मंगलवार, 29 जनवरी 2013

विधान ये सड़ा-गला।



धूप के गाँव से 

छाँव माँगने चला 

नर पिशाच हैं खड़े

मैं वेद बांचने चला|

चून के ढेर से 

रेत बीनने चला

सिंह की माद से 

शिकार छीनने चला| 

पाखण्ड है प्रचण्ड 

खण्ड-खण्ड है मनुष्यता 

उठी हुयी खड्ग से 

प्राण माँगने चला| 

"असतो मा सद्गमय"

पोथियों में था पढ़ा 

पापियों से न्याय 

का पहाड़ माँगने चला| 

ज़ख्म कौन दे रहा 

इससे दर्द को है क्या 

क्रूरता से उम्र का 

नाता है क्या भला! 

मर रही है दामिनी 

रोज ही ज़रा-ज़रा 

कैसा है विधान 

दुष्ट भी सुधारगृह चला| 

ज़ख्म रोज़ दे रहा 

न्याय-न्याय रट रहा 

लो, सुधर के फिर नया 

शिकार ढूँढने चला| 

कब नकारती हैं दर्द

उम्र की ये बेड़ियाँ 

क्या जाने दर्द 'दर्द' का 

विधान ये सड़ा-गला|  


3 टिप्‍पणियां:

  1. प्रवाहमयी-

    चलते चलते काटती हुई-

    फटकारती हुई-

    बधाइयां

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  2. बात है बहुत ही सशक्त कविता ....!!

    इसे कहीं भेजिए प्रकाशन के लिए ....!!

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.