शनिवार, 28 जून 2014

आस्था से बंधा हूँ मैं


आस्था के दीपक की लौ से झुलसती 
एक पूज्य वृक्ष की 
त्वचा  


आस्था तुम्हारी
इतनी बन्धनकारी होगी
पता न था ।
ये धर्म
इतना निर्दयी होगा
पता न था ।
चाँद-तारों पर जाने वाले
मेरी जड़ों से यूँ लिपट जायेंगे
पता न था ।  
अंतरीक्ष को नापने वाले
मुझे यूँ बन्दी बना लेंगे
पता न था ।
ए आदमी नामक प्राणी !
तुम मुक्त हो
कुछ भी करने के लिए
पर
शेष धरती
मुक्त नहीं है तुमसे
पता न था ।
वरना क्या मैं
पैदा होता
यूँ पेड़ बनकर ! 

3 टिप्‍पणियां:

  1. मर्मस्पर्शी..काश आस्था से झकड़ा इंसान संवेदनशील भी बन पाता..दूसरों का दर्द भी समझ पाता.

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.