रविवार, 2 जुलाई 2017

हाथी के दाँत



लालू के खेत में
धान तो हुआ
पर वह बीज नहीं हुआ ।
नार में लगी थीं 
ढेरों लौकियाँ
बीज भी निकले थे ढेरों
पर उगा नहीं एक भी ।
किसान के खेत में उपजे बीज
अब उगा नहीं करते
फ़ैक्ट्री में बनने वाले बीज
उगा करते हैं ।
सबने देखे हैं हाथी के दाँत
दिखाने के और
खाने के और,
अब देख रहे हैं बीज
उगाने के और
खाने के और ।
गेहूँ, मक्का, धान, माष, मूँग, अरहर,
लौकी, पालक, परवल, भिण्डी, टमाटर  
सारे बीज षंढ हो गये हैं
जिन्हें खा-खा कर
मनुष्य भी षंढ हो गये हैं ।
नर और नारी
अब केवल ऑफ़िस में काम करेंगे
झोपड़ी की झुनिया खेत बनेगी
अपनी कोख किराये से देगी ।  
अब बीज की तरह
स्पर्म और ओवम भी फ़ैक्ट्री में बनेंगे
किसान के बीज
हाथी के दाँत हो गये हैं
पति और पत्नी
बंजर खेत हो गये हैं ।


2 टिप्‍पणियां:

  1. आधुनिकता या औद्योगीकरण की विभीषिका है और आपके शब्दों का चमत्कार सड़ा सिर झुकाने को बाध्य कर देता है कौशल भैया! प्रणाम करता हूँ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (04-07-2017) को रविकर वो बरसात सी, लगी दिखाने दम्भ; चर्चामंच 2655 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.