बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

गुलदस्ते का छल


हिमालय की उपत्यिका में कई प्रकार की प्रजातियों के पुष्प खिलते थे । उनमें एक प्रकार का साहचर्य था जिसमें सहअस्तित्व की समझ थी । फिर किसी ने दूर देश के कुछ कंटीले पौधे भी लाकर वहाँ रोप दिये । वे भी पुष्पित हुये किंतु उनमें सहअस्तित्व की समझ का अभाव था । वे अपने आसपास किसी अन्य प्रजाति के पौधे को विकसित नहीं होने देना चाहते थे । सदियों से रेगिस्तान में अकेले रहते-रहते उनमें यही प्रवृत्ति विकसित हो गयी थी । हिमालय और रेगिस्तान के पौधे जिन परिस्थितियों में अंकुरित-पल्लवित और पुष्पित होने के लिये अभ्यस्त थे, उनमें भिन्नतायें थीं इसलिये वे उन्हें बनाये रखना चाहते थे । रेगिस्तान के पौधे अपने लिये अपनी अभ्यस्त पूर्वपरिस्थितियों के निर्माण की माँग करने लगे । शीघ्र ही हिमालय की शांत परिस्थितियाँ अशांत हो गयीं ।
कुछ अवसरवादी लोगों ने देशी-विदेशी सभी पुष्पों को चुनकर उनका गुच्छा बनाया और उन्हें एक धागे से बाँधकर ग़ुलदस्ते में रख कर राजा के सामने प्रस्तुत किया । राजा को ग़ुलदस्ता अच्छा लगा । उसने अपने राज्य में ‘ग़ुलदस्ता कल्चर’ विकसित करने का आदेश दिया । भिन्न-भिन्न प्रकृतियों और गुणों वाले पुष्पों को एक धागे में बँधकर ग़ुलदस्ते में रहना रास नहीं आ रहा था किंतु राजा का हठ था कि वह सब धान बाइस पसेरी ही तौलेगा ।
जैसे-जैसे ग़ुलदस्ते का आकार बड़ा होता गया पुष्पों के पृथक अस्तित्व का संघर्ष भी बढ़ता गया । रेगिस्तान से आये विदेशी पौधे पूरे हिमालय की पारिस्थितिकी अपने अनुकूल बना लेने के लिये उग्र होने लगे । उन्हें चीड़ और देवदारु के दैवीय स्वरूप वाले वृक्ष फूटी आँखों नहीं सुहाते थे । वे हिमालय को रेगिस्तान की उष्ण रेत से झुलसा देना चाहते थे जिससे वहाँ नागफनी और खजूर उग सकें और उनकी रेगिस्तानी संस्कृति विकसित हो कर पूरे हिमालय में व्याप्त हो सके । यह केवल ब्रह्मकमल और नागफनी के सांस्कृतिक अस्तित्व का ही नहीं अपितु हिमालय की ऊँचाइयों और रेगिस्तान के ढूहों, हिमाच्छादित चोटियों और रेत के उष्ण टीलों, विस्तृत नदियों और संकुचित पोखरों, हरे-भरे खेतों और वनस्पतिविहीन रेतीले मैदानों, सेव और खजूर के पेड़ों के साथ-साथ और भी न जाने कितने अस्तित्वों का प्रश्न था जो अपनी प्राचीन पहचान को बनाये रखने के लिये संघर्षरत था।
पृथक पहचान के उन्माद ने हिमालय के विस्तृत प्राङण में से अपने लिए एक पृथक रेगिस्तान की माँग को लेकर संघर्ष छेड़ दिया, उनका संघर्ष सफल हुआ। हिमालय के विस्तृत प्राङण के बीच सीमा रेखायें खीची गयीं । पश्चिम में अरबमहासागर और पूर्व में हिंदमहासागर के समीप के दो बड़े भूभाग नागफनी और खजूर को दे दिये गये । कंटीली नागफनी और खजूर के लिये इतना पर्याप्त नहीं था, वे पूरे हिमालय को रेगिस्तान में बदल देने के लिए हिंसक हो उठे ।  
सांस्कृतिक-धार्मिक उन्मादजन्य पृथक अस्तित्व और पृथक पहचान के लिए होने वाले इस संघर्ष को बनाये रखने के लिए ग़ुलदस्ता कूटनीति सहायक सिद्ध हो रही थी । छलीपरिभाषायें सम्मानित होने लगीं और मौलिक परिभाषायें अर्थविहीन होने लगीं । उधर हिमालय का अपना मौलिक अस्तित्व संकटग्रस्त होता जा रहा था ।
इस समस्या के हल के लिये हिमालय की उपत्यिका में महर्षियों ने सम्भाषा परिषद आहूत करने का निर्णय किया । विदेशी मूल की रेगिस्तानी नागफनी को भी आमंत्रित किया गया ।
सम्भाषा का प्रारम्भ करते हुये कंटीली नागफनी ने अपने उग्र विचार रखे – “हम पिछली कई सदियों से इस भूभाग में विजेता और स्वामी की हैसियत से रहते आये हैं । हिमालय हमारा विजित भूभाग है हम अपने विजित भूभाग में कुछ भी करने के लिये स्वतंत्र हैं । दुर्भाग्य से हमें अपने ही विजित भूभाग में अपने मौलिक अधिकारों के लिये संघर्ष करना पड़ रहा है । हम हमारे बनाये हुये मौलिक अधिकार अपने साथ लेकर चलते हैं, हमें आपकी ख़ैरात नहीं चाहिये । हिमालय की इस सर्दी में हम जी नहीं सकते हम यहाँ ग़र्मी और तपती हुयी रेत फैलाना चाहते हैं जिससे हमारे सांस्कृतिक पौधे अपनी पूरी पहचान के साथ यहाँ प्रभावी हो सकें । हम यहाँ कमल में नागफनी के काँटे और देवदारु के वृक्ष में खजूर की कँटीली पत्तियाँ लटकाने तक अपना संघर्ष करते रहेंगे । आप लोगों को सोचना चाहिये कि आख़िर हम खजूर के बिना जियेंगे कैसे ? खजूर हमारी आवश्यकता है, खजूर हमारी पहचान है और अपनी पहचान बनाये रखना हमारा अधिकार है । आप याद कीजिये, गुलदस्ता संस्कृति में आपने हमें यही वायदा किया था” ।
सम्भाषा परिषद में पुष्पशिरोमणि पद्म ने इसे सांस्कृतिक अस्तित्व का संघर्ष बताते हुये परिभाषाओं को पुनः रेखांकित किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया । उनके अनुसार - “वानस्पतिक समाज में उत्कृष्ट वैचारिक समानताओं पर सामाजिक सहमति से बने प्रतीकों, परम्पराओं और उनके निरंतर परिमार्जन के परिणामस्वरूप संवर्धित और परिष्कृत होते समाज की संस्कारित व्यवस्थायें ही प्रशस्त मानी गयी हैं । सहअस्तित्व, समान सम्मान, विकसित होने की समान सुविधायें और नैतिक मूल्यों पर आधारित समाज व्यवस्था हिमालय की विशेषता रही है । यहाँ की पारिस्थितिकी ....यहाँ का मौसम, यहाँ का वातावरण, सब कुछ हमारे अनुकूल रहा है । हम इससे भिन्न पारिस्थितिकी में रहने के अभ्यस्त नहीं हैं ...अभ्यस्त हो भी नहीं सकते । यदि नागफनी और खजूर को यहाँ की पारिस्थितिकी प्रतिकूल लगती है तो वे अपने मूल देश में जा सकते हैं जहाँ की पारिस्थितिकी उनके लिये अनुकूल है किंतु हम हिमालय की पारिस्थितिकी को परिवर्तित करने के लिए सोच भी नहीं सकते । ऐसा कोई परिवर्तन हमारे अस्तित्व को ही समाप्त कर देगा । और फिर हम हिमालय के अतिरिक्त और कहीं जा भी तो नहीं सकते”।     
        नाव के आकार वाले अगस्त्य पुष्प ने कहा- “आज चारो ओर जिस गुलदस्ता संस्कृति की धूम मची हुयी है, हम उसका विरोध करते हैं । वस्तुतः वह कोई संस्कृति है ही नहीं, एक कूटनीति है जो विदेशी पारिस्थितिकी को हिमालय में रोपित करना चाहती है । हम वह भी कर सकते थे किंतु हिमालय की पारिस्थितिकी की हत्या के मूल्य पर नहीं । समझ में नहीं आता कि लोग इतने हठी क्यों हैं कि वैज्ञानिक सिद्धांतों की निरंतर उपेक्षा करने में लगे हुये हैं । हम तो रेगिस्तानी पारिस्थितिकी की हत्या नहीं करना चाहते । हम नागफनी को समाप्त नहीं करना चाहते, फिर यह कंटीली नागफनी ही हमारी हत्या के लिये इतनी उद्यत क्यों है? हम इस असंस्कृति को हिमालय में पैर नहीं पसारने देंगे”।
तृण जाति के, झूमते रहने वाले कास पुष्पों ने महर्षि देवदारु के समक्ष अपनी जिज्ञासा रखी कि वे संस्कृति, असंस्कृति और अपसंस्कृति के सूक्ष्म अंतर को जानना चाहते हैं । तब कास की जिज्ञासा का समाधान करते हुये महर्षि देवदारु ने कहा – “हे कास ! ध्यान से सुनो, सर्व कल्याण के भाव से जब कोई मूल्य और विचार व्यावहारिक आकार ले कर एक व्यापक समूह में प्रचलित व सुस्थापित होते हैं तो वे ‘संस्कृति’ के परिचायक होते हैं । मात्र स्वकल्याण के भाव से जब कोई संकुचित विचार या योजना व्यावहारिक आकार लेती है तो वह ‘असंस्कृति’ का परिचायक होती है। जबकि सुस्थापित संस्कृति को विकृत करने वाले कुविचार या षडयंत्र ‘अपसंस्कृति’ के परिचायक होते हैं । ध्यान रहे कि संस्कृति में गतिशीलता होती है, असंस्कृति में जड़ता होती है जबकि अपसंस्कृति में प्रज्ञापराध के कारण सुस्थापित संस्कृति का पतन होता है”।   
वृद्ध तालीश के विशाल वृक्ष ने कहा – “मैंने सुना है कि संस्कृति, धर्म, आध्यात्म और नीति जैसे गूढ़ विषयों की श्रेष्ठपरिभाषाओं की षडयंत्रपूर्वक हत्या कर दी गयी है और सेक्युलरिज़्म जैसे छद्म शब्द प्रतिष्ठा पा रहे हैं । मैंने तो यहाँ तक सुना है कि नागफनी ने अपनी मान्यताओं और अपनी परम्पराओं को ही विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति घोषित कर दिया है । वहाँ तक भी सह्य है किंतु अपनी परम्पराओं को बलपूर्वक दूसरी संस्कृतियों पर थोप देना अमानवीय और अनाचार है । यह संस्कृतियों की हत्या का अपसंस्कारी दुष्प्रयास है। हम किसी भी स्थिति में हिमालय की पारिस्थितिकी को रेगिस्तान की पारिस्थितिकी नहीं बनने देंगे”।
       
सम्भाषा इस घोषणा के साथ समाप्त की गयी कि भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के स्वभाव, उनकी अनुकूलतायें व प्रतिकूलतायें, उनकी प्रतिबद्धतायें और उनकी पारिस्थितिकी को एक ही तराजू में रखकर नहीं तौला जा सकता । इसलिए नागफनी और खजूर को हिमालय में रहने के लिए अपने अन्दर अनुकूलन विकसित करना होगा - यह एक सुस्थापित वैज्ञानिक सत्य है जिसका सम्मान किया ही जाना चाहिये ।

  

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत संगत और सतर्क विश्लेषण के साथ विवेकपूर्ण समाधान - काश, इसे सही परिप्रेक्ष्य में समझा और स्वीकारा जा सके !

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.