मंगलवार, 22 जनवरी 2013

आस्था


यह आज से लगभग पच्चीस वर्ष पहले की बात है, तब वह बहुत छोटी थी, फ़्रॉक पहनकर स्कूल जाने वाली छोटी बच्ची की तरह। दूसरी बार जब मैंने उसे देखा तब तक वह बड़ी हो चुकी थी। उसका विवाह होने वाला था। उसकी बड़ी बहन ने मुझे बताया कि छोटी प्रेम-विवाह करने जा रही है। मैंने कहा, किंतु यह तो अभी उसकी पढ़ने-लिखने की उम्र है अभी से यह निर्णय कैसे कर लिया। बड़ी ने बताया कि छोटी को घर बसाने की जल्दी है, कोई क्या कर सकता है। तभी मैंने देखा कि सामने पूजा वाले कमरे में एक स्त्री हाथ जोड़कर सिर झुकाये, आँखें बन्द किये अभिवादन की मुद्रा में बड़ी तन्मयता के साथ ध्यानमग्न खड़ी है। उसके बाल पीठपर बिखरे थे जिनसे पानी टपक रहा था। आज इतने वर्षों बाद भी वह दृष्य मुझे अभी तक बिल्कुल वैसा ही याद है ...जैसे कि अभी कल की ही बात हो। बड़ी ने संकेत किया .....छोटी।
मैं चौंका, इत्ती लम्बी हो गयी! कित्ते साल बाद देख पा रहा हूँ .....।
बड़ी ने व्यंग्य किया, अपने होने वाले दूल्हे के लिये भगवान जी की शरण में है बेचारी।
मुझे स्मरण हो आया, परीक्षा के दिनों में गुप्ता भी तो अनायास ही आस्तिक हो जाया करता था। तो क्या हम उपलब्धियों के लिये भिखारी की तरह जब-तब हाथ फैलाते रहते हैं ईश्वर के सामने? मेरे मन में एक प्रश्न उठा।
मन्दिरों में तन्मयता के साथ, बड़े विनम्रभाव से मूर्तियों के आगे सिर झुकाये खड़े लोग आस्थावान और धार्मिक से लगते प्रतीत होते हैं। सिर नवाये ये लोग कुछ माँग रहे होते हैं, बन्द नेत्रों से कुछ देख रहे होते हैं, बिना एक भी शब्द उच्चारित किये कुछ चढ़ावा चढ़ाने की मनौती मान रहे होते हैं, आराधनास्थल में भी आस्था के साथ दुनिया के सारे व्यापार चला रहे होते हैं और इस सबके बीच ऊपर से बड़ा शांत सा लगने वाला मन्दिर का वातावरण भीतर से दुनियादारी के अस्तित्व का प्रमाण दे रहा होता है। कोई परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहता है, कोई लड़की के विवाह के लिये चिंतित है, कोई अपने गिरते हुये व्यापार को उठाना चाहता है, कोई अदालती फ़ैसला अपने पक्ष में चाहता है ....हर किसी को विश्वास है कि अनादि, अनंत और निराकार ईश्वर उनकी समस्यायों का समाधान कर देगा। इस विश्वास ने मन्दिरों की उपयोगिता को बनाये रखा है।
एक बार एक मन्दिर के सामने से होकर निकल रहा था। मंदिर की सीढ़ियाँ उतरती हुयी एक परिचित की लड़की दिखायी दे गयी। उसने पुकारा, मैं रुका। उसने प्रसाद दिया, मैंने चुहुल करते हुये प्रश्न पूछा, अपने लिये क्या माँगा भगवान जी से? उसने कहा, ऐसी शक्ति जो मुझे सही मार्ग से विचलित न होने दे।
लड़की का उत्तर मेरे लिये अप्रत्याशित था। स्कूल-कॉलेज की लड़कियों से ऐसे उत्तर की आशा प्रायः नहीं होती। मेरी इच्छा हुयी कि मैं झुककर लड़की के पाँव छू लूँ। देवी स्वयं मन्दिर से बाहर आकर मुझे दर्शन दे रही थी। मैं धन्य हुआ, अभिभूत हुआ। आज सोचता हूँ, उस लड़की से भी बड़ा और सच्चा आस्थावान और धार्मिक कोई होगा?  

1 टिप्पणी:

  1. @ मन्दिरों में तन्मयता के साथ, बड़े विनम्रभाव से मूर्तियों के आगे सिर झुकाये खड़े लोग आस्थावान और धार्मिक से लगते प्रतीत होते हैं। सिर नवाये ये लोग कुछ माँग रहे होते हैं, बन्द नेत्रों से कुछ देख रहे होते हैं, बिना एक भी शब्द उच्चारित किये कुछ चढ़ावा चढ़ाने की मनौती मान रहे होते हैं, आराधनास्थल में भी आस्था के साथ दुनिया के सारे व्यापार चला रहे होते हैं ...

    may be ALL are not doing that sir ? may be ALL do not go to temples to ASK ? may be some go there because they love to go and meet him ? to thanks im for being, to just be with him ?

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.