मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

बस्तर कला को सहेजते लोक कलाकार

बस्तर के मानव विज्ञान संग्रहालय में इन दिनों चल रही है एक कार्यशाला जिसमें बस्तर की जनजातीय चित्रकला परम्परा को सहेज रहे हैं स्थानीय लोक कलाकार 


ये हैं कुमारी सुरभि वर्मा, बी.एससी. एग्रीकल्चर द्वितीय वर्ष की छात्रा 
  चित्रकला के प्रति एक जुनून है इन्हें । ट्राइबल आर्ट के साथ-साथ मॉडर्न आर्ट के मिश्रण का एक प्रयोग कर रही हैं सुरभि । 


एक अन्य कलाकार द्वारा बनायी गयी, बस्तर की जीवनशैली को दर्शाती यह पेण्टिंग जिसमें उपयोग में लाये गये हैं साधारण जलरंग 

ग्राम पुसपाल निवासी अमित नाग ने क्राइस्ट चर्च कॉलेज से माइक्रोबायलॉजी में बी.एससी. किया है । यह पूछने पर कि वे अब आगे क्या करना चाहते हैं, उनका उत्तर था - फ़ाइन आर्ट में ग्रेजुएशन 
बस्तरके जनजीवन में बलात घुस आये माओवाद से पीड़ित एक माओवादी युवती की मनः स्थिति को दर्शाया है मिख़ाइल विलियम ने जो लोकपरम्परा के एक प्रोफ़ेशनल चित्रकार हैं । 

बस्तर में धान की पकी फसल झूमती है तो झूमता है आदिवासी तन-मन । मांदर की थाप पर थिरक उठते हैं पाँव ....मन हो उठता है उल्लसित और प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा को ज्ञापित करने मनाया जाता है दियारी तिहार ।इस चित्र में इन्हीं भावों को उकेर रहे हैं लोकचित्रकार विलियम ।  


बस्तर टेराकोटा 
मृत्तिकाकला को सहेजते लोक कलाकार 


बस्तर की काष्ठकला को सहेजते स्थानीय लोक कलाकार 


2 टिप्‍पणियां:

  1. लोक कला, अंतर की तरल-सरल अभिव्यक्ति होने के कारण बड़ी ,अनायास और अबाध होती है . बिना किसी ट्रेनिंग, आरोपणों और आडंबरों के बिना मन तक पहुँच बनाने में समर्थ - परंपराओं के साथ जन के संस्कारों का चित्रण होने के कारण इन कलाओं की जीवन्तता कभी पुरानी नहीं होती .लोक जीवन की संवेदनाओँ और रागात्मक वृत्तियों तक पहुँचने का लालित्यमय माध्यम हैं ये लोक कलाएँ .

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    1. जी ! आज लोककला परम्परा को संरक्षित कर पाना तनिक दुश्कर होता जा रहा है ...ऊपर से नये संदर्भों में नवांकुरण के अभाव ने स्थिति को और भी गम्भीर बना दिया है ....फिर भी हम आशान्वित हैं कि वारिश में बहने वाली पहाड़ी नदी को कोई रोक नहीं सकेगा ।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.