रविवार, 8 जून 2014

भागसू में मनुष्य के असुरत्व से पराजित होता प्रकृति का देवत्व



तिब्बतियों के हृदय में शाक्य मुनि गौतम बुद्ध के देश “भारत” के प्रति आगाध श्रद्धा सर्व विदित है । धर्मशाला के पास स्थित मैक् लॉडगंज, तिब्बत के धर्मगुरु दलाईलामा की निर्वासित सरकार की शरणस्थली है और तिब्बतियों का धर्मस्थल भी ! 
 
       
यहाँ एक तिब्बती मेडिकल कॉलेज भी है जिसमें “सोवा रिग्पा” की पढ़ाई तिब्बती भाषा में होती है । इस कॉलेज से पढ़कर निकले छात्र “आमची” कहलाते हैं । हम रविवार के दिन पहुँचे थे, ज़ाहिर है कि कॉलेज में अवकाश था, फिर भी हम एक महिला प्रोफ़ेसर से मिलने में सफल रहे । यदि कोई किसी की भाषा, संस्कृति या चिकित्सा विधा के बारे में चर्चा करता है तो उसे अच्छा लगना स्वाभाविक है । महिला प्रोफ़ेसर ख़ुश हो गयीं । हमने उनकी चिकित्सा विधा के मौलिक सिद्धांतों पर चर्चा की तो पता चला कि सोवा रिग्पा और आयुर्वेद में भाषा के अतिरिक्त और कोई भी अंतर नहीं है । 
 
तिब्बती लिपि भी बहुत कुछ देवनागरी जैसी ही लगती है । इस दूकान के अन्दर हैं तिब्बती वाद्ययंत्र ।  


मैक् लॉडगंज में भागसू मन्दिर के समीप एक सुन्दर जलप्रपात ने हमें अपनी ओर आकर्षित किया । 

भागसू जल प्रपात के आसपास उगते कंक्रीट के कुकुरमुत्ते  


जब हम वहाँ पहुँचे तो पाया कि धवलगिरि (धौलागिरि) पर्वत की दुर्गम चोटियों से नीचे झरते झरने का प्राकृतिक सौन्दर्य ही उसका शत्रु बन गया था । 

देशी-विदेशी, सभी पर्यटक हर तरह से झरने के सौन्दर्य को बड़ी निर्दयता से चूस रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे कि वे मांस की बोटी में लगी अस्थि को चूसने के अभ्यस्त हैं । वे स्नान कर रहे थे, पॉलीथिन के खाली पाउच, पानी की खाली बोतलें और काँच की बोतलें इधर-उधर कहीं भी फेक रहे थे, हिमालय की दिव्यता को असुरों की तरह नष्ट कर रहे थे । 


हमने देखा, एक स्थान पर लिखा था “शिवा क़ैफ़े” । वह एक दुर्गम स्थान था । हम किसी तरह वहाँ पहुँचे और यह देख कर अवाक रह गये कि भागसू के भाग्य कितने खोटे हो गये हैं । वहाँ क़ैफे के अन्दर सम्भ्रांत घरों के युवक थे, युवतियाँ थीं, हुक्के थे, शराब थी .......असुरत्व की सम्पूर्ण व्यवस्था थी ।



चीड़ और देवदारु के परिधान धारण किये शिवालिक की सुन्दर पर्वत श्रंखलाओं की चोटियों से होकर नीचे की ओर फैली हिमधाराओं ने जैसे शुभ्र आँचल को बड़ी अल्हड़ता से फैल जाने दिया । सांगला से छितकुल के पूरे मार्ग में सफेद साड़ी के इन पल्लुओं को देखा जा सकता है । 


अल्हड़ता से फैले सफ़ेद आँचल 


अल्हड़ता से फैले सफ़ेद आँचल 


अल्हड़ता से फैले सफ़ेद आँचल 


अल्हड़ता से फैले सफ़ेद आँचल 


अल्हड़ता से फैले सफ़ेद आँचल 


अल्हड़ता से फैले सफ़ेद आँचल 



कहीं-कहीं तो, जहाँ ये पल्लू बसपा नदी में मिल रहे थे, लगता था कि आँचल हवा में लहराने लगा है । 


शिवालिक के पार्श्व में एक ओर खड़ी बस के चालक ने किसी हिमांचली लोक गीत की सी.डी. लगा रखी थी । यात्रियों में कुछ हिमांचली युवक भी थे जो सी.डी. के सुर में अपने भी सामूहिक मधुर सुर मिला रहे थे । सब कुछ आकर्षक था, मनमोहक था, मधुर था .......सौन्दर्य और सुर की मधुर वर्षा करने वाला .....  


 यह रहा पैशन फ़्लावर   








यह चीड़ नहीं देवदार है .



 ..और यह है चीड़ 


2 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ वर्षों पूर्व धर्मशाला में पत्रकारिता एवं हिन्दी विभाग के सेमिनार में एक सप्ताह घुमक्कड़ी करने का अवसर मिला था। मैक्लौडगंज, भागसूनाग इत्यादि सुंदर स्थान हैं। कांक्रीट के कुकुरमुत्तों ने पर्यावरण को काफ़ी हानि पहुंचाई है। सुंदर चित्रों के साथ उम्दा लेखन…… शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. Hmm....अपनी छुट्टियों का पूर फायदा उठा कर आ रहे हैं आप...

    कितने सुन्दर दृश्य हैं....आपकी नज़रों के सामने तो अभी भी छाये हुए होंगे....

    मैं भी जल्द ही बनाती हूँ.....हिमालय प्रस्थान का कार्यक्रम :-)

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.