गुरुवार, 18 जुलाई 2013

बातें


बातें ना हुयीं उनकी गोया कपड़े हुये
देखो पल-पल वो बातें बदल देते हैं ॥  

उनकी चालों की ख़ूबी पे मरते हैं सब
देखो पल-पल वो राहें बदल देते हैं ॥  

गिरगिटों ने भी उनसे ही तालीम ली
फ़ैसले शाम के सुबह वो बदल देते हैं ॥

उनके नुस्ख़े भी होते हैं बड़े लाज़वाब
हरदम वो देकर दवा दर्द बदल देते हैं ॥

लेने बदले बदलते हैं वो शातिर पैंतरे
अब उपनाम अपने हम बदल देते हैं ॥

बदलते हैं वो सबकुछ सिर्फ़ दिल छोड़के
सबसे लगाके दिल वो पते बदल देते हैं ॥

10 टिप्‍पणियां:


  1. बस्तर के झरनों से क्या खूब शब्द फूटे हैं....
    बेहतरीन ग़ज़ल......

    सादर
    अनु

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  2. सबसे लगाके दिल वो पते बदल देते हैं ॥

    ला-जवाब प्रस्तुति भाई जी!! क्या बात है आजकल आप हमारे दर का पता भूल गए है?

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    1. जी नहीं ! समयाभाव है। कुछ महीने का समय और लगेगा समय मिलने में।

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  3. उनकी चालों की ख़ूबी पे मरते हैं सब
    देखो पल-पल वो राहें बदल देते हैं
    गज़ब ..क्या बात है

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  4. क्या बात है कौशलेन्द्र जी.......बहुत सुन्दर...

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  5. बदलते हैं वो सबकुछ सिर्फ़ दिल छोड़के
    सबसे लगाके दिल वो पते बदल देते हैं ॥

    हमारा पता तो वही है ....:))

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  6. झूठ ! पिछले कई साल से उस पते पर जाकर वापस आ जाता हूँ। वहाँ अब कोई नहीं रहता। लोग कहते हैं कि इस घर के लोगों ने घर बदल दिया है ।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.