गुरुवार, 1 जून 2017

स्त्री उत्पीड़न की गाथा बनाम तहर्रुश गेमिया



पिछले दिनों उत्तरप्रदेश के रामपुर में तहर्रुश गेमिया का जिंसी स्वरूप देखने को मिला । चौदह मुस्लिम लड़कों ने दो हिन्दू लड़कियों को सरे राह तहर्रुश गेमिया का शिकार बनाया । पाकिस्तान में जब हिन्दुओं का नस्लीय उन्मूलन किया जा रहा हो, गज़वा-ए-हिन्द के लिए लोगों को भड़काया जा रहा हो, सीमा पर आये दिन सीज़-फ़ायर का उल्लंघन किया जा रहा हो, राजधानी दिल्ली में भारत के हज़ार टुकड़े करने तक जंग जारी रखने के नारे लगाये जाते हों ...तब हमारे लिये गज़वा-ए-हिन्द और तहर्रुश गेमिया को जानना बहुत आवश्यक हो जाता है ।


तहर्रुश गेमिया को शह है मुस्लिम ब्रदरहुड की 


इस्लामिक धमग्रंथ हदीथ के अनुसार इस्लाम की अंतिम लड़ाई हिन्दुस्तान पर इस्लामी फ़तह के साथ समाप्त हो जायेगी । अरब के लोग इस जंग को गज़वा-ए-हिन्द कहते हैं । आठवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही मुस्लिम आक्रमणकारियों की कुदृष्टि भारत पर टिकी रही । उन्होंने सैकड़ों बार भारत पर आक्रमण किये, लूटमार की, क़त्ल-ए-आम किये, नस्लीय उन्मूलन किया और धर्मांतरण कर अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों की नींव डालकर भारत को क्षीण किया । भारत विभाजन के पीछे गज़वा-ए-हिन्द का लालच भी एक प्रमुख कारण था । पाकिस्तान के जन्म के साथ ही गज़वा-ए-हिन्द का दूसरा चरण भी प्रारम्भ हो गया और पाकिसानी सेना के समर्थन से मुस्लिम कबीलों ने भारत पर आक्रमण कर दिया । भारत को स्वतंत्र हुये मात्र कुछ ही दिन बीते थे कि उसका एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान द्वारा दबोच लिया गया जबकि कुछ हिस्सा चीन को भेंट स्वरूप दे दिया गया । तब से आज तक पाकिस्तान का भारत के विरुद्ध छद्म युद्ध चल रहा है । पाकिस्तान भारत पर  आक्रमण करता रहता है और भारत अपना बचाव करता रहता है, इस तरह 1947 से लेकर आज तक कभी सीमा पर तो कभी सीमा के भीतर घुसकर एक पक्षीय युद्ध हो रहा है । पाकिस्तान के धार्मिक नेता सरे-आम गज़वा-ए-हिन्द की कसम खाते हैं और भारत में इस्लामिक शरीयत का शासन स्थापित करने के लिये मुसलमानों को भड़का रहे हैं ।
कश्मीर के अहमदशाह गिलानी जैसे अलगाववादी नेता स्वयं को भारतीय मानने से स्पष्ट इंकार करते हैं । सेना पर पत्थर फेकने वाले युवकों को शबनम लोन “हमारे बच्चे” स्वीकार करती हैं । शेख़ अब्दुल्ला पत्थरबाजों को “कश्मीर के लिये” लड़ने वाले लड़ाके बताते हैं । दिल्ली में डॉ. नारंग की कुछ मुस्लिम युवक पीट-पीट कर हत्या कर देते हैं, मेट्रोस्टेशन के सामने मूत्र-त्याग करने से मना करने पर एक रिक्शा चालक की कुछ मुस्लिम युवक पीट-पीट कर हत्या कर देते हैं, सामूहिक बलात्कार की क्रूर घटनाओं में मुस्लिम समुदाय की बहुलता रहती है... स्वतंत्र भारत की यह वह तस्वीर है जो हिन्दुओं के लिये बेहद ख़ौफ़नाक़ है ।       
निर्बलों और स्त्रियों का उत्पीड़न करना सभ्य और धार्मिक होने के मद में चूर लोगों की लड़ाई का एक अहम हिस्सा है । उत्पीड़न के प्रारम्भिक इतिहास की नींव मनुष्य के स्वार्थी होने के दिन ही पड़ चुकी थी । हृदय में लोकसंवेदना के क्षरण की स्थिति इसे और भी क्रूरता से भर देती है जबकि वर्चस्व के संघर्ष में आत्मसंतुष्टि की भावना इसे आनन्द के साधन के रूप में स्वीकार करती है । उत्पीड़न के स्वरूपों, क्रूरता और तीव्रता के आधार पर इनका भौतिक और ऐतिहासिक वर्गीकरण किया जा सकता है । विश्व की कई सभ्यताओं में मनोरंजन के लिये हिंसक खेलों के आयोजनों के कई उदाहरण मिलते हैं । इन खेलों में प्रयुक्त होने वाले जीवों में मुर्गे, कुत्ते और ऊँट आदि निरीह ही नहीं बल्कि मनुष्य और उनके अबोध बच्चे भी सामग्री के ऊप में सम्मिलित किये जाते रहे हैं ।  
यह मनुष्य है जो क्रूरता और हिंसा में भी आनन्द की अनुभूति करता है । फ़िल्मों के खलनायक मनुष्य की इसी क्रूर प्रवृत्ति का प्रदर्शन करते हैं । उत्पीड़न में आनन्द की अनुभूति की चाहत ने आधुनिक युग में तहर्रुश गेमिया को प्रचलित कर दिया । तहर्रुश के लगभग चौदह प्रकार हैं जिनमें से गेमिया और जिंसी क्रूर लोगों में अधिक लोकप्रिय हुये हैं ।  
मिस्र की स्थानीय बोली में तहर्रुश का सामान्य अर्थ है उत्पीड़न, जबकि यौनउत्पीड़न के लिए प्रचलित शब्द है तहर्रुश जिंसी । यह 1950 का वर्ष था जब मिस्र में सामूहिक तहर्रुश की घटनायें प्रचलन में आयीं । धीरे-धीरे तहर्रुश असामाजिक तत्वों के लिये मौज-मस्ती का माध्यम बनता गया और इसे तहर्रुश जमाय या तहर्रुश गेमिया कहा जाने लगा । तत्कालीन सत्ताओं ने इन पर कोई ध्यान नहीं दिया जिससे तहर्रुश प्रेमी और भी निरंकुश और निर्भीक होते चले गये ।
तहर्रुश में सम्मिलित होने वाले असामाजिक तत्वों की आयु प्रायः बीस से तीस वर्ष के आसपास होती है जबकि तहर्रुश ज़िंसी की शिकार स्त्री की आयु सात से लेकर सत्तर साल तक कुछ भी हो सकती है । शिकार को उन्मादी युवकों की भीड़ द्वारा तीन घेरों में घेर कर आतंकित और प्रताड़ित किया जाता है । शिकार स्री के कपड़े फाड़ दिये जाते हैं, उसके अंगों को ब्लेड या धारदार हथियारों से क्षति पहुँचायी जाती है और उसके साथ वह सब कुछ किया जाता है जिसे देखकर पशुओं की आत्मा भी काँप उठे । इस बीच भीड़ उसे विभिन्न दिशाओं में खींचती और नोचती-खसोटती रहती है । उसका क्रूरतापूर्वक यौन-उत्पीड़न होता है । यह सब बीस मिनट से लेकर एक घण्टे तक चलता है । इस बीच भीड़ के एक समूह द्वारा ऐसा प्रदर्शित किया जाता है जैसे कि वह शिकार हो रही स्त्री की रक्षक है । वे बराबर चिल्लाते रहते हैं "Do not be afraid; I'm protecting you," or "you are like my sister, do not be afraid." जबकि दूसरा समूह तहर्रुश को उत्साहित करने के लिए डरावनी, हिंसक, अश्लील और क्रूर बातें चिल्ला-चिल्ला कर बोलता रहता है । हिंसा और यौन उत्पीड़न में दोनों ही समूह के लोग सम्मिलित रहते हैं । यह सब इस क्रूर खेल का एक हिस्सा है ।  
विश्व स्तर पर तहर्रुश तब चर्चा का विषय बना जब असामाजिक तत्वों के अतिरिक्त मिस्र के सुरक्षा बलों और उनके प्रतिनिधियों द्वारा भी तहर्रुश के लिये स्त्रियों का स्तेमाल किया जाने लगा । यह वर्ष 2005 के मई माह की 25 तारीख़ थी जब मिस्र की राजधानी काइरो के तहरीर स्क्वायर पर संवैधानिक जनमत संग्रह के विरोध-प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों ने भी तहर्रुश को माध्यम बनाया अर्थात् सत्ता ने आतंक के लिए स्त्रियों के उत्पीड़न का सहारा लिया । धरती के सबसे बुद्धिमान प्राणी की समस्या कुछ भी क्यों न रही हो किंतु हर समस्या के निदानस्वरूप उत्पीड़न और उत्पीड़न के लिए स्त्रियों को बड़ी आसानी से शिकार बना लेने की परम्परा बहुत पुरानी रही है । तहर्रुश एक उन्मादित भीड़ द्वारा किसी भी स्त्री के साथ क्रूरता और हिंसक व्यवहार के लिये कुख्यात एक अरबी परम्परा है । आश्चर्य की बात यह है कि यह भीड़ धार्मिक उत्सव के लिये एकत्र हुयी हो या किसी विरोध-प्रदर्शन के लिये, तहर्रुश हमेशा स्त्रियों का ही होता रहा है ।
माह अक्टूबर 2006 की चौबीस तारीख को इद-अल-फ़ित्र जैसे धार्मिक अवसर पर एक सिनेमा हॉल में प्रवेश न करने देने से उत्तेजित हुये युवक काइरो के तलात-हर्ब-स्ट्रीट पर पाँच घण्टे तक तहर्रुश जिंसी करते रहे जबकि पुलिस इस बीच मूकदर्शक बनी रही । वर्ष 2011 में मिस्र में तानाशाही सत्ता के विरुद्ध क्रांति हुयी और वहाँ की जनता द्वारा तानाशाह हुस्नी मुबारक़ को सत्ता छोड़ने पर विवश कर दिया गया । हुस्नी के विरुद्ध हुये जन-प्रदर्शनों के दौरान तहर्रुश जिंसी में सम्मिलित होने वाले युवकों ने कई विदेशी महिला पत्रकारों को भी अपना शिकार बनाया । एक ही दिन में तहर्रुश की कई घटनाओं ने मिस्र की स्त्रियों को आतंकित और उद्वेलित कर दिया । जिस तरह लोग ग़म और ख़ुशी दोनों अवसरों पर मद्यपान करते हैं उसी तरह तहर्रुश भी विरोध और ख़ुशी दोनों अवसरों पर आयोजित किया जाने लगा । वर्ष 2012 तक तहर्रुश ज़िंसी धार्मिक उत्सवों की मुख्य विशेषता हो गयी ।
वर्ष 2011 में हुस्नी मुबारक की सरकार के विरुद्ध हुये जन आन्दोलनों में तहर्रुश गेमिया प्रदर्शनकारियों की मौज-मस्ती और आतंक का ज़रिया बना । वर्ष 2011 में मिस्री क्रांति के पश्चात् की घटनाओं को कवर करने के लिये काइरो पहुँची दक्षिण अफ़्रीकी दूरदर्शन एवं रेडियो पत्रकार और युद्ध संवाददाता डर्बन निवासी लारा लोगेन भी तहर्रुश ज़िंसी की शिकार हुयीं । तीन फ़रवरी 2011 को मिस्री पुलिस द्वारा लारा लोगेन के पूरे दल को  बन्दी बना लिया गया, वाहन चालक को मारा-पीटा गया और उन्हें देश छोड़ देने के लिए धमकाया गया । हुस्नी मुबारक़ के त्यागपत्र पर तहरीर स्क्वायर पर ज़श्न मना रहे लोगों को कवर करने के दौरान 11 फरवरी 2011 को लारा लोगेन के इज़्रेली होने के सन्देह में लगभग 300 लोगों की भीड़ ने उनके ऊपर हमला कर दिया और वे 25 मिनट तक तहर्रुश ज़िंसी की शिकार होती रहीं । क्रूरहिंसा के बाद उन्हें मरा हुआ समझकर तहरीर स्क्वायर पर बाल पकड़कर घसीटा गया । एक स्थानीय स्त्री ने उन्हें बचाने की कोशिश की, तभी सैनिकों की एक टुकड़ी ने भीड़ पर लाठी बरसाना शुरू कर दिया जिससे एक आदमी ने लोगेन को सैनिकों के ऊपर उछाल दिया । लारा लोगेन बुरी तरह घायल हो गयी थीं, उन्होंने अगले दिन ही अमेरिका के लिये प्रस्थान किया जहाँ वे चार दिन तक चिकित्सालय में रहीं ।




दक्षिण अफ़्रीकी दूरदर्शन एवं रेडियो पत्रकार और युद्ध संवाददाता डर्बन निवासी लारा लोगेन

11 फ़रवरी 2011 को हुस्नी मुबारक के राजनैतिक पतन के साथ ही तहर्रुश की घटनाओं में बेशुमार इज़ाफ़ा हुआ। जनवरी 2011 में 7 से 25 जनवरी के बीच तहर्रुश जिंसी की 82 घटनायें दर्ज़ हुयीं । नवम्बर 2011 में फ़्रेंच पत्रकार कैरोलिन सिंज़, जून 2012 में ब्रिटिश पत्रकार नताशा स्मिथ, 25 जनवरी 2013 को मिस्री पत्रकार हानिया मोहीब और उनके साथ 18 अन्य महिलायें और जून 2013 में डच पत्रकार तहर्रुश जिंसी की शिकार हुयीं । मिस्र की एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार जून 2012 से जून 2014 के बीच तहर्रुश जिंसी की पाँच सौ घटनायें दर्ज़ हुयीं ।
मिस्र की जनता को तानाशाह हुस्नी का विरोध करना था तो तहर्रुश का सहारा लिया गया, हुस्नी ने स्तीफ़ा दे दिया तो ख़ुशी मनाने के लिए तहर्रुश किया गया फिर जब आठ जून 2014 को नये प्रेसीडेण्ट अब्देल-फ़तेह-इल-सिसी का उद्घाटन समारोह हुआ तो एक बार फिर ख़ुशी में भीड़ ने तहर्रुश जिंसी की दस घटनाओं को अंज़ाम दिया । इस सबके बाद संतोष की बात यह है कि मिस्र में तहर्रुश ज़िंसी यानी सर्कल ऑफ़ हेल Circle of hell के विरुद्ध मिस्र के कुछ लोग उठ खड़े हुये हैं और यह एक ऐसी ख़बर है जिससे बची-खुची इंसानियत का प्रमाण मिलता है । मिस्र के लोगों ने तहर्रुश ज़िंसी के विरुद्ध केवल आवाज़ ही नहीं उठायी बल्कि एक सक्रिय संगठन क़ुआवा-दिद-अल-तहर्रुशभी खड़ा कर लिया है । मिस्र में इस क्रूरता के प्रतिकार के लिए OpAntiSH (Operation Anti Sexual Harassment) प्रारम्भ किया गया है जिसके सक्रिय कमाण्डो तहर्रुश की घटनाओं की सूचना मिलते ही तुरंत वहाँ पहुँच जाते हैं और तहर्रुश पीड़िता को थ्री सर्कल्स ऑफ़ हेल से मुक्त कर बाहर निकाल लाते हैं । वर्ष 2013 की 25 जनवरी को काइरो की ऑपेंटिश (OpAntiSH) टीम को तहर्रुश की 19 घटनाओं की सूचना मिली जिसमें से उसने 15 घटना स्थलों पर पहुँचकर शिकार हुयी महिलाओं को उन्मादी भीड़ से बचाने में सफलता प्राप्त की । हमें यह जानकर ख़ुशी हुयी कि इंसानियत और अपनी प्राचीन सभ्यता को बचाने के लिए मिस्र के लोग “कड़ी निन्दा” की खानापूर्ति से आगे बढ़कर कुछ परिणाममूलक प्रतिक्रियात्मक कार्य भी कर रहे हैं ।

काश ! हमारे देश में भी ऐसा कुछ हो पाता !


 काइरो का तलात हर्ब स्ट्रीट जहाँ होती हैं तहर्रुश की घटनायें

3 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. यह भयंकर है ...और अब हमारे देश में भी है । हम चुप हैं और भारत अरब बनता जा रहा है । भारत को अरब बनने से रोकने की इच्छा शक्ति भी हमारे अन्दर नहीं है ।

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  2. भारत में भी आए दिन स्त्री के प्रति होने वाले इस भयंकर पाश्विक अत्याचार को रोकने के लिये अत्यन्त कठोर दंड का विधान होना चाहिये, जो जनसमूह के समक्ष दिया जाए,जिससे ऐसे लोगों में भय उत्पन्न हो। अन्यथा बार बार ऐसी दुर्घटनाएँ होती रहेंगी । दंड भी यथा शीघ्र दिया जाना चाहिये।ये विवरण
    पढ़कर मन काँप गया।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.