बुधवार, 30 जनवरी 2013

“भारत में बलात्कार की जाति भी है और धर्म भी” –के.आर.शाह।


यौनदुष्कर्म की निरंतर हो रही घटनाओं से पूरा देश आन्दोलित है। विचारक और चिंतक समस्या और समाधान की दिशा में अपने-अपने दृष्टिकोण से मंथन कर रहे हैं।
रायपुर से प्रकाशित होने वाली भारत की नम्बर -1 सामाजिक समाचार पत्रिका आदिवासी सत्ताके जनवरी 2013 के सम्पादकीय में विद्वान सम्पादक ने भारत में बलात्कार की जाति और धर्म के बारे में लिखते हुये बताया है कि
“ ...धर्म मानव समाज के आचरण में निहित है। जैसा धर्म वैसा आचरण। ...भारतीय जनजातीय समाज में स्त्री, कल भी पुरुष की सम्पत्ति नहीं थी और आज भी नहीं है। अनार्य भारत से आर्य भारत होने के बाद हमारे देश की स्त्रियाँ सदा-सदा के लिये मर्दों की सम्पत्ति बना दी गयीं अर्थात् इसे धर्म सम्मतबना दिया गया। वेदों से लेकर मनुस्मृति तक सारे धर्मशास्त्रों में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में नारी को पुरुष की सम्पत्ति वर्णित किया गया है। श्रृष्टि के रचयिता परब्रह्म ब्रह्मा का अपनी ही पुत्री सरस्वती से किया गया बलात् संग एक चर्चित कथा सर्वविदित है। जो धर्म स्त्री को देवी भी मानता है और उपयोग की वस्तु भी कहता है, ऐसे धर्मावलम्बी देश में कानून के डण्डे से वहाँ निवासरत् लोगों के आचरण को कैसे परिवर्तित किया जा सकता है? .... बलात्कार का ना तो रूप-रंग होता है ना ही कोई चेहरा। लेकिन भारत में बलात्कार की जाति भी होती है और धर्म भी, क्योंकि इसे धार्मिक संरक्षण मिला हुआ है। जो समाज दो हजार सालों से भी अधिक समय से जिस आचार संहिता से बंधा रहकर जीवन यापन करता है, वही उसके आचरण में दृष्टिगोचर होता है। मनुस्मृति को पढ़ लेने से प्रत्येक भारतीय को भारतीय आचरण का मायाजाल समझ में आ जायेगा। इसलिये हम कहते हैं कि वर्तमान दुनिया में भारत इकलौता देश है जहाँ बलात्कार की जाति भी है और धर्म भी"।
सम्पादक जी के अनुसार- "आज भारत में जितना भी साहित्य उपलब्ध है वह सारा का सारा ब्राह्मण साहित्य है जिसे हम वैदिक, देव या आर्य साहित्य कहते, पढ़ते और मानते हैं। आर्य साहित्य व  दर्शन की मुख्य विषयवस्तु राजा, धर्म, जाति, कुल या फिर युद्ध (छल-कपट), सौन्दर्य, विलासिता और स्त्री पर केन्द्रित है। आर्य साहित्य में राजनीति और कूटनीति की आत्मा धर्मप्रधान होकर धर्मसत्ता तक सीमित है। यह प्रमाणित हो चुका है कि भारत मूलतः मूलनिवासियों अनार्यों का भारत था और है। समस्या इतनी सी है कि मूलनिवासियों का साहित्य नष्ट कर दिया गया 
सम्पादक जी ने जिस मनुस्मृति की बात की है उसी मनुस्मृति में लिखा गया है –“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता” एवं “जामियो यानि गेहानि शपंतय प्रतिपूजिता, तानिकृत्या हतानीव विनष्यंति समंततः”। मुझे नहीं पता शाह जी की दृष्टि में इन श्लोकों का अर्थ क्या है?
भारतीय समाज को विखण्डित करने के अनेक प्रयासों में से एक प्रयास भारतीय वैदिक वांग्मय की कूट व्याख्या करना भी है। तत्वज्ञानी इस कूटरचना की उपेक्षा कर सकते हैं किंतु बात इतने से समाप्त नहीं हो जाती। बारम्बार किया गया मिथ्या व्याख्यान अपना कूट प्रभाव डालता है। “आदिवासी सत्ता” नामक पत्रिका के पाठक पूरे देश में हैं, इन पाठकों का अपना एक वर्ग है जिसमें उच्च शिक्षितों से लेकर अपनी पीढ़ी में प्रथम बार शिक्षित लोग भी हैं। इन पाठकों के लिये यह पत्रिका अंतिम सत्य की तरह पूज्य है।
ऐसे वैचारिक कूटाचरण के विरुद्ध सत्य प्रतिपादित करने और प्रचारित करने की आवश्यकता है अन्यथा भारतीय समाज के विखण्डन को रोका नहीं जा सकेगा।             

8 टिप्‍पणियां:

  1. पुराण और वेदों की मनचाही व्याख्या तो होती ही रहती है ,पर किसी पत्रिका के सम्पादक से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती

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    1. अदिति जी! इस पत्रिका को पढ़ना पाठक को किसी अन्य लोक में ले जाता है जहाँ खीझ और आरोपों के साथ भारतीय समाज को खण्डित करने के भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं। वैदिक वांग़्मय की इनकी अपनी व्याख्यायें हैं, इनके अपने उद्देश्य हैं।

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  2. भारत में बलात्कार ही नहीं भ्रष्टाचार से लेकर सभी कदाचार जाति और धर्म के चश्मे से ही देखे जाते हैं। अधिसंख्य आँखें अब अंधी हो चुकी हैं। इनको अपना चश्मा पहनाइयेगा तो तोड़ कर फेंक देंगे। कहेंगे..इसका पावर बहुत कमजोर है।

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    1. पाण्डेय जी! सोचना पड़ेगा कि क्या ये तथाकथित धर्म हमारे लिये इतने अपरिहार्य हो गये हैं?

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  3. हमारा धर्म हमारे हर कर्म पर प्रभाव डालता है. अतः धर्म को समझने के लिए वेद, पुराण, कुरान, बाइबिल की सही व्याख्या को समझना आवश्यक है.

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  4. सारा खेल व्याख्याओं का ही तो है जेन्नी जी! व्याख्यायें सही होने लगें तो फिर धर्म पर उठने वाले विवाद स्वयं ही शांत हो जायेंगे, किंतु लोग ऐसा नहीं चाहते, विवाद बने रहना आज की सत्ता की पहली शर्त हो गयी है।

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  5. संपादक जैसे जिम्मेदारी वाले कार्य को करने वाले व्यकित की मति भ्रम का इलाज ,पाठको की प्रतिक्रिया से हो हो सकता है जो शायद आपके ब्लॉग के माध्यम से उन तक पहुच जाएगी ,तथकथित बुद्धिजीविओ को अपने देश और धर्म का गौरव न जाने क्यों नहीं दिखता ,बहुत बहुत साधुवाद

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.