शनिवार, 5 जुलाई 2014

बदली



सूत्रधार ने नट-नटी के सम्मुख पटकथा रख दी और चुपचाप उनकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगा । दोनो बड़ी जिज्ञासा से पटकथा का अवलोकन करने लगे । जैसे-जैसे उनके उत्सुक नेत्र पटकथा के अक्षरों से होते हुये शब्दों में तैर कर आगे बढ़ने लगे उनकी मुखमुद्रा परिवर्तित होने लगी । पटकथा के समाप्त होते ही दोनो ने एक-दूसरे के मुख की ओर निहारा, मौन नेत्रों ने एक-दूसरे से एक जैसे प्रश्न किए और फिर सूत्रधार की ओर अगले आदेश के लिए देखा ।
जब तक सूत्रधार कुछ कहता, नटी से रहा नहीं गया और वह बोल पड़ी- प्रभु ! हम तो सुनते आये हैं कि सागर और सरिता के बीच प्रेमी और प्रेमिका जैसे सम्बन्ध हैं । पिता और पुत्री के रूपक तो आज तक नहीं सुने गये, और आज आप हमें यह नया मंचन करने के लिए आदेशित कर रहे हैं ?”
सूत्रधार मुस्कराकर बोले – “समुद्र की कोख से जन्म लेने वाली बदली अपनी विभिन्न अवस्थाओं से होती हुई अंततः समुद्र में ही पहुँच कर शांत होती है । नदी तो एक अवस्था है ...... मूल है नीर ।  
नटी को, स्मृति में, पिता के नेह ने आबद्ध किया, उसके नेत्र भर आये और वह संतुष्ट हो मंचन के लिए प्रवृत्त हुयी .....आज उसका भाव नृत्य अद्भुत् था ।     

सज-संवर, हो नेह पूरित
छा गयी बदली ।
कर पवन का थाम कर
लाँघ कर देहरी चली ।
सबने कहा बदली है बदली
लो उड़ चली बदली ।

बूढ़े समन्दर ने कहा
वो कहाँ बदली !
अंश है वो तो मेरी
पर तनिक पगली ।
दूर ज्यों-ज्यों वो हुयी
रुक-रुक झरी बदली ।

पर्वतों पर पत्थरों पर
बूंद-बूंद झरी बदली ।
झर-झर झरी, धूलि सनी
सरिता बनी बहती रही ।
बहकर समन्दर से मिली
थी गोद में जिसके पली ।

है दीर्घ यात्रा से शिथिल

पर नेह की बदली न बदली ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. डॉक्टर भैया शीर्षक देखकर्क मुझे लगा कि आपने फेसबुक वाली बदली (ट्रांसफर) पर कुछ लिखा है, लेकिन यह तो ट्रांसफॉर्मर (रूपांतरक) निकला. बदली (क्लाउड) और बदली (ट्रांसफॉर्म) ने तो हमें बदल दिया, दिल से! प्रणाम स्वीकारें!

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  2. जोशी जी नमस्कार ! आभार ।

    कल्याणमस्तु ! सलिल भइया जी ! यह आपका अनुराग है मेरे प्रति ।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.