शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

मौन को स्वर देने की चिंता में मुखरित होते मण्डीहाउस में “वे तीन दिन” ; प्रथम दिवस

8 फ़रवरी 2015 
हज़रत निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर आनन्द मेरी प्रतीक्षा में थे । ‘आनंद’ प्राप्ति के लिये लोग कितने पापड़ नहीं बेलते किंतु यहाँ आनन्द को हमारी प्रतीक्षा करनी पड़ रही थी । यह एक शुभ संकेत था कि आने वाले दिन सुखद व्यतीत होंगे ।
रेलवे स्टेशन से निकलकर हम सीधे मण्डीहाउस पहुँचे । मण्डीहाउस मेट्रो स्टेशन से एन.एस.डी. तक चारो ओर इंटरनेशनल थियेटर फ़ेस्टिवल ऑफ़ इण्डिया के बड़े-बड़े बोर्ड्स पथिकों को आकर्षित कर रहे थे । हम एन.एस.डी. पहुँचे तो वहाँ के द्वारपालों ने वहाँ किसी सेमिनार के आयोजन की जानकारी से अनभिज्ञता प्रकट की । बताया गया कि वहाँ तो केवल भारत रंग महोत्सव का ही आयोजन हो रहा है । हमें श्री राम सेण्टर जाने का परामर्श दिया गया । एक भवन से दूसरे भवन भटकते-भटकते हम एक बार पुनः एन.एस.डी. के सामने पहुँचे । हमने दूरभाष पर थियेटर एण्ड फ़िल्म डायरेक्टर डॉ. योगेंद्र चौबे से सम्पर्क स्थापित करने में असफल होने पर  थोड़ी देर पहले अजय के आये नये दूरभाष नम्बर पर सम्पर्क करने का प्रयास किया तो उधर से एन.एस.डी. के डायरेक्टर साहब की आवाज़ आयी – “मैं वामन केन्द्रे बोल रहा हूँ ....आप बहुमुख में अन्दर आ जाइये”। 


 नौटंकी शैली में गीतनाट्य "कीचक वध" के प्रदर्शन हेतु तैयार रंगकर्मी  


पर्यावरण प्रेम ने एन.एस.डी. को दी कलात्मक अभिव्यक्ति 
और एक वृक्ष को दी ज़िन्दगी 
इस बार हम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अन्दर गये तो हमें वहाँ के सूचना पट हमारी बेवकूफ़ी पर मुस्कराते हुये दिखे, हम कुछ झेंपे फिर ‘बहुमुख’ में प्रविष्ट हुये ।


अतिथि रंगकर्मियों की प्रतीक्षा में कला मंच - “बहुमुख”

बहुमुख में प्रविष्ट हुये हमें कुछ ही मिनट हुये थे कि बिना किसी तामझाम के राष्ट्रीय सेमिनार प्रारम्भ हुआ । मुझे सुखद आश्चर्य की अनुभूति हुयी, वहाँ किसी राजनीतिक शख़्सियत का दूर-दूर तक कोई नाम-ओ-निशान भी नहीं था । मैं अपने जीवन में प्रथम बार किसी ऐसे सेमिनार का भाग बनने जा रहा था जहाँ राजनीतिज्ञों की अनौचित्यपूर्ण उपस्थिति, उनके उबाऊ और हास्यास्पद भाषणों, कीमती फूलमालाओं, क्रोधित करने वाली छद्मप्रशंसाओं और कृत्रिम मुस्कराहटों के पीछे छिपी कुटिलता के बोझ से मुक्त एक पूर्ण अकादमिक  वातावरण था । मैं आश्वस्त हुआ कि बारम्बार दिल दहलाने वाली दिल्ली आज हमारे ऊपर मेहरबान थी और आज यहाँ कोई सूरमा समय की निर्मम हत्या नहीं कर सकेगा । एन.एस.डी. की इस सादगी पर मेरे हृदय के चारो चेम्बर्स में जो एक ध्वनि इको करने पर विवश हो रही थी उसके बोल भी बड़े सीधे-सादे थे – हाय ! मैं मर जावाँ ....... हाय ! मैं मर जावाँ ....... हाय ! मैं मर जावाँ .......

मेरे जीवन में यह एक ऐसा पहला सेमिनार था जो शुद्ध अकादमिक वातावरण में सम्पन्न होने जा रहा था । गरिमामय और भव्य संस्थान में सादगी के साथ अकादमिक शोधपत्रों, भाषणों और विमर्श के लिये मैं पूरी तरह तैयार था ।
मुम्बई के पटकथालेखक पवार जी ने सधी हुयी पटकथा शैली में लिखे अपने शोधपत्र का वाचन किया । थियेटर के अदिम बीजों की उत्पत्ति विषयक उनके विचार मुझे अंत तक बाँधे रहे । मैं मंत्रमुग्ध हो कर सुनने के लिये विवश हुआ ।
मराठी लोककला मंच के एक मूर्धन्य रंगकर्मी जाति की हीनता के बोझ से न केवल दबे हुये अपितु दबे रहने के हठ पर अड़े हुये से लगे । उनके विचारों ने बहुत निराश किया । मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वे जातिगत हीनता और लोककलाओं के बीच बुरी तरह उलझ कर रह गये हैं । वे कभी चोरी और उठायीगीरी को अपनी जाति का पारम्परिक पेशा बताते तो दूसरे ही क्षण इस पेशे के प्रति लोगों की नफ़रत से परेशान हो जाते ; कभी वे लोककला के अस्तित्व को लेकर चिंतित होते तो कभी लोककला से जुड़ी जातियों की उनकी पारम्परिक लोककला से मुक्ति के लिये चिंतित होते ; कभी लोककला को बाज़ार द्वारा हथिया लिये जाने के दुःख से पीड़ित हो जाते तो दूसरे ही क्षण लोककला को ग़रीबी से मुक्ति दिलाने बाज़ार तलाशने की बात करते । 

आदरणीय रंगकर्मी जी ! विनम्रतापूर्वक निवेदन करना चाहूँगा कि कलाकार और साहित्यकार की कोई लौकिक जाति नहीं हुआ करती ....उनका कोई लौकिक धर्म नहीं हुआ करता । ‘कलाकार’ और ‘साहित्यकार’ ही उनकी जाति है, ‘कला’ और ‘साहित्य’ ही उनका धर्म है । वे किसी समुदाय विशेष के लिये नहीं होते .....वे प्राणिमात्र के लिये हुआ करते हैं ....उनका चिंतन वैश्विक हुआ करता है ।

पूर्वांचल में क्रूरतापूर्वक किये गये यौनशोषण की घटनाओं से व्यथित मौन को स्वर देने के लिये चिंतित त्रिलिना बनर्जी के शोधपत्र ने मुझे भी व्यथित किया । उन्होंने अपने बीस पृष्ठों के शोधपत्र में से कुछ ही पृष्ठों का वाचन किया । वे मंच से उतरीं तो मुझे इसके लिये उन्हें धन्यवाद देना पड़ा । मैंने कहा कि उनके शोधपत्र के शब्दचित्र किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को व्यथित कर सकते हैं । उत्तर में उन्होंने बताया कि प्रारम्भ में तो शोधकार्य के अनंतर वे ब्रश करते-करते रो उठती थीं । वे इस विषय पर कला के माध्यम से जनचेतना का वातावरण निर्मित करना चाहती हैं । 


शोध पत्र वाचन करती हुयीं त्रिनिशा बनर्जी

 कुछ और महत्वपूर्ण सम्बोधनों में रंगकर्मियों और थियेटरनिर्देशकों ने प्राचीन वाद्ययंत्रों, लोकगीतों और लोकनाट्यों के अस्तित्व की रक्षा पर अपनी चिंता प्रकट की । अपनी खोती जा रही पहचान को बचाने के लिये काँवड़ा नृत्य, रावणों की रम्मत और पाबू नाट्य जैसे विषयों पर भी चिंतन किया गया । बाज़ारवाद के दैत्य से बचते हुये उनके लिये बाज़ार तलाशने की बात की गयी । रावणहत्ता जैसे प्राचीन वाद्ययंत्रों पर चर्चा हुयी और नये परिवेश के नाट्यों की रचना की आवश्यकता पर बल दिया गया । एक संस्तुति यह भी की गई कि लोक कलाओं को नित नयी परिस्थितियों के अनुकूल अंकुरित होना होगा अन्यथा धरती से जुड़े लोगों की बात कौन उठायेगा ? मुझे कुछ ऐसा अनुभव हुआ कि रंगकर्मियों में लोककला के इंस्टीट्यूशनलाइज़ेशन के प्रति भय और आकर्षण के बीच उत्पन्न द्विविधा ने एक विचित्र स्थिति उत्पन्न कर दी है और वे किसी सुरक्षित मार्ग के लिये चिंतित हैं । वास्तव में इस विषय पर एक गम्भीर विमर्श की आवश्यकता है ।


श्रीराम सेण्टर में तारिक हमीद निर्देशित प्ले “द वेव” का एक दृष्य 

3 टिप्‍पणियां:

  1. इस सब को पढ़ना भी सुखद अनुभूति बना रहा -आभार !

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  2. पिछले दिनों मेरा भी वहाँ जाना हुआ. दो बार गया हूँ. दोनों बार संध्या उपरान्त. मेरे मित्र 'रजनीश बिष्ट' जी का वहाँ प्रतिदिन ही जाना होता है. रंगमंच और रंगकर्मियों पर ही वे मुझसे अधिकांश समय बात करते हैं . जब भी किसी फिल्म प्रतिबंध के बारे में बात होती या चर्चित लेखक पर हुए बवालों पर चर्चा होती या किसी चित्रकार के प्रति समाज के नकारात्मक रवैये पर बहस छिड़ती मित्र रजनीश जी अपने गुस्से को व्यक्त करने के बाद यही कहते - "यार, कलाकार और साहित्यकार इन टुच्ची चीज़ों से ऊपर उठा होता है . वो तुम्हारे हिन्दू मुस्लिम के फ्रेम (धर्म) में और जाति वगैरह के नज़रिये से नहीं सोचता. ... "

    मुझे लगता है 'भारत रंग महोत्सव' में आपकी तीन दिवसीय घुमाइश का ये वृत्तांत (आँखों देखा हाल) उनको और उनके एनएसडी मित्रों को भी काफी पसंद आयेगा। दिल्ली आगमन पर मेरा प्रणाम स्वीकार करें।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.