक्षण करने की मुद्रा में डॉक्टर्स को घूरते हुये हुक़्म दिया "बस चाय ही पीते रहोगे या मरीजों को कुछ दवा भी बांटोगे? चलो, टॆबल लगा कर दवा बांटो।"

बैंक के लोग किसानों को ऋण बांटते हैं, वन विभाग के लोग पौधे बांटते हैं, पशु विभाग के लोग सुअर बांटते हैं, महिला एवं बाल विकास विभाग के लोग रेडी टु ईट मील बांटते हैं, मन्दिर में पुजारी जी पंजीरी बांटते हैं .....ऐसा उत्तम विचार मन में लाते हुये भय को प्राप्त हुये डॉक्टर्स ने आनन-फानन में टेबल मंगाई कुछ दवाइयाँ मंगाईं और धूप से भरे-पूरे पंडाल में चुचुआते पसीने से युक्त होकर बैठकर रोगियों के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

आह! बहुत देर हो गयी, एक भी रोगी नहीं .....इतिहास का रट्टा लगाकर बड़ा साहब बना कोई प्राणी फिर आयेगा और न जाने कितने विषवाण छोड़ेगा .....इस चिंता से ग्रस्त हुये डॉक्टर्स राज्योत्सव के विशाल प्रांगण में एक अदद रोगी खोजने की लालसा से यत्र-तत्र विचरण करने लगे। गरीब की आशा बड़ी दुखदायी होती है, बड़े यत्न के बाद भी कोई रोगी नहीं मिला। तब एक भयभीत डॉक्टर ने पड़ोस के पण्डाल में बैठे एक कर्मचारी से अनुनय विनय करते हुये कहा- "हे स्वतंत्र भारत के परतंत्र शासकीय कर्मचारी जी! आपके मुख पर छाये विषाद से प्रतीत होता है कि आप के मन में कोई शल्य है जो आपको पीड़ित कर रहा है। आप कृपा करके हमारे पण्डाल तक चलिये जिससे आपके मनोशल्य को दूर किया जा सके।" 

एक दुःखी प्राणी ने दूसरे दुःखी प्राणी के दुःख को समझा और चुपचाप उपकार भाव से दवा ले कर चला गया। रोगी पंजी में एक रोगी दर्ज़ हुआ। तभी एक बुज़ुर्ग सज्जन आये ...बिना किसी के प्रयास किये आ गये।  बोले, दूसरा विवाह किया है, कुछ कृपा हो जाय। उन्हें बड़ी विनम्रता से  कहा गया-"हे कामी पुरुष! शासन की ओर से ऐसी औषधियों का प्रदाय वर्ज्य है। आप किसी ख़ानदानी शफ़ाख़ाने वाले से संपर्क स्थापित करें।"

दुःखी डॉक्टर्स उन्हें दवा बांटने से वंचित रह गये ...किंतु रोगी पंजी में उनका शुभ नाम दर्ज़ कर उन्हें किसी उपयुक्त स्थान के लिये रेफ़र कर दिया गया।    

 

अहिंसा के गीत गाने वाले देश में मांसाहार को बढ़ावा देने के लिये पशुधन विकास विभाग की ओर से दो टर्की लाकर रखे गये हैं। विदेशों में भारतीय गाय(बॉस इण्डियाना) को पसन्द करने वालों की विदेशी गाय (बॉस टौरस) को प्रचारित करने के लिये एक बड़ा सा कट आउट लगाया गया है। भारतीय गाय का एक छोटा सा चित्र भी कहीं खोजे नहीं मिला। पूछने पर बताया गया कि सब कुछ हुक़्म के अनुसार हो रहा है। यह हुक़्म कौन देता है?

विदेशों में भारतीय गाय को सर्वोत्तम माना गया और भारत में भारतीय गाय को विदेशी साँड़ से संकर बनाया जा रहा है! अहो दुर्दैव! क्या उत्तम योजना है! भारत से भारतीय श्रेष्ठ गाय को सदा के लिये समाप्त कर देने की अद्भुत् योजना स्तुत्य है ...अनुकरणीय है।  

 

किराये पर लाये गये गरीब आदिवासियों से नृत्य कराया गया। भव्यता में वृद्धि हुयी, अधिकारीगण हर्षित हुये। आतंक किंचित कम हुआ।

 

एक प्रथम श्रेणी अधिकारी अपने पण्डाल की तैयारी में स्वयं ही जुट गयीं। ऐसे लोगों की सरलता के प्रति सहज श्रद्धा उत्पन्न हुयी।

 

रेडी टु ईट मील से संवरता भोला बचपन


 

मनुष्य तो नहीं ...हाँ! कीचड़ में खिले कमल अवश्य ही हमारी आशा के स्रोत हैं।  

3 टिप्‍पणियां:

  1. पूरा आलेख अपने पीछे एक हाहाकार करता हुआ सन्नाटा सा छोड़ जाता है.

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  2. सब मोह माया है रामधुनी लागेये और तीन बार अन्ना अन्ना जपिए रहत मिलेगी

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    1. जप लिया
      नहीं मिली राहत।
      बस्तर के जंगल में आपके प्रथम आगमन पर स्वागत है रजत जी!

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.