रविवार, 14 जून 2015

कब तक ?


एक अंधेरे का अपराधी
बनाता है फर्ज़ी डिग्रियाँ
कमाता है बेशुमार पैसा
ख़रीदता है किसी पार्टी का टिकट
और फिर
बन जाता है उजाले का अपराधी ।
पहले
वह पुलिस से डरता था
अब
पुलिस उससे डरती है ।

ईमानदारी से कमायी गयी पीएच. डी.
सीने से लगाये
कुछ बेचारे
आज भी घूमते हैं
टूटी चप्पलें चटकाते हुये
गाँव-गाँव, शहर-शहर, सड़क-सड़क 
कि मिल जाय कहीं
मास्टरी
किसी स्कूल में
या फिर एक अदद
चपरासी की नौकरी ही ।

इस देश में बेचारों की भीड़ है
वे हर पल होते रहते हैं
अतिदलित
कोसते हुये अपनी किस्मत ।
न जाने क्यों
कभी गुस्सा नहीं आता उन्हें
कि पकड़कर ठोंक डालें
उन चयनकर्ताओं को
जो चुन-चुन कर देते हैं टिकट
अपराधियों और राक्षसों को ।
भारत में सत्ताधीशों के गिरोह
इतने असुर
पहले तो कभी नहीं थे न !

मुझे नहीं पता
कि सरस्वती के बलात्संगियों की
कब तक होती रहेगी
ताजपोशी
और बनते रहेंगे वे
किसी ऑफ़िस के
निर्लज्ज मालिक ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. युवामन के भटकाव, राजनीति और प्रतिभा का सिस्टम के हाथों घुटने की वेदना को बखूब वर्णन किया है।

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    1. वर्णन का उद्देश्य है एक बार फिर् क्रांति हो ।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.