शनिवार, 18 मई 2013

प्रकृति


पूछो-पूछो ...और पूछो ....
खीझ-खीझ कर पूछो ....
पूछ-पूछ कर खीझो ....
हम नहीं देंगे
आपके एक भी सवाल का ज़वाब
क्योंकि हम गुण्डे हैं
बदमाश हैं
कातिल हैं
लुच्चे हैं
लफंगे हैं
  बलात्कारी हैं  
घोटालेवाज हैं
 नरक के कीड़े हैं
मगर.......  
हमारी गलती क्या है यह तो बताओ?
वोट तो तुम्हीं ने दिया था हमें
और अब
जब हम अपनी प्रकृति के अनुरूप
भारत को तबाह करने में लगे हैं
अपने "स्व-धर्म" का पालन करने में लगे हैं
तुम्हें कोई हक़ नहीं होता
हमसे एक भी सवाल पूछने का।
 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बोया पेड़ बबूल का तो काटें तो चुभेंगे ही.....
    बढ़िया कटाक्ष..

    सादर
    अनु

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  2. true - u r right. when we vote blindly (or do not vote at all) we are ourselves responsible for the situation we are in ....

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.