बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

अबय और खेलओ होरी

 
काये कों चुप गोरी इतैं आओ री, मन मोरे बसीं, ना कितैं जाओ री।
बात सुनी कछु अँखियन मोरी, खोयी-खोयी लागय तू मोहें और भोरी॥
 
 
कैसे आये अमवा में बौर सखी, बन्दी तेरी देहिंया में फागुन री !
गैल-गैल फैल गयी अब बात री, छोड़ दै फगुना तू, मोरी मान री !



 पोर-पोर तोरे फागुन झूमय, झूम रहे लख-लख होरियारे।

  चढ़ी अटरिया गोरी बोलावय, अइयो न कोऊ मोरे द्वारे॥ 
 
 
रंग डारबें को आयीं, रंग डरबाबें आयीं।
     रंग डारियो ना मों पै, झूठ-मूठ बोलन आयीं॥  


 

मुड़-मुड़ नैन सों सैन चलावे, मौन अधर सों राग सुनावे।
नैनन सों जब दयी पिचकारी, बीच सखियन कें लाजन मरी॥  
 
 
रंग डारियो ना मों पै, सैन सों बुलावे गोरी।



मोरे रंग डूबी बोली, अबय और खेलओ होरी॥



लाज सों गाल रंगे देख कें, आय गयो फागुन जरन मारे।
तन-मन सें तू कुबेर गोरी, फागुन संग काये कों रार तोरी॥
 
 

 
गोरी-कारी-साँवरी, सब होरी में है गयीं बाबरी।
नेक ठहर, मत एक झलक दै मोरी गली सें जाओ री ॥
 

होरी हैssssssssss

 

 

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

महान लोगों के लिये आचरण की शिथिलता का आरक्षण


    मेरठ से चर्मरोग विशेषज्ञ डॉक्टर अनुराग जी ने एक प्रश्न उठाया है क्या महान लोगों को उनके शिथिल आचरण के लिये सामाजिक स्वीकृति मिल जानी चाहिये ?
    प्रायः देखा गया है कि कोई कलाकार/साहित्यकार/राजनीतिज्ञ जब वट वृक्ष बन जाता है तो वह महानता के बोध से ग्रस्त हो जाता है ....उसकी सोच अपने तक ही सीमित हो जाती है ...वह पूरी दुनिया को अपने तरीके से चलाने के स्वप्न ही नहीं देखने लगता बल्कि कई बार चलाने के प्रयास भी करने लगता है। जीवन तरंगमय है.... इस दर्शन के साथ जीवन की लहरों को मुग्धता से निहारने वाली पूजा के अनुसार कलाकार का लेखन आदर्श और कालजयी होना चाहिये ...समाज के लिये इतना ही पर्याप्त है ..उसके व्यक्तिगत जीवन में आदर्श का आग्रह न किया जाय क्योंकि कोई भी व्यक्ति पूर्ण और निर्दुष्ट नहीं हो सकता। उनका तर्क यह भी है कि कोई कलाकार जीवन की विसंगतियों, विषमताओं और अभावों में से मोती चुनने का प्रयास करता है ...इस प्रयास में वह कहीं विद्रोही होता है तो कहीं समाज के बन्धनों को तोडता है......उसका लीक से हटकर चलने का प्रयास ही उसके अन्दर के कलाकार को जीवित रखता है। जीवन को देखने और उसे जीने का एक ज़ुदा अन्दाज़ ही तो उसे कलाकार ( साहित्यकार या राजनीतिज्ञ) बनाता है. यदि उसकी कृति समाज के लिये किसी भी प्रकार से कल्याणप्रद है तो उसके व्यक्तिगत जीवन की लीक-तोड छवि को भी सामाजिक स्वीकृति मिलनी चाहिये....केवल उसी के लिये .......एक आरक्षण की तरह विशिष्ट सुविधा।
   अनुराग जी इसका खंडन करते हुये कहते हैं कि क्या किसी व्यक्ति को उसके आचरण की शिथिलता के लिये इस कारण से छूट मिलना उचित है कि वह महान है ? उन्होंने गान्धी के ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के औचित्य पर भी प्रश्न उठाया है और इसे नैतिकता से जोडते हुये भारतीय समाज में गान्धी की महानता के कारण इस आचरण की स्वीकृति पर आपत्ति की है। महान कलाकारों की सुरा-सुन्दरी के प्रति आकर्षण की वृत्ति से समाज का किस प्रकार का कल्याण सम्भव है?

    मुझे अनुराग जी की बात पूरी तरह उचित लगती है. कोई भी व्यक्ति कितना भी गुणी और महान क्यों न हो उसे समाज की निर्दुष्ट व स्वस्थ्य परम्पराओं के उल्लंघन का अधिकार या इस प्रकार की शिथिलता नहीं दी जा सकती। कालजयी साहित्य का रचनाकार यदि स्वयं स्वस्थ्य परम्पराओं के निर्वहन में शिथिल रहा है तो उसके प्रवचन का क्या मूल्य ? हम कैसे आशा करें कि उसके पाठक उस साहित्य को पढकर कोई नयी रचना ...कोई नयी क्रांति कर सकेंगे ? हमारे देश में तो वेद-पुराण-ब्राह्मण-स्मृति ....क्या नहीं है ? ...समाज में कितनी क्रांति हो पायी .....जीवन में कितनी पवित्रता आ पायी ? और यदि पथ-प्रदर्शक स्वयं ही पथ-विचलित हो तो उसके अनुयायियों से क्या आशा की जा सकेगी?
    इससे भी बडी बात यह है कि आचरण की शिथिलता को सामाजिक आरक्षण मिल जाने से उन पैमानों का क्या होगा जिनकी हम दुहायी देते हैं? इस प्रकार का आरक्षण भटकाव को और भी गति देगा, तब आदर्शों का दीप स्तम्भ और होगा किसके लिये ? वह प्रकाश देगा किसे ? क्या सारे आदर्श केवल निरीह आम आदमी के लिये ही होंगे ? समाज की दृष्टि बडी तीक्ष्ण होती है, गुणों से अधिक वह दूसरों के दुर्गुणों पर ध्यान देता है। अयोध्या के धोबी आज भी पूरे समाज में हैं ...और बडे ही सशक्त तरीके से हैं जो किसी भी महान व्यक्ति पर सन्देह करने से नहीं चूकते।  

    आज ३ मार्च, २०१२ को खुशवंत जी का एक लेख और एक अन्य समाचार पढ़ने के बाद कुछ टीप और जोड़ने का मन हुआ, अस्तु  ...

     आज के दैनिक भास्कर में खुशवंत जी ने एक लेख लिखा है- "एक राजनेता की कविताई" | ये राजनेता हैं कपिल सिब्बल। खुशवंत जी ने सिब्बल की चार कविताओं के नमूने भी पेश किये हैं। आज भारत के आम जन मानस में सिब्बल की छवि अच्छी नहीं है। कविताएं अच्छी हैं पर उन्हें पढ़ने के लिये मुझे अपने मन को बहुत मनाना पडा। लोग कथनी और करनी देखना चाहते हैं...तराजू पर उनको तौलना चाहते हैं। वे नेता हैं पर जननायक नहीं बन सके....और किसी नेता की कविता को कौन पढ़ता है?
दूसरी खबर है इसी के साप्ताहिक नवरंग में अनिल राही की लिखी कवर स्टोरी "छोटे नवाब बड़े खराब"| आप समझ गए होंगे यह कहानी सैफ अलीखान की मारपीट के किस्सों और अमृता के प्रति वेबफाई से भरी है| बताया गया है कि सैफअली फ़िल्मी दुनिया के लोगों में भी अपने विवादास्पद आचरण के कारण अच्छी छवि नहीं बना सके| परदे पर ऐसे लोगों के आदर्श चरित्र जनमानस में अधिक समय तक नहीं ठहर पाते|
   रेणु जी और शरत के मामले में यह बात नहीं है, उन्होंने देश और समाज के बारे में सतत चिंतन ही नहीं किया बल्कि अपने स्तर से देश और समाज के लिए जितना कर सकते थे उतना करने का प्रयास किया| कौन नहीं जानता कि आपातकाल में पुलिस की बर्बर पिटाई के बाद रेणु जी फिर कभी उठ नहीं सके| तत्कालीन शासन ने रेणु जी की ह्त्या की थी इससे कौन इन्कार करेगा?     

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

शहर का गौरव ...डॉग शो


श्वानों को मिलता दूध वस्त्र भूखे बालक अकुलाते हैं ...

छत्तीस गढ़ के इस छोटे से शहर में कल श्वान प्रदर्शनी का आयोजन किया गया ....वह भी राज्य स्तरीय ....पूरे राज्य के श्वान अपने-अपने स्वामियों के साथ आये. भाँति-भाँति के श्वान .....सब संकर प्रजाति के....एक भी श्वान कुपोषित नहीं था ...क्योंकि उनमें से एक भी न तो देसी था और न किसी धोबी   का.
........ऊपर वाले ने अपने रोज नामचे में दर्ज किया " मनुष्यों को इन श्वानों से कुछ सीखना चाहिए ....पर नहीं... ये अभी तक अपने बच्चों को सुपोषित करना भी नहीं सीख पाए ...और तुर्रा यह कि हम मनुष्य सभी प्राणियों में सर्व श्रेष्ठ हैं ......हुंह ! लानत है ऐसी श्रेष्ठता पर...."     

श्वानों ने एक-दूसरे को देखा पर किसी ने भी बात नहीं की आपस में ...अलबत्ता एक-दूसरे को गालियाँ ज़रूर दीं ...वह भी जी भर के. १० नंबर इसके भी थे न !  

यहाँ भी पक्षपात ....मुझे इनाम ही नहीं दिया ....सुबह से अपने सभी स्वजातियों पर भौंका हूँ.....और क्या चाहिए इन्हें ?   साले ! आदमी कहीं के !

मेरे पास से गुजरना भी मत ...काट खाऊंगा हाँ !

कमाल है ! डॉग शो करूँ  मैं और मेरा इनाम ले जाएँ ये आदमी प्रजाति के बेईमान लोग ! लालची कहीं के
 !

पुरस्कार से सम्मानित हो कर मंच से प्रस्थान करता एक श्वान ....

अन्य सभी संस्कारित श्वानों की तरह मुझे भी हिन्दी या छत्तीसगढ़ी नहीं आती ...मैं केवल आंग्ल भाषा में ही पारंगत हूँ. यदि आप हिन्दी में बात करना चाहते हैं तो किसी भी गली के देसी कुत्ते से मिल सकते हैं. हाँ ! धोबी के कुत्ते से मत मिलना उसे कुछ भी नहीं आता .... 

खुले में खज़ाना

यह विषय राहुल जी का है ...अतः आज मैं केवल मूर्तियों के चित्र ही प्रस्तुत कर रहा हूँ .......
इस टिप्पणी के साथ ...कि इनमें से कुछ मूर्तियाँ बिना किसी देख-रेख के बाहर पड़ी हैं.....
कुछ वर्ष पूर्व रायपुर में कुछ प्रतिष्ठित लोग मूर्ति तस्करी के आरोप में पकड़े गए थे ....बाद में अपराध प्रमाणित नहीं हो सका .....जबकि मूर्तियाँ उनकी कार में से ही बरामद की गयी थीं ...
शुक्र है कि मूर्तियाँ भगवान के भरोसे अभी तक सलामत हैं ........







ऊपर की तीनो मूर्तियाँ सड़क के किनारे एक ही स्थान पर रखी हुयी हैं......स्पष्टतः लोग उनकी पूजा करते हैं ...पर सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है









ये पांचो मूर्तियाँ गढ़िया पहाड़ के ऊपर के मंदिर में हैं और सुरक्षित हैं

 
 
 
नंदी के चित्रों से स्पष्ट है कि यह मूर्ति शहर से बाहर एक तालाब के किनारे रखी हुयी है ....सुबह शाम को छोड़कर यह स्थान प्रायः निर्जन ही रहता है......हाँ मद्य सेवी अवश्य कभी भी दिखाई पड़ सकते हैं.

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

बाज़ार बहुत बड़ा है.......


दृश्य एक -
मद्यपी पिता और श्रमिक माता की किशोर होती कन्या पर कृपालु दृष्टियों की झमाझम होती वारिश ....वारिश में भीगती किशोरी.....माँ की विवशता  ...पिता की पाशविकता.....कुछ  लालच ....कुछ हिंसा ....  मृत शरीरों का जीवित बाज़ार .....पीड़ाके मोल 
बिकते आनंद की विवशता .....शून्य संवेदना के साथ विकसित होती सभ्यता ......बड़ी खामोशी से दौड़ता व्यापार और स्टेटिस्टिक्स का यह प्रमाण कि हम हर स्तर पर पहले से कहीं अधिक सभ्य और विकसित हुए हैं.

दृश्य दो-
स्वयं की भोगी अवर्णनीय पीड़ा की पुनरावृत्ति को चुपचाप देखने की एक और पीड़ा का सागर .....सागर के खारे पानी में डूबती आशाएं ....तैरती परम्पराएँ .....परम्पराओं से फलते धन कुबेर ....और धन कुबेर की आँखों में बसी किसी सभ्य के पाप की किशोर होती एक और बेटी ...जोकि बेटी नहीं ...... एक माल है....

दृश्य तीन -
मंदिरों में बजती घंटियाँ....मंत्रोच्चारण से पवित्र होता वातावरण .....वर्ष में दो बार नवरात्रि पर स्त्री शक्ति की पूजा का पाखण्ड .....कन्या भोज ...भोज से पूर्व कन्याओं के चरण प्रक्षालन का पुण्य लूटते लोग ...
जिस देश में कन्या को देवी का स्वरूप मान कर उसे पूजा जाता हो वहाँ प्रथम दो दृश्य केवल कल्पना या मिथ्या आरोप जैसे नहीं लगते आपको ? यदि ये आरोप मिथ्या नहीं हैं तो हम सब घोर पापी हैं यह सत्य स्वीकारना होगा. यह मैं नहीं कहता .....न जाने कितनी मासूम फलक ...कितनी मंजू.....कितनी विमला ...कितनी राधा ....कितनी भंवरी बाई
...कितनी ......बाज़ार बहुत बड़ा है किस किस के नाम गिनाऊँ ? 
मंदिरों में पत्थर की देवियाँ क्यों होती हैं ....अब मैं समझ गया हूँ .......वे अपने प्रतिरूपों की पीड़ा सह नहीं सकती न ...इसीलिये.....  

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

खुशबू बसी हुयी है जड़ में ....



श्रीमती जी को वह गज़ल बहुत पसंद है ...खुशबू जैसे लोग मिले ......

ग़ज़ल सुनते-सुनते मुझे छेड़ बैठना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है, पूछेंगी-  "क्यों, आपको मिला कभी कोई खुशबू जैसा ......."
प्रायः मैं उन्हें देख कर मुस्कराता भर रहता हूँ और वे छेड़ती रहती हैं. पर आज ऐसा नहीं हुआ, मैंने कहा - "तुम्हें पता है, मुझे खुशबू बसी जड़ें मिली हैं....."
उन्होंने मुझे पलट कर देखा, "खुशबू बसी जड़ें ? ...अच्छा-अच्छा....हाँ क्यों नहीं ....मेरी सौत जो न करे ...." (बहुत पहले खूब नाक-भौं सिकोड़ने ...झगड़ा करने ...रूठने-मनाने आदि समस्त क्रियायों के बाद अंततः उन्होंने लैप टॉप को अपनी सौत स्वीकार कर लिया था. ) 
मैंने स्वीकार किया, "हाँ ! माध्यम तो यही है पर मुझे जड़ें मिल गयी हैं .....खुशबू से सराबोर पुख्ता जड़ें ....खुशबू जैसे लोग तो मिल कर कब हवा के झोंके के साथ छू हो जाएँ कोई ठिकाना नहीं ...पर जड़ें कहाँ जायेंगी ?"
उन्होंने मुस्कराकर पूछा - "कौन है ?" 
मैंने कहा, "एक दो हो तो बताऊँ....."
उनकी भृकुटि कुछ चढ़ी, " अच्छा...तो आठ दस गिना डालिए ..."
इसी  बीच मुझे सारिवा दिखी, 
                                               सारिवा, अनंतमूल, Hemidesmas indicus 
....दिखाते हुए कहा- "इसे देखो .... ऊपर से कितनी पतली दिखती है ..खरपतवार जैसी.... पर खोद कर देखो तो गहरे में मोटी सी जड़ मिलेगी  ....वह भी खुशबू से भरपूर ....तभी तो इतनी गुणवान है यह. ऐसे ही हैं हमारे सलिल भैया, मनोज भैया, देसिल बयना वाले करण, अजय, जेन्नी और अब पूजा .........."
उन्होंने पूछा, "ये अंतिम वाला नाम नया सा लगा रहा है ?"
मैंने कहा - " हाँ ! सारिवा की एक और जड़ ....मैंने खोद कर निकाला है इन सबको .....जिस तरह सारिवा रक्तशोधक है उसी तरह ये लोग भी अपनी माटी के सोंधेपन में रचे-बसे अपनी सतह से दूर धरती में गहरे धंसे हुए ठेठ  गाँव की कोरी खुशबू को अपनी संस्कारित जड़ों में बसाये आवारा होती जा रही परम्पराओं के शोधक हैं. सारिवा की नाज़ुक बेल की तरह इनके देसी मन परदेसी धरती में भी अपनी सम्पूर्ण नाजुकता के साथ पनप रहे हैं .....कृत्रिम श्रृंगार से दूर...जो है जैसा है उसी को पहने-ओढ़े परम आनद में डूबे ...चारो ओर खुशबू बिखेरते अपनी ही रौ में बहे चले जा रहे हैं. इन्हें अपनी फटी बनियान भी दूसरों को दिखाने में लेश भी संकोच नहीं होता ...क्यों हो ? इसी असलियत के लिए तो तरसते हैं लोग .....ऐसी निश्छलता ....ऐसा साहस .....ऐसा प्रेम और स्वीकारने की ऐसी अपूर्व क्षमता और कहाँ मिलेगी भला ! ये लोग सांचे में बंधे साहित्यकार नहीं हैं जो शीर्ष पर चढ़कर इतराते हैं बल्कि साहित्य के प्राण हैं जो साहित्य को अपने खांटीपन से सींचते हैं और किसी दिन "मैला आँचल" की खुशबू बन कर पूरे समाज पर छा जाते हैं. नेपाल की सीमा से लेकर दिल्ली और सुदूर दक्षिण के कर्नाटक तक फ़ैली सारिवा की इन जड़ों ने बिहार की आत्मा को जीवित रखा हुआ है .  लीक से हटकर चलने के लिए  ....वर्त्तमान की वर्जनाओं को तोड़ने के लिए जिस क्रांतिकारी ऊर्जा की आवश्यकता होती है उससे भरपूर हैं ये लोग. इसका  उदाहरण पूजा उपाध्याय से अच्छा और कौन हो सकता है ? साहित्य के इन देसी प्राणों को मेरा शत-शत नमन !!!         




मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

सुनो! मैं कविता हूँ


 

- सुनो!  मैं कविता हूँ 
- अरे, मुझे नहीं जानते ?.....सीधी-सादी कविता .....आपकी अपनी चिरसहचरी ....सदा गुनगुनाती रहने वाली ......
"हाँ-हाँ ! जानता हूँ तुम्हें, वही न ......जो व्याकरण की जंजीरों से जकड़ी हुयी ....न जाने कैसे कैसे शिल्प से बुनी ....अलंकारों की माला से सजी-धजी  .....नियंत्रण के पाजेब खनखनाती हुयी ...संभल-संभल कर नव विवाहिता की तरह मंथर गति से चलती हुयी......आम आदमी से दूर-दूर भागने वाली ......विशिष्टजन-प्रिया......मस्तिष्क की तेज रेती से घिस कर धारदार बनायी गयी ...हृदय से भावों की भीख मांगती हुयी ...... और ......."
और क्या ?
"और .....इसके बाद भी समीक्षाकारों की कोप दृष्टि से सदा पीड़ित रहने वाली ....."
- हाँ ! कविता तो वह भी है ...पर वह शहर की है ....उसे सजना संवरना अच्छा लगता है. मैं तो दूसरी हूँ .....गाँव वाली कविता.....हृदय के सहज झरने से झरती एकदम अल्हड़ ......हर पुष्प को स्पर्श करते वसंत के सुवासित पवन की तरह झूमती हुयी, नदी की तरह इठलाती हुयी, झरने की तरह खिलखिलाती हुयी...........मुझे अपना मार्ग मालुम है ......मैं खुद जो बनाती हूँ उसे. दूसरों की बनायी सड़क पर पर क्या चलना.......टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी पर झूमते हुए चलने में जो आनंद है वह पक्की सड़क पर चलने में कहाँ ?  
-सुनो ! नदी ने फिजिक्स पढी है कभी ? तो फिर ......क्या उसे गति के सिद्धांतों की जानकारी के अभाव में चलना-बहना मना है ? तुम्हारी जो शहर वाली है न ! वह तो कार की तरह चलती है ...यंत्रवत .....बनी-बनायी सड़क पर ....नियंत्रित गति से ....कहीं दुर्घटना न हो जाय इस डर से सहम-सहम कर चलती हुयी......कहीं मेकअप न बिगड़ जाय इस डर से सहज आनंद से वंचित  ...  
-क्यों, क्या मैं उस शहर वाली से कम सुन्दर हूँ ?   

सौन्दर्य का स्वरूप


 
सौन्दर्य का पुजारी हूँ मैं ......मुझे वह चाहिए......
इस असुन्दरता की भीड़ में कहाँ से खोजूँ उसे .....? 
"किन्तु रुको, खोजने से पहले उसके बारे में कुछ पता तो कर लें ...खोजने में सुविधा रहेगी ..."
यह सौन्दर्य है क्या .....? कैसा दिखता है.......? किसने देखा है उसे ......? कहाँ रहता है ......?
शायद बहुत सुन्दर दिखता होगा ...तभी तो पूरी दुनिया पागल है उसके पीछे. 
चलिए , सौन्दर्य से ही पूछते हैं ......किन्तु वह मिलेगा कहाँ ? कहाँ ढूंढेंगे हम उसे ?
अच्छा, उस सुन्दर लड़की से पूछते हैं, उसे तो पता होगा ही सौन्दर्य का पता .....

"ए सुन्दर लड़की ! ज़रा बताना तो भला ...सौन्दर्य का पता ..."
"क्या कहा ? सुन्दर लड़की ! मैं सुन्दर लड़की हूँ ? पर अम्मा तो कहती हैं करमजली ........नहीं-नहीं .....आपको भ्रम हुआ है ......मैं सुन्दर नहीं ...सुन्दर होती तो क्या करमजली होती ....जाइए किसी और से पूछ लीजिये सौन्दर्य का पता .....मैं सुन्दर होती तो आपको ज़रूर बताती ....."

चलो, सरोवर में खिले इन पद्म पुष्पों से पूछते हैं .....उपवन में खिले इन तरुणी पुष्पों से पूछते हैं ........इन रंग बिरंगी तितलियों से पूछते हैं .......
अरे ! कोई भी नहीं बता पा रहा .......
चलो, हिमालय से उतरती ...बलखाती ..इठलाती ...इस नदी से पूछते हैं ...कितनी सुन्दर लग रही है ...इसे ज़रूर पता होगा ....
अरे ! यहाँ भी निराशा ...किसी को नहीं पता सौन्दर्य का पता. सब किसी न किसी बात को लेकर असंतुष्ट हैं ...अतृप्त हैं .....दुखी हैं ......
फिर......... कहाँ खोजूँ, किससे पूछूँ ...?
........................................................
"मैं यहाँ हूँ ..?"
" कौन हैं आप ....? और कहाँ हैं ?
"सौंदर्य हूँ मैं......और यहाँ हूँ ....."
"कहाँ भाई ? मुझे तो यहाँ आसपास दूर-दूर तक कहीं कोई दिखाई नहीं देता  ...कहाँ हैं आप ? कैसे दिखते हैं ...? कैसे पहचानूंगा आपको ?"
"जैसे सूरदास ने पहचाना था ......उसके लिए इन आँखों से काम नहीं चलेगा..... मुझे देखने के लिए दूर-दूर तक देख रहे हो इसीलिए तो दिखाई नहीं पड़ रहा हूँ मैं...यहीं देखो अपने पास ...अपने अन्दर ......जिस कोण से और जितना देखना चाहोगे मुझे .....वैसा ही .....और उतना ही दिखाई पडूंगा मैं "
"अपने अन्दर ? अपने अन्दर कैसे देखूं भला ? और कैसे पहचानूँ कि जो मेरे अन्दर है वह सौन्दर्य ही है ...वहाँ कोई और भी तो हो सकता है ....जैसे कुरूप, विद्रूप...या ऐसा ही कोई और ..."
" ठीक कहते हो, वहाँ और भी कई लोग हैं ...किन्तु जब मैं वहाँ रहता हूँ तब ये कोई वहाँ नहीं रहते .....मैं तो अकेला ही रहता हूँ ...मेरी अनुपस्थिति ही उनकी उपस्थिति है ...तुम तो केवल मुझे ही देखते रहो ...बस, मैं उपस्थित रहूँगा ....जिस क्षण मुझे नहीं देखोगे मैं अनुपस्थित हो जाऊंगा .....तब मेरे स्थान पर अन्य लोग होंगे ...."
"तो आपके अनुसार वह सुन्दरी सुन्दर नहीं है....वे पद्म और तरुणी पुष्प भी सुन्दर नहीं हैं ....नदी भी नहीं ...जिसके सौन्दर्य को मैं घंटों बैठकर निहारता रहता हूँ .......?"
" हाँ ! बात तो यही है .....बाहर कुछ भी सुन्दर नहीं है. सौन्दर्य यदि बाहर होता तो लोग उसके लिए इतने परेशान न होते .......उठाते और ले आते अपने घर या संपन्न लोग मूल्य देकर ले आते  ...और खुश हो लेते ........जिसे तुम सुन्दर मान कर उठा लाते हो कुछ समय बाद वह मुरझा जाता है ...तब वह भार लगने लगता है आपको .....आप उससे मुक्ति का प्रयास प्रारम्भ कर देते हैं ...फिर प्रयास करते हैं किसी दूसरी चीज़ के लिए ....कुछ समय बाद उससे भी मन भर जाता है ....फिर उससे भी मुक्ति का प्रयास ......यह श्रंखला बढ़ती ही रहती है....." 
"तो क्या तुम कभी मुरझाते नहीं ? देवताओं की तरह चिर युवा ही बने रहते हो ? "
"हाँ ! मैं अक्षय हूँ ...सनातन हूँ ....कभी मुरझाता नहीं ......पर ....."
"पर क्या ?"
"पर यह .......कि जब तुम मुझे देखना बंद कर देते हो तो मैं हो कर भी ठहर नहीं पाता...मुझे जाना पड़ता है वहाँ से ...."
"तो इसका अर्थ यह हुआ कि मैं निरंतर तुम्हें ही देखता रहूँ ....ताकि तुम बने रहो और हमें सौन्दर्य बोध होता रहे .."
"हाँ "
"किन्तु यह कैसे संभव है ...मुझे और भी तो काम हैं ....तुम्हारी ही नाड़ी पकड़ कर कैसे बैठा रहूँ ?"       
" तो फिर देखो ...कुरूपता और विद्रूपता को भी देखो ...उसकी भी नाड़ी पकड़ते रहो ...फिर यह न कहना कि सौन्दर्य चला गया ...तुम एक बार में केवल एक चीज़ ही देख सकते हो ....या तो मुझे देख लो या फिर मेरे अभाव को "
" हे सौन्दर्य बोध जी ! आपने तो सारा दारोमदार मेरे ही ऊपर डाल दिया....कि मैं देखूँ तभी तुम दिखायी पड़ो अन्यथा नहीं. "
"सत्य यही है .....और यह भी तुम्हारे चाहने पर ही निर्भर करता है कि तुम इसे स्वीकारते हो या नहीं"
" मनुष्य हूँ ....मन चंचल है ...कभी एक बिंदु पर ठहरता ही नहीं .....केवल तुम्हें ही कैसे देखता रहूँ ?
"तो ठीक है ...फिर मेरे लिए दुखी भी मत होना कभी"
" यह भी तो संभव नहीं मेरे लिए"
"प्रयास करोगे तो संभव होगा ...अन्यथा नहीं ..."   

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

सहमत न होने के बाद भी ....


    
    एम. डी. मेडिसिन सेकेण्ड इयर के अध्येता डॉक्टर गोरेलाल का मन आज कुछ उखड़ा-उखड़ा था, राउंड के समय इनडोर में मरीजों के साथ पूरा न्याय हो सके इसलिए राउंड में जाने से पहले छदामी की दूकान से एक सिगरेट ले कर सुलगाई और कोशिश की कि धुएं के साथ चीनी की स्मृति को भी कुछ नहीं तो कम से कम राउंड भर के समय तक के लिए तो उड़ा ही दे. पर ऐसा हो नहीं सका. वे चीनी से जितनी दूर भागने की कोशिश करते वह उके उतनी ही नज़दीक आ जाती. आखिर में उन्होंने सिर को एक झटका दिया, गोया वर्षा में भीग गयी कोई चिड़िया अपने परों को फड़फड़ा कर पानी की बूंदों को झटक रही हो .......और फिर वे अपने विचलित मन को हठ योग का सहारा दे कर इनडोर में दाखिल हुये. 
    बेड नंबर ३७, सरिता देवी.......सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस ........दिमाग पर चीनी ने फिर हमला कर दिया.......
   कितनी बार कह चुकी थी, सर कभी बटरफ्लाई लीजन दिखाइएगा ...मैंने आज तक नहीं देखा. 
   हुंह ...जब देखने का वक़्त आया तो भाड़ में चली गयी मरने. ऐसे मरीज कोई रोज-रोज आते हैं ....दो दिन हो गए सूरत नहीं दिखाई ...जानता हूँ बैठी होगी लाइब्रेरी में...मरने दो .....
   बेड नंबर ६४, सरबजीत सिंह, मायोकार्डियल इनफार्कशन......दिमाग में चीनी फिर कूद कर आ गयी. कभी एक भी कार्डियक पेशेंट छूट तो जाए भला चीनी से .......सर आपके साथ रहूँगी तो कार्डियोलोजी में भी कुछ सीख लूंगी .....आपकी तो पता नहीं किस-किस में मास्टरी है ....
   खूब काले और बहुत नाटे डॉक्टर गोरेलाल को अपनी शारीरिक बनावट के प्रति ईश्वर से गंभीर शिकायत थी ...किन्तु अपनी इस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने जो उपाय अपनाया था वह काबिले तारीफ़ था. तभी तो इतनी सुन्दर ...दूध धुले रंग वाली चीनी उनके पीछे पड़ी रहती थी. नाम उसका चीनी था पर वह नाटी बिलकुल नहीं थी....हरियाणा की थी ...खूब लम्बी .....बस आँखे भर चीनियों जैसी थीं उसकी ....बचपन में रखा गया दुलार का नाम अब सील मोहर लग कर पक्का हो गया था. गोरेलाल को अपने माता-पिता से भी शिकायत थी .....वे अक्सर कहा करते, पता नहीं क्या सोच कर यह नाम रखा गया मेरा ....मेरा यह नाम मुझे हमेशा चिढ़ाता रहता है. 
उन दोनों की जोड़ी पूरे कॉलेज में मशहूर थी ...पूर्णिमा और अमावस की जोड़ी के नाम से.
   बचपन में अपने दुबले-पतले शरीर और बदसूरत चेहरे के कारण साथियों से उपेक्षित रहे गोरेलाल ने कभी यह प्रतिज्ञा की थी कि एक दिन मैं ऐसा बनूंगा कि लोग मेरे पीछे भागेंगे ....वही हुआ भी. राउंड पर जाते समय यू.जी और पी.जी वाले कितने ही लडके-लड़कियाँ उनके पीछे लगे रहते थे. पर डॉक्टर गोरेलाल ने सबसे अधिक जिसे घास डाली वह थी पी.जी. फर्स्ट इयर की ख़ूबसूरत चीनी. लाइब्रेरी में उन दोनों को अक्सर देखा जा सकता था. दोनों आमने-सामने बैठते. चीनी चेयर पर और गोरेलाल एक ऊंचे से स्टूल पर ...इसके बाद भी गोरेलाल को जब  कभी चीनी से कुछ कहना होता था तो सिर ऊपर उठाये बिना काम नहीं चलता था. राउंड पर जाते समय चीनी की उंगली पकड़ कर चलते गोरेलाल ऐसे लगते जैसे कि कोई बच्चा अपनी अम्मा के साथ जा रहा हो. 
    आज वही चीनी पिछले दो दिन से गायब थी......गोरेलाल को गुस्सा आ रहा था ...हुंह यह भी कोई बात हुयी .......मेरे प्रस्ताव पर कोई आपत्ति थी तो सीधे से मना भी तो कर सकती थी ...मैं कोई जबरन शादी  करने तो जा नहीं रहा था ....प्रस्ताव ही तो था. मैं जानता हूँ ...मुझे कोई पसंद नहीं करेगा ...सब स्वार्थी हैं ...सब मुझसे लाभ भर लेना चाहते हैं .....ज़िंदगी भर साथ कोई नहीं देना चाहता. शरीर की इतनी अहमियत है क्या ? 
    गोरेलाल बाहर आ गए ...ओ.पी.डी. की तरफ नहीं गए ....एच.ओ.डी. ने बुलाया था ...उधर भी नहीं गए. इन दो दिनों में चीनी के बिना जैसे उनकी दुनिया ही सूनी हो गयी थी. कितनी स्वार्थी होती हैं ये लड़कियाँ ....सोचते-सोचते वे कैम्पस से बाहर आ कर छदामी की दूकान की ओर बढ़े .....
    चीनी को बुरा लगता है उसका सिगरेट पीना ......लगता है तो लगता रहे ....उसे इतनी ही परवाह थी तो पिछले दो दिनों से कोप भवन में क्यों पड़ी है ..... 
    छदामी ने गोरेलाल को देखते ही उनकी मनपसंद सिगरेट निकाल कर आगे बढ़ा दी. सुलगा कर पहला कश लिया ही था कि एक ऑटो सामने आकर रुका.....एक जानी-पहचानी खुशबू वातावरण में फ़ैल गयी .....भक्क सफ़ेद सूट पहने चीनी उतरी....परी जैसी .....सफ़ेद सूट में कितनी सुन्दर लगती है ये मरी चीनी ....गोरेलाल हड़बड़ा गए. फिर उपेक्षा भाव से, अनायास ही पीछे छिपा ली गयी सिगरेट बड़े आराम से सामने निकाल कर कश खींचने लगे ......
   चीनी ने देखा ....डॉक्टर गोरेलाल कुछ अजीब तरह से सिगरेट पी रहे हैं.....
   वह उनके पास गयी और धीरे से कहा - सर  ! एक मिनट .....
   गोरेलाल जी आज्ञाकारी बालक की तरह चीनी के पीछे चल दिए. एक ओर ले जाकर चीनी ने एक झटके से उनकी उँगलियों में फंसी सिगरेट खींच कर फेक दी ...फिर बिना कुछ कहे आगे बढ़ गयी. डॉक्टर गोरेलाल ठगे से खड़े रह गए .....थोड़ी देर तो वे चीनी को जाते देखते रहे ...फिर खुद भी लाइब्रेरी की तरफ बढ़ लिए....डॉक्टर चीनी से यह पूछने के लिए कि वाकई तुम्हें अभी भी परवाह है मेरी  ...मेरे प्रस्ताव से सहमत न होने के बाद भी ....      


बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

भटके हुए लोगों की घर वापसी ...


इन भोले चेहरों को देख कर क्या आप कह सकते हैं कि ये बड़ी निर्ममतापूर्वक नक्सली घटनाओं को अंजाम 
देते होंगे  ? 

किन्तु सत्य यही है .... 
अर्थात बड़े से बड़े विशेषज्ञ भी चेहरों की भाषा पढ़ने में त्रुटि कर सकते हैं .....
कहते हैं कि कलियुग में सारी परिभाषाएं अपने अर्थ खो देती हैं .........