गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

मैं आम नहीं कुछ ख़ास नहीं, रुक कर पल भर फिर चल दूँगा

 
 

मैं आम नहीं

जो ओढ़ लूँ

नयी चादर

हर पतझड़ के बाद

और हो जाऊँ ख़ास

कुछ ख़ास लोगों के लिये।

मैं तो पौधा हूँ

नन्हा सा धान का

जो नहीं ओढ़ता

नई-नई चादरें

बस

सौंप कर

  सुनहरी बालियाँ

   हर आम के लिये

   हो जाता हूँ विदा

         सदा के लिये।     

 

 
 

5 टिप्‍पणियां:

  1. छोटी सी जिंदगी मगर मुकम्मल ज़िन्दगी...

    अनु

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  2. कुछ आम अपने आप में ही खास होते हैं.

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  3. अपना अपना चरित्र, अपनी अपनी प्रकृति!

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  4. मैं तो पौधा हूँ
    नन्हा सा धान का

    जो नहीं ओढ़ता
    नई-नई चादरें

    बस
    सौंप कर
    सुनहरी बालियाँ
    हर आम के लिये

    हो जाता हूँ विदा
    सदा के लिये।

    आहाऽऽहा… … …
    बहुत सुंदर कविता है
    आदरणीय कौशलेन्द्र जी !

    आपकी लेखनी वाकई लाजवाब है ! क्या बात है !
    बहुत खूबसूरत !
    शुभकामनाओं सहित…

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.