मंगलवार, 1 अगस्त 2017

यात्रा अभी शेष है...

                        पार करना था सागर
नापते रहे पगडंडियाँ
सरिता के तीर   
जो बनायी थीं कभी
सात समन्दर पार के लोगों ने ।
हर पगडंडी से
फूटती जा रही हैं
कुछ और पगडंडियाँ ।
हम चुनते रहे बीज
रास्ते के खरपतवारों से । 
झोली भरती गयी
भार बढ़ता गया
पैर बोझिल होते गये
अब,
और चला नहीं जाता । 
इस बीच
जो मिला
मुरझाता गया
आते ही हाथ में,
जो नहीं मिला
वह था आनन्द ।
मन
नहीं हो सका कभी निर्मल
आनन्द आता भी तो कैसे !
बीत गये
दिन, वर्ष और युग...
नहीं आया तो बस
एक स्वर्णिम क्षण !
यात्रा अभी शेष है ...