शनिवार, 14 जून 2014

धैर्य, पराक्रम और पुरुषार्थ के जीवंत उदाहरण मिलते हैं यहाँ ...


हिमांचल ने पग-पग पर प्रभावित किया है मुझे । यहाँ कठिनाइयों से जूझता पुरुषार्थ है, मुस्कुराता हुआ जीवन है, धैर्य है ....और है उद्दाम जिजीविषा । प्रकृति ने हिमांचल को दुर्गमता दी है तो देवत्व भी दिया है ..और अप्रतिम सौन्दर्य भी ।   


...... तुमने दी आवाज़ लो मैं आ गया 
.................. लो पर्वतों को चीर कर मैं आ गया ..... 



गर्वीले पर्वत के वक्ष को चीर कर बनाया गया इण्डो तिब्बत राजमार्ग । 



पहाड़ पर समतल भूमि का एक टुकड़ा मिल पाना कितना मुश्किल है ! भूमि के बेहतर उपयोग का एक नमूना । 


हंसी-खेल नहीं है पहाड़ पर आशियाना बनाना । 


कितने मोड़ ! कितने अवरोध !! फिर भी दृढ़ संकल्प से चल निकली पहाड़ पर अपनी रेल ! 


        ये हैं सराह गाँव के बच्चे - बड़के को बॉटनी अच्छी लगती है लेकिन बनना चाहते हैं इंजीनियर ।  मझले को मैथ्स अच्छा लगता है, ये पुलिस ऑफ़ीसर बनना चाहते हैं । छोटके को कम्प्यूटर इंजीनियर नहीं बल्कि कम्प्यूटर ही बनना है । बड़की है स्नेहा, इन्हें अंग़्रेज़ी अच्छी लगती है और ये टीचर बनना चाहती हैं । छुटकी को सारे विषय अच्छे लगते हैं लेकिन ये कुछ भी नहीं बनना चाहती । अच्छा लगा यह देख कर कि हिमाँचल के गाँवों में भी बच्चे शिक्षा और अपने भविष्य के प्रति कितने जागरूक हैं । ये बच्चे हमें अपने घर ले गये, चलते समय दोबारा फिर आने का वायदा ले कर ही आने दिया गया हमें । 



रेकॉंग पिओ के मार्ग में जल विद्युत परियोजना । 


कठोर पर्वतों से दो-दो हाथ करते हिमांचलियों के दृढ़ संकल्प के ऐसे उदाहरण पूरे हिमांचल में सर्वत्र बिखरे पड़े हैं । 


हिमालय के पत्थरों को फोड़कर बनायी जा रही जल विद्युत परियोजना 



चाय बागान की सैर ....लेकिन यह आसाम नहीं शिमला है । 


केवल ऊपर की कोमल दो पत्तियाँ ही पर्याप्त हैं आपकी चाय के बेहतीन स्वाद के लिए । 



चाय के फल । 


 चाय के कुदरती बगीचे । 


C.P.R.I. यानी central potato research institute Shimla.
यह शोध संस्थान कुफ़री में है जहाँ हिमांचल और अन्य प्रांतों की आब-ओ-हवा के लिए उपयुक्त आलू की विभिन्न किस्मों की उन्नत किस्में तैयार की जाती हैं । कुफ़री हिमसोना नामक आलू की एक किस्म इस खेत की देन है । यह एक लो-शुगर-कंटेन (100 mg per 100 gram of fresh potato weight) वाले आलू की किस्म है जो मधुमेहियों के लिए उपयुक्त है । इस आलू से बेहतरीन सफ़ेद चिप्स भी तैयार होते हैं इसलिए इसका भाव भी थोड़ा अधिक ही रहता है ।  


हिमांचल में समतल भूमि नहीं है तो क्या ...दृढ़ संकल्प तो है । पर्वतीय कृषि में निपुण हैं यहाँ के लोग । 


हिमांचल में मानव बस्तियाँ । घर पर्वत की चोटी पर हैं , पर्वत की बाहों में हैं, पर्वत के वक्ष-उदर और पैरों में भी हैं .....जीवन की कठिनाइयों ने हार मान ली है इन हिमांचलियों से ।     


हिमांचल के चप्पे-चप्पे में मुस्कुराता है जीवन । ये सैनिक नहीं हैं फिर भी भारत की उत्तरी सीमा के रक्षक हैं यहाँ के नागरिक । सोचिए, यदि दुर्गमता के कारण ये क्षेत्र जनविहीन होते तो क्या अब तक चीन ने इसे हथिया नहीं लिया होता ! और फिर ...हमें खुमानी, चिलगोजा, सेव, आड़ू .....ये सब कौन देता ! 

1 टिप्पणी:

  1. अति सुंदर। आनंद आ गया। घर बैठे हिमाचल की सैर भी हो गई।

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